नक्सलबाड़ी से निकली चिनगारी जो दंडकारण्य तक फैल गई

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आज से 50 साल पहले उत्तरी बंगाल के नक्सलबाड़ी थाने के तहत पड़ने वाले गाँवों में ख़ुद को क्रांतिकारी कहने वाले कम्युनिस्टों की अगुआई में आदिवासी किसानों ने चीन में हुई क्रांति की तर्ज़ पर हथियारबंद ब़गावत की शुरुआत की थी.

दरअसल, उन दिनों पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के सत्ता में होने के कारण जुझारू किसान आंदोलन अपने उफान पर था.

इससे घबराए ज़मींदारों ने बटाईदारों को बेदखल करना शुरू कर दिया था. बटाईदार किसान कभी आंदोलन के ज़रिए, तो कभी अदालत के ज़रिए अपने हकों के लिए लड़ रहे थे.

इन्हीं में से एक किसान था बिगुल, जिसने अपने पक्ष में दीवानी अदालत का आदेश प्राप्त कर लिया था.

बिगुल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट का पार्टी सदस्य भी था. पर ज़मींदार ईश्वर टिर्की उसे कब्ज़ा देने के लिए तैयार नहीं हुआ.

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नक्सलबाड़ी में विद्रोहइसके जवाब में एक सम्मेलन करने के बाद किसानों ने पार्टी के स्थानीय नेतृत्व की अगुआई में किसान समितियाँ और हथियारबंद दस्ते बना कर ज़मीनों पर कब्ज़ा करना शुरू किया.

हदबंदी को चकमा देने वाले झूठे दस्तावेज़ जलाए जाने लगे, कर्ज़ के प्रोनोट नष्ट किए जाने लगे और ज़मींदारों के कारिंदों से बंदू़कें छीनने की मुहिम शुरू हो गई.

टिर्की के लठैतों ने बिगुल के समर्थन में सामने आए किसानों की पिटाई की और तहकी़कात के बहाने पुलिस ज़मींदार के समर्थन में आ गई.

23 मई 1967 को तीर-कमान से लैस किसानों का पुलिस से संघर्ष हुआ जिसमें तीन पुलिस वाले घायल हुए और दरोगा सुनाम वांगदी ने घायल हो कर अस्पताल में दम तोड़ दिया.

25 को पुलिस भारी संख्या में वहाँ पहुँची और फिर टकराव हुआ. इस बार पुलिस की गोली से 10 लोग मारे गए. नक्सलबाड़ी में विद्रोह 52 दिन तक जारी रहा.

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Image caption कानू सान्याल के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने खुदकुशी कर ली थी

पुलिस किसानों की घेराबंदी

इस दौरान काफी ऊहापोह के बाद माकपा ने उत्तर बंगाल के सभी क्रांतिकारियों को निकाल दिया और 13 जुलाई को वाम मोर्चा सरकार के आदेश पर बीएसएफ की मदद से पुलिस किसानों की घेराबंदी तोड़ कर भीतर घुस गई.

एक बूढ़े किसान को संगीन घोंप कर मार डाला गया और ढाई सौ गिरफ्तारियाँ हुईं जिनमें इस आंदोलन के नेता चारू मजूमदार और जांगल संथाल भी थे.

आंदोलन के दूसरे नेता कानू सान्याल पुलिस के हाथ नहीं चढ़े और भूमिगत हो गए. 28 जुलाई को पेइचिंग रेडियो ने नक्सलबाड़ी के विद्रोह को 'वसंत का वज्रनाद' की संज्ञा दी.

इस सरकारी दमन के परिणामस्वरूप माकपा में नीचे से ऊपर तक विभाजन हो गया, और क्रांतिकारी कम्युनिस्टों ने भूमिगत पार्टी बना ली और देखते-देखते देश के की इलाकों में उनकी कार्रवाइयाँ देखी जाने लगीं.50 साल बाद स्थिति यह है कि नक्सलवादी आंदोलन का शुरुआती नेतृत्व खत्म हो चुका है. चारू मजूमदार की कोलकाता के लाल बाज़ार थाने में मृत्यु हुई.

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संसदीय राजनीति

जांगल संथाल अस्सी के दशक में एक एल्कोहलिक बन कर गुज़र गए. कानू सान्याल ने खुदकुशी कर ली.

अनगिनत सांगठनिक उतार-चढ़ावों और बहसों के बाद नक्सलबाड़ी की यह परिघटना दो तरह के संगठनों में बँटी हुई है.

एक तरफ वे नक्सलवादी संगठन हैं जिनकी मान्यता है कि जनता अभी सशस्त्र क्रांति के लिए तैयार नहीं है.

इसलिए हथियार छोड़ कर संसदीय और गैर-संसदीय राजनीति करके उसे तैयार करना होगा.

हालाँकि वे जनता को क्रांति के लिए तैयार करने की दिशा में कोई उल्लेखनयी प्रगति नहीं कर पाए हैं.

दूसरी तऱफ स्वयं को माओवादी कहने वाला एक हथियारबंद संगठन है जिसका दावा है कि जनता पूरी तरह क्रांति करने के लिए तैयार है.

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भारतीय राज्य को चुनौतीकुल मिला कर सरकार और मीडिया की फाइलों में नक्सलवाद का मतलब अब माओवाद हो चुका है.

लेकिन, यह माओवाद मध्य भारत की आदिवासी पट्टी (जिसे वे दण्डकारण्य कहते हैं) में सिमटा हुआ है.

आंध्र, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडीशा के पहाड़ों और जंगलों में माओवादी पुलिस और सीआरपीए़फ के ऊपर बारूदी हमले करके भारतीय राज्य को चुनौती देते रहते हैं.

लेकिन, इस छोटे से इलाकों में उनकी हथियारबंद ता़कत का उसके बाहर कोई अस्तित्व नहीं है.

साठ, सत्तर और अस्सी के दशक में नक्सलवाद के प्रति विश्वविद्यालयीय छात्रों, शहरी मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों में खासा उत्साह देखा जाता था. आज वैसे हालात नहीं हैं.

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नक्सलबाड़ी से दण्डकारण्य तक

कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अरुंधति रॉय जैसी कुछ हस्तियों के अलावा उनके समर्थन में कोई विशेष शहरी गोलबंदी नहीं देखी जाती.

देश की मध्यवर्गीय राजनीतिक संस्कृति, मैदानी किसानों की राजनीति और मज़दूर आंदोलन पर माओवादियों का प्रभाव न के बराबर है.

अपनी इस नाकामी को वे स्वयं भी स्वीकारते हैं. माओ ने कहा था कि एक चिनगारी सारे जंगल में आग लगा देती है.

नक्सलबाड़ी से हो कर दण्डकारण्य तक पहुँचने वाले नक्सलवादी आंदोलन का यह हश्र बताता है कि भारत जैसे देश और समाज में क्रांति सि़र्फ एक चिंगारी का खेल नहीं है.

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(लेखक विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में भारतीय भाषा कार्यक्रम का निदेशक और प्रोफेसर हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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