आरएसएस और भाजपा की बी-सी-डी टीमें

  • 24 मई 2017
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साल 2014 में नरेंद्र मोदी की धमाकेदार जीत भाजपा की जीत तो थी ही, ये आरएसएस के संगठन शक्ति की भी जीत थी. साथ में ये उन सभी संगठनों की भी जीत थी जो आरएसएस की विचारधारा से जुड़े हैं.

आज जब भाजपा सत्ता में है, हिंदुत्ववादी संगठनों की शक्ति बढ़ी है, उनका मनोबल बढ़ा है.

हिंदू युवा वाहिनी, श्रीराम सेना जैसे संगठन सीधे तौर पर भले आरएसएस से जुड़े न हों लेकिन उनसे जुड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं की विचारधारा और उद्देश्य अलग नहीं हैं.

हिंदू राष्ट्र की कामना, उग्र राष्ट्रवाद, ये ऐसे तत्व हैं जो इन संगठनों को आपस में जोड़ते हैं.

पत्रकार धीरेंद्र झा की नई किताब 'शैडो आर्मीज़, फ्रिंज ऑर्गनाइज़ेशंस एंड फ़ुट सोल्जर्स ऑफ़ हिंदुत्व' में भाजपा के उफ़ान में इन संगठनों के योगदान पर लिखा गया है.

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उग्र हिंदुत्व

ये संगठन हैं सनातन संस्था, हिंदू युवा वाहिनी, बजरंग दल, श्रीराम सेने, हिंदू ऐक्या वेदी, अभिनव भारत, भोंसला मिलिट्री स्कूल और राष्ट्रीय संगठन.

किताब में हिंदुत्ववादी संगठनों के इतिहास, भाजपा की उन्नति में उनके योगदान, उनके काम के तरीके, आरएएसएस में कथित वर्ण व्यवस्था और ब्राह्मणों के दबदबे पर इन संगठनों में सुगबुगाहट जैसे कई विषयों पर बात की गई है.

आज के दौर में इस किताब की प्रासंगिकता पर धीरेंद्र झा कहते हैं, "साल 2014 के लोकसभा और कई राज्यों के चुनाव में भाजपा की असाधारण जीत के बाद हिंदुत्व की जीत से कथित 'फ्रिंज' गुटों की गतिविधियों में अचानक बढ़ोत्तरी हुई है."

भारत में कई लोग ऐसा मानते थे कि उग्र हिंदुत्व भारतीय राजनीतिक सोच की मुख्य धारा नहीं है बल्कि वह फ्रिंज यानी हाशिए पर हैं, लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद से यह थ्योरी काफ़ी हद तक ग़लत लगने लगी है.

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झा कहते हैं, "गोरक्षा और 'लव जिहाद' के नाम पर घृणा से भरे भाषण, 'घर वापसी' और अल्पसंख्यकों पर हमले नियमित हो गए हैं. इन गुटों के भाजपा के साथ गहरे संबंध हैं जिसे देखकर ऐसा लगता है कि वो हिंदू राष्ट्र निर्माण की एक बड़ी योजना का हिस्सा है."

किताब में आठ संगठनों की चर्चा की गई है.

सनातन संस्था

1991 में 'सनातन भारतीय संस्कृति संस्था' को ट्रस्ट के तौर पर मुंबई में रजिस्टर किया गया था.

संस्था का दावा था कि उसकी स्थापना का उद्देश्य लोगों को आध्यात्म की शिक्षा देना है लेकिन संस्था के सदस्यों का नाम तर्कवादी डॉ. नरेंद्र डाभोलकर, वामपंथी नेता गोविंद पंसारे और लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या से जोड़ा गया.

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वर्ष 2011 में मुंबई की एक अदालत ने 'संस्था के दो सदस्यों- विक्रम भावे और रमेश गडकरी'- को 2008 के वाशी और ठाणे धमाकों के लिए 10 साल की सज़ा सुनाई.

'सनातन प्रभात' नाम के अखबार का हवाला देते हुए धीरेंद्र झा लिखते हैं कि संस्था का ध्येय 2023 तक हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना है.

हिंदू युवा वाहिनी

वर्ष 1998 में पहली बार सांसद बनने के बाद आदित्यनाथ ने गोरक्षा मंच की स्थापना की लेकिन हिंदुओं के बीच अपनी बुनियाद मज़बूत करने के लिए इसका नाम बदलकर हिंदू युवा वाहिनी रख दिया गया.

किताब के अनुसार छोटे गांव से लेकर शहरों तक में वाहिनी ने अपनी जड़ें फैलाईं.

झा लिखते हैं, "ज़मीन पर हिंदू युवा वाहिनी के सदस्य समूह में काम करते हैं और आदित्यनाथ के अलावा किसी की नहीं सुनते. उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनका राजनीतिक भविष्य अधिकतम सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर निर्भर है."

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हिंदू युवा वाहिनी के नेता मुसलमान विरोधी भाषण देते हैं. वाहिनी में ज़्यादातर ठाकुर महत्वपूर्ण पदों पर हैं.

झा लिखते हैं कि मार्च 2002 में हिंदू युवा वाहिनी के गठन के बाद गोरखपुर और आसपास के इलाकों में सांप्रदायिक दंगों में 'असाधारण तेज़ी' आई है.

बजरंग दल

बजरंग दल की स्थापना 1984 में विश्व हिंदू परिषद के युवा विंग के तौर पर हुई थी जिसका मूल काम अयोध्या आंदोलन के लिए हिंदुओं को इकट्ठा करना था.

छह दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के गिराने में बजरंग दल के कार्यकर्ता 'सबसे आगे' थे.

1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चों को ज़िंदा जलाने का दोषी साबित हो चुका दारा सिंह भी बजरंग दल का कार्यकर्ता था.

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एक स्टिंग ऑपरेशन में बजरंग दल कार्यकर्ता बाबू बजरंगी ने दावा किया था कि उसने गुजरात दंगों में नरोदा पाटिया में मुसलमानों की हत्या की थी.

जहां कहीं भी बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को लगता है कि उनकी परिभाषा के मुताबिक हिंदू संस्कृति के प्रतिकूल कुछ हो रहा है तो वे प्रदर्शन करते हैं जो कई बार हिंसक हो जाते हैं.

झा लिखते हैं कि 2015 में अख़लाक़ की हत्या के बाद बजरंग दल के कार्यकर्ता पीड़ित के परिवार के साथ नहीं हमलावरों के परिवार के साथ खड़े थे.

श्रीराम सेने

जनवरी 2009 में कुछ सेने के सदस्य मैंगलोर के एक पब में घुसे और महिलाओं को मारा-पीटा.

उनका आरोप था कि सबसे सामने शराब पीकर ये महिलाएं हिंदू संस्कृति और परंपरा का उल्लंघन कर रही हैं. प्रमोद मुतल्लिक सेने के प्रमुख हैं.

मुतल्लिक ने पहले आरएसएस के साथ काम किया, फिर वो विश्व हिंदू परिषद में शामिल हुए. बाद में वो बजरंग दल से भी जुड़े रहे.

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फिर शिवसेना में गए और आखिरकार श्रीराम सेने का गठन किया. सेने का गठन करने वाले वो लोग थे जो आरएसएस और भाजपा में ब्राह्मणों के दबदबे से नाराज़ थे.

2008 में श्रीराम सेने के सदस्यों ने सफ़दर हाशमी ट्रस्ट (सहमत) के दफ़्तर में घुसकर एमएफ़ हुसैन की कई तस्वीरों को बरबाद कर दिया था.

2008 में कर्नाटक पुलिस ने हुबली बम धमाकों के सिलसिले में कई लोगों को गिरफ़्तार किया जिनमें सेने सदस्य भी शामिल थे.

2015 में जब लेखक की मुलाकात श्रीराम सेने प्रमुख प्रमोद मुतल्लिक से हुई तो वो डरे हुए थे. उन्हें लगता था कि कोई मुसलमान आतंकी उनकी हत्या कर देगा.

हिंदू ऐक्या वेदी

केरल में भाजपा की सीमित पहुंच देखते हुए वेदी की भूमिका महत्वपूर्ण है.

किताब के अनुसार, जिस एक मुद्दे ने वेदी को व्यस्त रखा है वो ये कि मंदिरों को हिंदू श्रद्धालु चलाएँ न कि बोर्ड.

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एक विवरण के मुताबिक जुलाई 1992 पुंथुरा दंगे के बाद हुई सामाजिक उथल-पुथल के बाद आरएसएस ने एक सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें हिंदू ऐक्य वेदी की स्थापना की गई.

केरल में आरएसएस और सीपीएम कार्यकर्ताओं के एक दूसरे पर हमलों की ख़बरें आम हैं.

ऐसे में जब भाजपा केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में विस्तार की योजना है, वेदी की भूमिका पर सभी की निगाह रहेगी.

अभिनव भारत

किताब के मुताबिक अभिनव भारत की स्थापना रहस्य के साये में है. माना जाता है कि सावरकर ने पुणे के फर्गुसन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अभिनव भारत की नीव डाली.

दशकों निष्क्रिय रहने के बाद इसे भंग कर दिया गया लेकिन कुछ साल पहले इसे दोबारा जीवनदान मिला.

गोपाल गोडसे की बेटी हिमानी सावरकर अभिनव भारत की प्रमुख थीं.

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अभिनव भारत का नाम मालेगांव धमाके के अलावा अन्य धमाकों में आया, हालांकि अभी भी ये संस्था रहस्यमय है.

इन धमाकों के सिलसिले में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित, सुधाकर द्विवेदी, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय आदि का भी नाम आया था.

झा कहते हैं, "संघ परिवार के लिए अभिनव भारत कितनी सेवाएं दे सकता है, वो इस बात पर ज़्यादा निर्भर है कि अदालत में अभिनव भारत के खिलाफ़ आतंक के मामलों का क्या होता है."

भोंसला मिलिट्री स्कूल

इस स्कूल का नाम 2008 मालेगाँव धमाकों की जांच के दौरान आया.

स्कूल का दावा है कि वो छात्रों को मिलिट्री ट्रेनिंग देता था हालांकि स्कूल पर सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने और हिंदू चरमपंथ से जुड़े लोगों को ट्रेनिंग देने के आरोप लगे.

'हिंदू सांप्रदायिक राजनीति' के कारण भोंसला मिलिट्री स्कूल की स्थापना हुई.

इसका इतिहास डॉक्टर बीएस मुंजे की यूरोप यात्रा से जुड़ा है जिन्होंने 1930 के दशक में (उनकी डायरी के अनुसार) इटली में फ़ासीवादी तानाशाह मुसोलिनी से मुलाकात की थी.

मुंजे इटली के मिलिट्री स्कूल की यात्रा से बेहद प्रभावित थे और 1937 में नासिक स्थित भोंसला मिलिट्री स्कूल की स्थापना हुई.

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राष्ट्रीय सिख संगत

1984 के सिख-विरोधी दंगों के बाद 1986 में संगत की स्थापना हुई.

संगत के एक सदस्य के अनुसार इसका काम 'गुरु ग्रंथ साहिब की तालीम को प्रचलित' करना था लेकिन सिख समाज के एक बड़े तबके का आरोप है कि संगत का काम सिख पहचान को कमज़ोर करना था.

आरएसएस का कहना है कि सिख धर्म, अलग धर्म नहीं, बल्कि हिंदू समाज का ही एक हिस्सा है.

लेकिन अकाल तख्त जत्थेदार और आम सिख इससे सहमत नहीं हैं जिनके विरोध के कारण संगत को कई बार सालों तक अपने कार्यों पर रोक लगानी पड़ी.

संगत के नेता रुल्दा सिंह की हत्या को भी इसी से जोड़कर देखा जाता है क्योंकि एक सोच के मुताबिक चरमपंथी सिखों को लगता था कि रुल्दा सिंह सिखों को हिंदुओं की ओर मोड़ रहे हैं.

एक तरफ़ धीरेंद्र झा ने हिंदू चरमपंथ से खतरों पर बात की है, क्या मुस्लिम और ईसाई चरमपंथी संगठन देश के लिए खतरा नहीं हैं?

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झा कहते हैं कि ऐसा नहीं कि ईसाई चरमपंथ अस्तित्व में नहीं है लेकिन एक तरफ़ जहां अल्पसंख्यक चरमपंथी संगठन कानून-व्यवस्था का मुद्दा बन सकते हैं, "बहुसंख्यक चरमपंथी राष्ट्र और सत्ता पर कब्ज़ा करके सांप्रदायिक फ़ासीवाद को बढ़ावा दे सकते हैं जो कि आज देखने को मिल रहा है".

पिछले कुछ सालों में वक्त का पहिया घूमा है और दुनिया के कई हिस्सों में दक्षिणपंथी ताकतें मज़बूत हुई हैं.

अमरीका में ट्रंप की जीत, ब्रिटेन में ब्रेक्सिट पर हामी, फ्रांस में मरीन ला पेन की पार्टी के पक्ष में पड़े बड़ी संख्या में मतों को उसका सुबूत माना जाता है.

साथ ही ये भी सोच है कि भारत में हिंदुओं का एक बड़ा तबका उग्र हो रहा है.

झा कहते हैं, "न सिर्फ़ सांप्रदायिक हिंसा का विरोध कम हुआ है, हिंदुओं का एक बड़ा तबका हिंदुत्ववादी गुटों के प्रोपेगेंडा पर ध्यान दे रहा है जिसमें अल्पसंख्यकों को खतरे की तरह पेश किया जा रहा है."

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झा के अनुसार भाजपा की चुनावी सफ़लताएं, जीत और अल्पसंख्यकों, खास तौर पर मुसलमानों पर लगातार बढ़ते हमले इस बदलाव की ओर इशारा करते हैं.

भाजपा अपने ऊपर सांप्रदायिकता फैलाने से जुड़े आरोपों से हमेशा इनकार करती रही है लेकिन झा का कहना है कि हालांकि सरकार ने हमेशा ऐसे दिखाया है कि उसका इन गुटों से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन इन गुटों को मिलने वाले छिपे और खुले समर्थन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

लेकिन आखिरकार लोग ऐसे संगठनों से क्यों जुड़ते हैं?

झा के अनुसार गरीब तबकों में बेरोज़गारी एक बहुत बड़ा कारण है जिसकी वजह से बेरोज़गार युवक हिंसा पर उतारू हिंदू कट्टरपंथी गुटों से जुड़ रहे हैं.

लेखक धीरेंद्र झा के अनुसार, "हिंदुत्व गुटों से जुड़ने के बाद की नई पहचान के बाद ये युवक खुद को शक्तिशाली महसूस करते हैं, जो सही या गलत, उनके लिए बहुत मायने रखता है."

झा के अलावा ऐसे भी उच्च जाति से ताल्लुक रखने वाले युवा हिंदू ऐसे गुटों में शामिल हो जाते हैं ताकि वो भारत को हिंदू राष्ट्र में बदल सकें.

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