ब्लॉग: ‘बॉयफ़्रेंड’ और पति के साथ-साथ चाहिए ‘हाफ़ बॉयफ़्रेंड’

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'लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते... ये तो एक पर्दा है पर्दा, कंपकंपाती रातों में धड़कते हुए दिलों की भड़कती हुई आग को बुझाने का, छिपाने का...'

1989 में रिलीज़ हुई 'मैंने प्यार किया' का ये डॉयलॉग आज के प्यार करनेवालों के लिए फ़ारसी से कम नहीं.

लेखक चेतन भगत की मदद से आज के प्यार का गणित कुछ इस प्रकार लगता है.

'हाफ़ गर्लफ्रेंड' को भी लोग समझ जाएंगे

'अंग्रेजी के मुक़ाबले पीछे रह गई है हिंदी'

अब लड़की लड़के की दोस्त यानी 'फ़्रेंड' हो सकती है.

दोस्ती में थोड़ी गहराई जोड़ दें तो 'हाफ़-गर्लफ़्रेंड' हो सकती है.

'हाफ़-गर्लफ़्रेंड' में जिस्मानी नज़दीकी जोड़ दें तो 'फ़ुल-गर्लफ़्रेंड' हो सकती है.

और 'फ़ुल-गर्लफ़्रेंड' में 'कमिटमेंट' जोड़ दें तो पत्नी यानी 'वाइफ़' हो सकती है.

मानना पड़ेगा लड़कों के लिए रिश्तों की बड़ी 'वेराइटी' हो गई है. और लड़कियों के लिए?

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'मैंने प्यार किया', 'हम आपके हैं कौन' और 'कुछ-कुछ होता है' देखकर बड़ी हुई मेरी सहेलियों ने दोस्ती, मोहब्बत और फिर शादी को कॉलेज की ग्रैजुएशन डिग्री की तरह समझा.

अब आप उन्हें कह रहे हैं कि 'फ़र्स्ट ईयर', 'सेकंड ईयर' और 'थर्ड ईयर' जैसी इस सीढ़ी में आधा पायदान और है.

शायद 'फ़र्स्ट' और 'सेकंड' के बीच में.

डेढ़ वाले इस पायदान में लड़के से मांगिए गहरी दोस्ती और बदले में ना बुझाइए 'कंपकंपाती रातों में धड़कते हुए दिलों की भड़कती हुई आग', तो शायद वही होगा 'हाफ़ बॉयफ़्रेंड'.

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मेरी सहेलियां बहुत ख़ुश हैं. हों भी क्यों ना. अब तक ख़ुद को रोके हुए थीं क्योंकि किसी लड़के से औसत से गहरी दोस्ती करने पर बदचलन वाले घटिया चश्मे से देखे जाने का डर था.

अब उन्हें लगने लगा है कि एक नहीं कई लड़के दोस्त बन पाएंगे और हर लड़के की उम्मीद गहरी दोस्ती तक सीमित रखी जा सकेगी.

बल्कि वो तो इस डेढ़ वाले पायदान को दोस्ती और मोहब्बत के बीच नहीं, मोहब्बत और शादी के बीच और शादी के बाद भी देखने लगी हैं.

यानी बॉयफ़्रेंड और पति के साथ या बाद भी बन सकेगा 'हाफ़ बॉयफ़्रेंड'.

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सही तो है. जब लड़की की लड़की से गहरी दोस्ती कभी भी हो सकती है तो लड़के से क्यों नहीं.

लड़कियों की लड़कियों से दोस्ती तो हमेशा ख़ास रही है पर मेरी सहेलियां कहती हैं कि लड़कों से दोस्ती में कुछ और ही मज़ा है.

दुनिया देखने का अलग नज़रिया, बात करने का अलग अंदाज़ और वो स्पेशल महसूस होने वाला अहसास.

अब अगर ये सब खुले-आम सामान्य तौर पर किया जा सके तो ज़िंदगी 'सेट' हो जाए.

यानी गुलाबी और लाल के बीच फ़र्ज़ कीजिए आ जाए पीला गुलाब.

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मेरी एक सहेली ने कहा कि वो सबसे पहला पीला गुलाब उस लड़के को देगी जिससे वो कॉलेज में करना तो दोस्ती ही चाहती थी पर तब गुलाबी और लाल ही रंग मार्केट में थे तो उसे बॉयफ्रेंड बना लिया.

दूसरी ने कहा कि वो उस लड़के को फ़ोन करेगी जिससे इसलिए दोस्ती तोड़ दी क्योंकि बॉयफ़्रेंड को जलन होने लगी थी.

तीसरी ने ऑफ़िस में काम करनेवाले उस आदमी का नाम लिया जिससे बात करने पर अक्सर नए तरीक़े से सोचने को मजबूर होती रही पर 'लोग क्या कहेंगे' के डर से आगे नहीं बढ़ी.

इनकी सुनकर मैंने कहा वाह! क़रीब 30 साल पुरानी मोहनिश बहल वाली दोस्ती से पर्दा उठा है तो क्या रंग बिखरे हैं.

मानना पड़ेगा कि दिल, दोस्ती इत्यादि के लिए बड़ा अच्छा दौर आ गया है.

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