लीजिए, अब तैयार है ‘अहिंसा सिल्क’

  • 10 जून 2017
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खाने-पीने की वस्तुओं पर लगे रेड और ग्रीन टैग की तरह अगर कपड़ों पर भी ऐसे ही टैग मिलें, तो पहली दफा आप चौंक जाएंगे.

सोचेंगे कि आखिर कपड़ों में कैसा वेज (ग्रीन मार्क) और नानवेज (रेड मार्क). लेकिन, अब ऐसा हो रहा है. कपड़े भी वेज हैं या फिर नानवेज. ऐसे में अहिंसा सिल्क की मौजूदगी रेशमी कपड़ों के निर्माण को नए दायरे उपलब्ध करा रही है.

झारखंड सिल्क टेक्सटाइल एण्ड हैण्डीक्राफ्ट कॉरपोरेशन ( झारक्राफ्ट) ने बड़े पैमाने पर अहिंसा सिल्क का उत्पादन शुरू किया है. मतलब, सिल्क के वैसे धागे जिनके उत्पादन में रेशम के कीड़ों को नहीं मारा जाता.

इससे बनी साड़ियां और दूसरे ड्रेस मैटेरियल्स देश के नामी-गिरामी फैशन डिजाइऩरों को आकर्षित कर रहे हैं. इनमें से कुछ डिजाइनरों ने झारखंड सरकार के साथ करार भी किया है.

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ये कीड़े रेशमी हैं...

अहिंसा सिल्क की डिमांड

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Image caption अश्विनी सहाय

झारक्राफ्ट के डीजीएम (मार्केटिंग) अश्विनी सहाय ने बीबीसी को बताया, "हम अहिंसा सिल्क को शुरुआत से ही बना रहे हैं. अब अर्चना कोचर, रीना ढाका और वरिजा बजाज जैसी फैशन डिजाइनरों ने भी इसमें में अपनी रुचि दिखायी है. न केवल झारखंड बल्कि मुंबई, कोलकाता और दिल्ली जैसे महानगरों में भी लोग अहिंसा सिल्क के कपड़े खऱीद रहे हैं. इससे हमारे आदिवासी उत्पादकों को अंतराष्ट्रीय पहचान मिल रही है. पहले इसका उपयोग सिर्फ होम फर्निशिंग के कपड़ों मे होता था लेकिन अब इससे डिजाइनर कपड़े भी बनाए जा रहे हैं. "

क्या है अहिंसा सिल्क

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Image caption गजाला परवीन

रांची से करीब 25 किमी दूर नगड़ी में स्थित पायलट प्रोजेक्ट सेंटर की गजाला परवीन ने बताया कि झारखंड के तमाम उत्पादन केंद्रों मे अहिंसा सिल्क के धागे बनाए जा रहे हैं.

उन्होंने बताया कि इस सिल्क के निर्माण में हम रेशम के कीड़ों को नहीं मारते. इस कारण इसे अहिंसा सिल्क कहा जाता है.

कैसे बनता है

गज़ाला परवीन ने बीबीसी को बताया, "दरअसल कोकून दो तरह के होते हैं. रेशम निर्माण की प्रचलित विधि में कोकून का मुंह बंद होता है. ऐसे कोकून को उबालने के बाद धागा निकाला जाता है. इस प्रक्रिया में रेशम के कीड़े उबालते वक्त मर जाते हैं. लेकिन, अहिंसा सिल्क के कोकून का मुंह खुला होता है. इन्हें बगैर उबाले धागा निकाल लिया जाता है. इसके बाद रेशम के कीट उसी कोकून मे छोड़ दिए जाते हैं. वे बाद में तितली बनकर बाहर निकल जाते हैं. इसमें रेशम के कीड़ों की जान नही जाती. जैन धर्म मानने वालों में इसकी डिमांड ज्यादा है."

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अब जैन धर्मावलंबी भी पहनेंगे सिल्क

झारखंड राज्य दिगंबर जैन धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष ताराचंद जैन ने बीबीसी को बताया कि वे खुद भी सिल्क के कपड़े नहीं पहनते. क्योंकि इसे बनाने के लिए सैकड़ों कीड़ों को मारा जाता है.

लेकिन, अब अहिंसा सिल्क के आ जाने से जैन धर्म मानने वाले लोग भी सिल्क पहन सकेंगे. यह सराहनीय पहल है.

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