देश का सबसे लंबा पुल ढोला-सादिया जिस पर टैंक भी गुजर सकते हैं

  • 26 मई 2017
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प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच ब्रह्मपुत्र नदी पर तैयार ढोला-सादिया पुल का उद्घाटन किया.

रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पुल का निर्माण कार्य देरी से पूरा हुआ, लेकिन ये अरुणाचल प्रदेश के साथ कनेक्टिविटी में मील का पत्थर साबित होगा.

चीन का दावा रहा है कि अरुणाचल प्रदेश उसका क्षेत्र है और उसे वो 'दक्षिणी तिब्बत' के तौर पर पुकारता है.

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देश के सबसे लंबे इस पुल की खासियतें क्या हैं, आइए जानते हैं.

ढोला सादिया पुल की विशेषताएं

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1- समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, इस पुल की लंबाई 9.15 किलोमीटर और चौड़ाई 12.9 मीटर है. हालांकि इसके दोनों ओर बने सम्पर्क सड़कों को मिलाकर इस परियोजना की कुल लंबाई 28.5 किलोमीटर है.

2- यह ब्रह्मपुत्र नदी से निकलने वाली लोहित नदी पर बना है जो असम के ढोला और अरुणाचल प्रदेश के सादिया को जोड़ता है.

3- पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत बनने वाले इस पुल का निर्माण 2011 में शुरू किया गया जिस पर 2,056 करोड़ रुपये की लागत आई है. इसका निर्माण नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड ने किया है.

4- मिनिस्ट्री शिपिंग के अनुसार, यह पुल पूर्वोत्तर के इलाके में कनेक्टिविटी की बड़ी समस्या को हल करेगा. अबतक दोनों तरफ को जोड़ने के लिए केवल नावों का सहारा था जो केवल दिन में चलती थीं और बाढ़ के समय आवागमन बंद हो जाता था.

5- इस पुल के बन जाने से असम के रुपाई में एनएच-37 और अरुणाचल प्रदेश के एनएच-52 के बीच की दूरी 165 किलोमीटर कम हो जाएगी, जबकि यात्रा का समय वर्तमान के छह घंटे की बजाय एक घंटे हो जाएगा.

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6- मिनिस्ट्री के बयान के मुताबिक, इस पुल के बनने से प्रति दिन 10 लाख रुपए के पेट्रोल और डीज़ल की बचत होगी.

7- सरकार का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों की रणनीतिक ज़रूरतों के लिहाज से भी यह पुल अहम है क्योंकि अरुणाचल प्रदेश में कई जलविद्युत परियोजनाएं चल रही हैं.

8- भूकंप को लेकर संवेदनशील पूर्वोत्तर इलाके को देखते हुए हर 50 मीटर पर बने कुल 182 पिलर को भूकंपरोधी बनाया गया है.

9- फ़ौज के एक इंजीनियर ने बीबीसी से कहा कि ढोला-सादिया पुल 60 टन वजन तक के टैंक का भार सह सकता है.

10- इस पुल को बनाने में इम्पोर्टेड हाइड्रोलिक का इस्तेमाल किया गया है. पुल के पूरा होने के लिए दिसम्बर 2015 की समय सीमा थी लेकिन देरी के कारण ये परियोजना 2017 में पूरी हो पाई.

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