'रमज़ान पर जानवर की ख़रीद-फरोख़्त पर रोक सही नहीं'

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केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने प्रधानमंत्री मोदी से गुज़ारिश की है कि वो मवेशियों के व्यवसाय पर लगाए गए नए नियमों को वापस लें.

विजयन का कहना है कि इससे मांस खाने वाले लोग तो प्रभावित होंगे ही, साथ ही इसका असर राज्यों के अधिकार, गणतांत्रिक व्यवस्था और अनेकता के मूल्यों पर भी पड़ेगा.

कड़े शब्दों में लिखे गए एक पत्र में उन्होंने मोदी से कहा है कि "केरल समेत दक्षिण भारत के कई राज्यों में मांस खाने वाले लोगों की संख्या शाकाहारी लोगों से अधिक है."

वो लिखते हैं, "असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, जम्मू कश्मीर, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और पश्चिम बंगाल भी ऐसे ही राज्य हैं."

"इसीलिए नए नियमों को लागू करने से पहले राज्यों से भी इस बारे में राय लेनी चाहिए थी. राज्यों का भरोसा जीतने की कोशिश ना करना एक घातक कदम है जिसके दूरगामी नतीजे होंगे और ये हमारे गणतंत्र के लिए सही नहीं है."

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'राज्यों के अधिकारों का उल्लघंन'

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विजयन का कहना है, "मुझे इस बात का डर है कि ये संघीय ढांचे में राज्यों के अधिकारों का उल्लघंन है. जल्दबाज़ी में लागू किए गए ये नियम देश के मूल्य 'अनेकता में एकता' को बनाए रखने में चुनौती साबित हो सकते हैं. ये संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और संघवाद का विरोध हैं."

विजयन देश के पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के जारी किए द प्रीवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टू एनिमल्स (रेगुलेशन ऑफ लाइवस्टॉक मार्केट्स) नियम 2017 के गैजेट नोटिफ़िकेशन के बारे में बात की है.

इस नियम के ज़रिए केंद्र सरकार ने बूचड़खानों के लिए मवेशियों की खरीद-फरोख़्त पर रोक लगा दी है.

सरकार के अनुसार पशु बाज़ार में जानवर खरीदने और बेचने वालों को अब ये बताना होगा कि जानवर को कत्ल करने के लिए नहीं खरीदा जा रहा.

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विजयन ने अपने पत्र में लिखा है, "चूंकि इन नियमों के अनुसार मवेशी वही बेच-ख़रीद सकते हैं जिनके पास ये साबित करने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ हैं कि वो मवेशियों का इस्तेमाल खेती में ही करेंगे- ये नियम खेती के काम में लगे किसानों के लिए मुसीबत का सबब बन सकते हैं."

वो लिखते हैं कि अधिकतर किसानों के पास ये साबित करने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ नहीं हैं कि वो खेती में काम में लगे हैं.

नए नियमों के अनुसार मवेशियों की खरीद-फरोख्त पर नज़र रखने के लिए ज़िला स्तर पर एनिमल मार्केटिंग मॉनिटरिंग कमेटी और एनिमल मार्केट कमेटी बनाई जाएगी.

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विजयन लिखते हैं कि इस तरह की कमेटी से मवेशियों की खरीदने-बेचने के व्यापार में किसान की आज़ादी पर असर पड़ेगा.

"इस तरह की चिंताए भी सामने आ रही हैं कि क्या होगा अगर ये कमेटी गौरक्षक की भूमिका अख्तियार कर ले. बीते कुछ महीनों में गौरक्षकों ने मवेशी व्यापारियों पर हमले किए हैं."

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'सभी धर्मों के लोग मांस खाते हैं'

विजयन ने मोदी को याद दिलाया है कि "देश के लाखों ग़रीब और आम लोगों के लिए, ख़ास कर दलितों के लिए मांस प्रोटीन का एक अहम स्रोत है."

"साथ ही रमज़ान से मौके पर इस तरह की रोक को निश्चय ही एक ख़ास अल्पसंख्यक समुदाय खुद पर हो रहे हमले की तरह देखेगी. हमारे देश में केवल अल्पसंख्यक ही नहीं, सभी धर्मों के लोग मांस खाते हैं."

उन्होंने लिखा है "इस रोक के लागू रहने पर इन लोगों के पोषण पर असर पड़ेगा ही, बल्कि चमड़ा उद्योग के लिए ज़रूरी कच्चा माल मिलना भी बंद हो जाएगा. देश में 25 लाख से अधिक लोग इस उद्योग में लगे हैं, जिनमें अधिकतर ख़ासकर दलित मरे जानवर उठाने का काम करते हैं. ये नियम लाभ से वंचित समुदाय के जीवन और जीविका को बुरी तरह प्रभावित करेंगे."

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विजयन के अनुसार इस रोक के कारण मांस निर्यात व्यवसाय पर भी बुरा असर पड़ेगा और देश को मिल रही "विदेशी मुद्रा में कमी आ सकती है".

केरल समेत कई राज्यों में मौजूद सरकारी मीट निर्यात कंपनियों के लिए ये नियम घातक सिद्ध होंगे और ऐसी कंपनियों मजबूरी में बंद करना पड़ सकता है.

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