मोदी के तीन साल, अच्छे दिनों का हाल

  • 27 मई 2017
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लोगों का दिल जीतने के लिए आप उन्हें कुछ स्वादिष्ट खिलाएँ जिससे वो खुश हो जाएं. - पांचवी सदी ईसा पूर्व में एथेंस के राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने पर यूनानी नाटककार एरिस्टोफ़ेनस की यह टिप्पणी आज भी भारत पर फिट बैठती है.

मनमोहन सिंह कार्यकाल के अंतिम वर्षों से निराश और भ्रष्टाचार के आरोपों से हताश जनता को उम्मीद थी कि विकास से 'अच्छे दिन' आएंगे.

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घर वापसी, गोरक्षकों के हमले, अख़लाक और पहलू ख़ान की मौत, दलितों, मुसलमानों की पिटाई, कश्मीर, छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबलों की हत्या, काले धन पर 'जुमलेबाज़ी' के अलावा इन तीन सालों में क्या हुआ जिन्हें इस सरकार की उपलब्धि में गिना जाए?

इस लेख को लिखने के दौरान कुछ विश्लेषकों, लेखकों ने या तो बात करने से मना कर दिया या फिर कहा कि उनके पास सकारात्मक बताने के लिए कुछ है ही नहीं.

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एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक इस सरकार ने पूर्व कांग्रेस कार्यक्रमों को मात्र आगे बढ़ाया या फिर उस पर ज़्यादा ज़ोर देकर काम किया. लेकिन पहलू का दूसरा पक्ष है कि योजना के बेहतर कार्यान्वयन पर पीठ थपथपाने में क्या गलत है.

मोदी सरकार के तीन सालों में प्रदर्शन अगर शून्य था तो आप इसे कैसे समझाएंगे कि मोदी अब भी सबसे लोकप्रिय नेता हैं और भाजपा मोदी के नेतृत्व में यूपी का चुनाव जीत भारी बहुमत से चुकी है.

इस पर तर्क मिलता है कि चुनाव जीतना सरकार के प्रदर्शन का सुबूत नहीं है. यानी तर्क के बाद तर्क और उस पर एक और तर्क.

बहरहाल, आइए जानते हैं इस कार्यकाल के कुछ सकारात्मक पहलू, हालांकि इन पर सवाल उठाने वालों की भी तादाद कम नहीं.

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1. मज़बूत पीएमओ

मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री काल के दौरान आरोप लगे कि असली सत्ता सोनिया और राहुल गांधी के पास थी और मनमोहन सिंह कठपुतली थे.

राजनीतिक विश्लेषक मोहन गुरुस्वामी के मुताबिक नरेंद्र मोदी पीएमओ में निश्चिंतता लेकर आए है.

वो कहते हैं, "पिछले आठ-दस सालों में ऐसा लगता था कि पीएमओ ऑटो-पायलट मोड पर चल रहा था. नरेंद्र मोदी का पीएमओ में होना महसूस हो रहा है."

उन दिनों को न भूलें जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने वाशिंगटन डीसी रवाना हो चुके मनमोहन सिंह की अनुपस्थिति में राहुल गांधी ने पत्रकारों के सामने एक अध्यादेश का मसौदा फाड़ दिया था.

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2-जी स्कैम के रोशनी में आने से पहले भी जिन परिस्थितियों ए राजा सरकार में मंत्री बने, उसके लिए भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कमज़ोरी को ज़िम्मेदार बताया गया. उसके मुकाबले आज पीएमओ मज़बूत दिखता है.

कुछ समीक्षकों के मुताबिक इस सरकार में तेज़ी से फैसले हुए - इसका उदाहरण सड़कों के बनने के लिए ज़मीन अधिग्रहण में तेज़ी है.

गुरुस्वामी कहते हैं, "ज़्यादातर मंत्री डरे हुए हैं, मंत्री स्तर पर तेज़ काम हो रहा है. दिख भी रहा है कि सड़क निर्माण, उर्जा उत्पादन, रेल के काम में तेज़ी आई है. इसका कारण हैं तेज़ और स्पष्ट फ़ैसले."

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2. स्कैम फ्री सरकार

मनमोहन सरकार के पहले पांच सालों की जहां तारीफ़ होती है, माना जाता है कि दूसरे कार्यकाल में इसकी दिशा गड़बड़ाई. 2-जी स्कैम, कोयला स्कैम, कॉमनवेल्थ स्कैम, चॉपर स्कैम, आदर्श स्कैम ने हेडलाइनें बटोरी.

एक फिज़ा बनी कि सत्ता के गलियारों में दलालों का राज है और भ्रष्टाचार का बोलबाला है. जानकारों के मुताबिक़ मोदी सरकार के तीन सालों में ऐसी बात सरकारी मंत्रियों के बारे में सुनने को नहीं मिलीं और इसके लिए सरकार की तारीफ़ होनी चाहिए.

हालांकि भाजपा शासित राज्यों से व्यापमं जैसे घोटालों के आरोप आते रहे हैं.

मोहन गुरुस्वामी कहते हैं, "ऐसा लगता है कि भाई-भतीजावाद का माहौल खत्म हो गया है. देखिए, किस तरह से कोयले की खानों, 2जी स्पेक्ट्रम का आबंटन किया गया. लोग अंबानी और अडानी की बात करते हैं लेकिन अंबानी जो गैस के दाम चाहते थे, वो उन्हें नहीं मिला. अडानी के बारे में हम थोड़ा बहुत सुनते हैं लेकिन देखते नहीं हैं."

ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के सदस्य लॉर्ड भीखू पारेख कहते हैं, "मोदी जी के ज़माने में भ्रष्टाचार कम है. मनमोहन सिंह के ज़माने में हर महीने स्कैम होते थे. इससे अर्थव्यवस्था पर बहुत असर पड़ता था. इसलिए मैं कहूंगा कि (मोदी कार्यकाल में) आर्थिक क्षेत्र में तरक्की हो रही है."

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3. प्रक्रिया का सरलीकरण

चुनाव से पहले भी नरेंद्र मोदी टैक्स भरने, व्यापार शुरू करने जैसी प्रक्रिया को सरल बनाने की बात करते थे. ज़रूरी दस्तावेज़ों के स्वयं अटेस्ट करने को प्रक्रिया सरलीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

पासपोर्ट, परिचय पत्र, लाइसेंस, राशन कार्ड के आवेदन के अलावा कई महत्वपूर्ण कामों जैसे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए पहले किसी राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर की ज़रूरत होती थी, यानि उसे अटेस्ट करवाना पड़ता था.

अब इसे बंद कर दिया गया है और लोग खुद अपने दस्तावेज़ों को अटेस्ट कर सकते हैं. इससे ज़िंदगी आसान हो गई है.

पहले अटेस्ट करने के लिए साहबों के दफ़्तरों के चक्कर मारने पड़ते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा.

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रकार का कहना है कि जिस तेज़ी से किसी व्यापार को बिजली कनेक्शन मिलता है, उसकी सूची और अल्पसंख्यक निवेशकों की सुरक्षा की सूची में भारत का प्रदर्शन बेहतर हुआ है.

4. योजनाएं

मोदी सरकार ने पिछले तीन सालों में कई योजनाएं शुरू की हैं - जन धन योजना, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत.

जहां इन योजनाओं के उद्देश्यों की तारीफ़ होती है, आरोप है कि मोदी ने पूर्व यूपीए सरकार की योजनाओं की दोबारा पैकज कर नया नाम दिया है, साथ ही ज़मीन पर इन कार्यक्रमों का ख़ास असर नहीं हुआ है.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार मिन्हाज़ मर्चेंट इसे बेवकूफ़ी भरी दलील बताते हैं.

वो कहते हैं, "हर सरकार अपनी पूर्व सरकारों की अच्छी योजनाओं को आगे बढ़ाती है और खराब कार्यक्रमों को बेहतर बनाती है या खत्म कर देती है. आधार कार्ड कार्यक्रम यूपीए सरकार के दिमाग की उपज नहीं थी, उसकी शुरुआत एक टेक्नोक्रैट ने की थी."

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लंदन में आर्थिक मामलों के जानकार सुनील पोशाकवाले कहते हैं, "जनधन योजना एक बहुत बड़ी सफ़लता है. इससे गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा गया है. इस परियोजना ने गावों में रह रहे गरीबों को बहुत मदद मिली है."

वो कहते हैं, "इंश्योरेंस स्कीम से गरीब लोगों को फायदा हुआ है. विदेशी पूंजी निवेश में तेज़ी आई है."

"मेक इन इंडिया में रक्षा क्षेत्र में बहुत फायदा हुआ है. तीन से चार बिलियन डॉलर की डील हुई है. इससे हथियारों के आयात में कमी आएगी. रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में भी भारत में काफ़ी काम हुआ है."

जहां मोदी समर्थक इन योजनाओं को देश की दिशा बदलने वाला बताते हैं, मोदी विरोधी आंकड़ों की बात करते हैं.

जन धन योजना, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत जैसी स्कीमें कितनी सफ़ल रहीं, क्या उन्हें लेकर शोर ज़्यादा मचाया गया और ज़मीन पर काम नहीं दिखा, ऐसे सवाल हैं जिनका अलग अलग विश्लेषकों से अलग जवाब मिलेगा.

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5. जीएसटी और विदेश नीति

जीएसटी यानी गुड्स एंड सेल्स टैक्स को इस सरकार की एक बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है लेकिन फिर बात होती है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तो कई बिंदुओं पर इसी जीएसटी का विरोध हो रहा था.

गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी जीएसटी का विरोध कर चुके हैं.

मिन्हाज़ मर्चेंट इसे मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि बताते हैं. वो कहते हैं, "मोदी सरकार ने जीएसटी की राह में आने वाली मुश्किलों से अच्छी तरह निपटा है."

अपने कार्यकाल में मोदी ने अमरीका, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य-पूर्व स्थित कई देशों की यात्रा की.

कुछ लोगों का मानना है कि इन यात्राओं ने शिथिल पड़ी भारतीय विदेश नीति में जान फूंकी है.

भीखू पारीख कहते हैं, "मोदी कुवैत, मध्य पूर्व, सऊदी अरब, पूर्वी एशिया और कंबोडिया गए. विदेश नीति का विविधिकरण बहुत ज़रूरी है. विदेशी निवेश अच्छी तरह से आ रहा है." आंकड़े बताते हैं कि विदेशी निवेश बढ़ा है.

आने वाले दो सालों में मोदी सरकार के लिए चुनौतियां कम नहीं.

विश्लेषकों के मुताबिक शिक्षा, स्वास्थ्य, युवाओं के लिए नौकरियां, औद्योगिक उत्पादन ऐसे क्षेत्र हैं जहां भारी निवेश और सरकार को ध्यान देने की ज़रूरत है.

और कई ऐसे सामाजिक-सांप्रदायिक मुद्दे हैं जो विकास की गति में रुकवाट डाल सकते हैं.

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