मोदी के तीन साल: क्या है मेक इन इंडिया का हाल?

  • 26 मई 2017
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वन्दे मातरम की धुन, उस पर चलता हुआ 'मेक इन इंडिया' का फौलादी शेर, हॉल में बैठे विदेशी मेहमान, और नरेंद्र मोदी का भाषण.

प्रधानमंत्री ने कहा, "हमने मेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत युवाओं के लिए रोज़गार और स्व-रोज़गार मुहैया करवाने के लिए की है. हम भारत को मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बनाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं."

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'मेक इन इंडिया' का मक़सद भारत में औद्योगिक उत्पादन को बढाना है लेकिन आँकड़े बताते हैं मोदी के पीएम बनने से पहले मई 2014 में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर 4.6 प्रतिशत थी जो मई 2017 में गिरकर 2.7 प्रतिशत रह गई है.

टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, ये आंकड़ा 2014 के 11.1 प्रतिशत के मुक़ाबले गिरकर 0.8 प्रतिशत पर आ गया है.

लेकिन प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के मामले में मोदी सरकार का प्रदर्शन मनमोहन सरकार से बेहतर रहा है, 2011-12 में 117 अरब डॉलर का पूंजी निवेश हुआ था जबकि 2014-16 में ये आंकड़ा बढ़कर 149 अरब डॉलर हो गया है.

कितना सफ़ल रहा है भारत को एक ऐसे केंद्र के तौर पर उभारने का सपना जहां कंपनियां माल तैयार करें और वो भारत से दूसरे देशों को सप्लाई करें.

अर्थशास्त्री सुजान हाजरा कहते हैं, "इस मुद्दे को दो स्तरों पर देखना होगा- ये समझना होगा कि क्या ये एक इरादा भर है और इसके लिए कितना काम हुआ. दूसरा, इसके लिए ज़मीनी स्तर पर कितना काम हुआ है."

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हाजरा मानते हैं कि निर्माण क्षेत्र या मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बढ़ोतरी नहीं हुई है और उसकी दोनों वजहें हैं- बाहरी और अंदरूनी.

बाहरी वजहें-

  • निर्माण क्षेत्र में ओवरकपैसिटी
  • प्रोटेक्शनिज़म विश्व में उफान पर है, जिससे प्रोडक्ट्स को बाज़ार नहीं मिल पा रहा
  • 2007-08 में आई वैश्विक आर्थिक मंदी का असर बाक़ी

भीतरी वजहें-

  • कारोबारियों को बैंकों से क़र्ज़ मिलना मुश्किल (उद्यमों को बैंक से मिलने वाले कर्ज़ में रिकॉर्ड गिरावट आई है)
  • भारत में कल-कारख़ाने लगाना अभी भी मुश्किल है. भारत नया कारोबार शुरू करने वालों के लिए कितना सुविधाजनक है, इसका पता वर्ल्ड बैंक के 'इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस सर्वे' से चलता है, जिसमें भारत दुनिया में 130वें नंबर पर है. देखिए चार्ट.

हाजरा कहते हैं कि हालांकि केंद्र सरकार ने पॉलिसी के स्तर पर सुधार के कुछ क़दम उठाए हैं, उद्योग को राज्यों में दिक्क़तों का सामना करना पड़ता है.

लेकिन कुछ राज्य जैसे पंजाब ने इसमें ठोस क़दम उठाया है और इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस इंडेक्स में शहरों की रैंकिंग में लुधियाना कई पायदान ऊपर चला गया है.

केयर रेटिंग्स के प्रमुख अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, "मेक इन इंडिया एक योजना है जिसकी प्रगति जारी है."

सबनवीस का मानना है कि पिछले तीन सालों में निवेश धीमा हुआ है.

वजहें

  • बैंकों से क़र्ज़ मिलना मुश्किल हो गया है, ख़ासतौर से सरकारी बैंकों से.
  • आमदनी नहीं बढ़ी है लेकिन मंहगाई तेज़ी से ऊपर गई है.
  • मंहगाई की वजह से कंज्यूमर पैसे नहीं ख़र्च कर रहे. इसलिए मांग कम है.
  • उद्योग क्षेत्र में क्षमता का महज़ 70 फ़ीसदी इस्तेमाल हो रहा है जबकि ये कम से कम 85 प्रतिशत तक होना चाहिए.

सबनवीस कहते हैं कि जब पहले से ही मौजूद इंडस्ट्री की क्षमता का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है तो उद्यमी के लिए नया उद्योग लगाना फ़ायदे का सौदा नहीं है.

मंहगाई से मांग किस तरह प्रभावित होगी, इसकी व्याख्या करते हुए सबनवीस कहते हैं, "जब खाने-पीने की चीज़ों पर ज़्यादा ख़र्च आने लगता है तो ज़ाहिर है कोई भी व्यक्ति किसी दूसरी तरह की ख़रीदारी यानी कंज़्यूमर गुड्स (जैसे टीवी, फ्रिज वग़ैरह) पर ख़र्च कम करने लगता है."

बजट घाटे को कम करने के चलते सरकार इंफ्रास्टक्चर पर खर्च करने में कटौती कर रही है जिससे मूलभूत ढांचा के क्षेत्र में मांग की कमी है.

नोटबंदी ने मांग पर डाला असर

वित्त मंत्री के पूर्व आर्थिक सलाहकार और जाने-माने अर्थशास्त्री मोहन गुरुस्वामी कहते हैं कि 'मेक इन इंडिया मोदी सरकार के बाक़ी प्रोजक्ट्स की तरह है- जिसमें सारा ध्यान बढ़ा-चढ़ा कर बोलने पर है.'

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गुरुस्वामी कहते हैं, "हो सकता है कि मेक इन इंडिया ने छोटे-मोटे स्तर पर काम किया है लेकिन इसका कोई बड़ा असर नहीं हुआ है."

वो कहते हैं कि मोदी सरकार ख़ुद ही इस योजना को लेकर सीरियस नहीं.

इसके लिए वो 36 रफ़ाल लड़ाक़ू विमानों के फ्रांस के साथ हुए सौदे का हवाला देते हैं और कहते हैं कि सरकार ने सौदे में कंपनी के कुछ काम को भारत में लाने की शर्त क्यों नहीं रखी जैसा कि पहले के सौदों में होता रहा था?

नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर असर

वो कहते हैं, "हो सकता है कि नोटबंदी राजनीतिक तौर पर फ़ायदेमंद रहा हो लेकिन विश्व में ग़लत संदेश गया है कि अचानक से सिस्टम से 85 प्रतिशत करेंसी को बाहर बिना किसी तैयारी के कर दिया गया."

'नोटबंदी का कोई नकारात्मक असर नहीं रहा'

शक्ति के केंद्रीकरण को वो मोदी सरकार की एक बड़ी कमी मानते हैं जिसकी वजह से फ़ैसलों में देरी होती है.

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मोहनगुरु स्वामी का कहना है कि पूरी तरह से सक्षम (ट्रेंड वर्कफ़ोर्स) कामगारों की भारी कमी भी भारी उद्योगों को यहां नहीं आने की एक वजह हो सकती है.

कई जगहों पर सुधार

  • प्राकृतिक संपदाओं का आवंटन उद्योग के लिए आसान
  • सरकार ने कई फंसे हुए प्रोजेक्टस जैसे थ्री-जी को फिर से दिशा दी है
  • बिजली मिलना पहले के मुकाबले काफ़ी आसान
  • राज्यों में भी पॉलिसी सुधार की कोशिश और निवेश को बढ़ावा देने की कोशिश

साइबर सिक्यूरिटी के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी डीप आइडेंटिटी के प्रमुख बेनिलिडस नडार कहते हैं कि उनकी कंपनी पहले सिंगापुर में काम करती थी और अपने प्रोडक्ट्स यहां बेचती थी लेकिन दो साल पहले उन्होंने चेन्नै में अपना केंद्र शुरू किया है जिसमें क़रीब 200 से 250 लोग काम करते हैं.

नडार कहते हैं, "टैक्स और करंसी कन्वर्जन की वजह से मिल रहे फ़ायदे के कारण हमारे प्रोडक्ट की क़ीमत में 20 से 30 फ़ीसद की कमी आई है."

नडार की कंपनी साइबर सिक्यूरिटी के प्रोडक्ट्स बाहर सप्लाई करने के साथ-साथ अब भारत में भी बेच रही है.

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