झारखंड में किसने फैलाई, बच्चा चोरी की अफवाह

  • 24 मई 2017
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Image caption झारखंड में बच्चा चोरी की अफवाह का मुद्दा राजनीतिक रूप से गरमा रहा है

झारखंड में बच्चा चोरी की अफवाह में 9 लोगों की हत्या और और 14 दूसरे लोगों की पिटाई के बाद भी सरकार को नहीं पता कि ये अफवाह किसने फैलाई.

सरकार ने एक जांच कमिटी बनाई है, जो बुधवार को जमशेदपुर पहुंची है. इसे अपनी रिपोर्ट एक महीने में देनी है. मतलब, अगले एक महीने तक यह सस्पेंस बना रहेगा कि इसकी अफवाह किसने, कहां और कैसे फैलाई.

इस बीच पुलिस ने एक व्हॉट्सएप ग्रुप के एडमिन से पूछताछ की है.

गृह सचिव एसकेजी रहाटे ने बताया कि जांच कमिटी में कोल्हान के आयुक्त और डीआइजी शामिल हैं. इन्हें कहा गया है कि वे अफवाहों के लिए जिम्मेदार लोगों का पता लगाएं. ये भी देखा जाए कि अफवाह फैलाने वालों की मंशा क्या थी.

उन्होंने बताया कि 18 मई को हुई 7 हत्याओं के मामले में राजनगर और बागबेड़ा के थाना प्रभारियों को निलंबित कर दिया गया है. वहां नए अफसरों को भेजा गया है.

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Image caption पीड़ितों के परिजनों से मुलाकात के दौरान झारखंड सरकार के मंत्री सरयू राय

18 आरोपी गिरफ्तार

डीजीपी डीके पांडेय ने इस मसले पर कहा, "राजनगर के थाना प्रभारी को इसलिए सस्पेंड किया गया क्योंकि उन्होंने अफवाह फैलने के बाद भी इसे इग्नोर कर दिया. वहीं, बागबेड़ा के थाना प्रभारी भीड़ द्वारा तीन युवकों की पिटाई के दौरान घटनास्थल पर पहुंचने के बाद भी उन्हें बचा पाने में विफल साबित हुए. इसके अलावा हमने 18 लोगों को गिरफ्तार भी किया है. इनमें कई लोग वैसे हैं, जिन्हें मृतकों के परिजनों ने एफआइआर में नामजद किया था."

उल्लेखनीय है कि 18 मई की सुबह राजनगर थाने के शोभापुर और पदनामसाई गांवों में हजारों ग्रामीणों की भीड़ ने पास के हल्दीपोखर गांव के चार लोगों को पीट-पीट कर मार डाला था.

उसी शाम बागबेड़ा थाना क्षेत्र के नागाडीह गांव में भी भीड़ ने तीन युवकों की हत्या कर दी थी. दोनो ही घटनाओं में ग्रामीणों ने मृतकों पर बच्चा चोर होने का आरोप लगाया था.

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Image caption पुलिस विभाग के महानिदेशक और राज्य के गृह सचिव इस मुद्दे पर मीडिया से बात करते हुए

एनएचआरसी ने मांगी रिपोर्ट

इस बीच पिछले 22 दिनों के दौरान ऐसी 20 घटनाओं के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने डीजीपी को नोटिस भेजा है.

इसमें कहा गया है कि भीड़ द्वारा इस तरह की हिंसा से स्पष्ट है कि इनफोर्समेंट एजेंसियां अपना काम करने में विफल साबित हुई हैं.

डीजीपी को एक महीने के अंदर इस संबंधित विस्तृत रिपोर्ट देनी होगी. उन्हें बताना पड़ेगा कि पुलिस ने क्या-क्या कार्रवाई की है.

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Image caption एडीजी (आपरेशंस) आर के मल्लिक

अप्रैल से ही थी अफवाह

जमशेदपुर के वरिष्ठ पत्रकार मनोरंजन सिंह ने बीबीसी को बताया कि बच्चा चोरी की अफवाह अप्रैल के अंतिम सप्ताह से ही फैल रही थी. 2 मई को इस अफवाह का पहली दफा हिंसक परिणाम देखने को मिला.

उन्होंने कहा, "तब डुमरिया थाने के बनकाटी में ग्रामीणों ने एक वृद्ध को बच्चा चोर कह बुरी तरह पीट दिया. इसके महज 9 दिन बाद 11 मई को जादूगोड़ा और गोलूडीह में दो युवकों को पीटा गया, इऩमे से एक की अस्पताल में मौत हो गई."

मनोरंजन सिंह का कहना है, "उसी दिन आसनबनी में एक दूसरे शख्स पर बच्चा चोर होने का आरोप लगाकर उसे पीट-पीट कर भीड़ ने मार डाला. पुलिस को तभी सतर्क हो जाना चाहिए था."

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Image caption झारखंड पुलिस को जारी किया गया राष्ट्रीय मनावाधिकार आयोग का नोटिस

पुलिस की जिम्मेदारी

तो क्या इन घटनाओं के लिए पुलिस जिम्मेवार है?

एडीजी (आपरेशंस) आर के मल्लिक ने बीबीसी से कहा, "हमारा मकसद लोगों की जान बचाना होता है. अगर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए हमने गोलियां चला दी होतीं, तो कई और निर्दोष लोगों की जान जा सकती थी. हमें संयम बरतना ही पड़ता है."

उन्होंने कहा, "इन अफवाहों की खबर लगते ही थाना प्रभारियों ने अपने इलाके के ग्रामीणों के साथ बैठक कर इन अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की बात कही थी. तब ग्राम प्रधानों को कहा गया था कि पूरे इलाके में एक भी बच्चा चोरी नहीं हुआ है. यह महज अफवाह है."

वही हल्दीपोखर (पश्चिम) के मुखिया सैयद जबीउल्लाह ने बीबीसी से कहा, मुझे ऐसी किसी मीटिंग मे नहीं बुलाया गया था. अब मेरे गांव के चार लोगों की हत्या के बाद हमें सरकार से इंसाफ की आस है.

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