ब्लॉग: इस्लामाबाद में 'हिन्दी मीडियम' और 'मम्मी-डैडी क्राउड'

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शहर के बीचोंबीच चमक-दमक भरे मॉल में 'हिन्दी मीडियम' का पोस्टर देखकर मैं कुछ ऐसे चौंका जैसे कनॉट प्लेस में मंगल ग्रह का प्राणी देख लिया हो.

ज़ाहिर है मैं पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद कोई 'हिन्दी मीडियम' के पोस्टर से झाँकते इरफ़ान ख़ान को देखने नहीं गया था. लेकिन जब अचानक इन पोस्टरों पर मेरी नज़र पड़ी तो एक बारगी समझ में नहीं आया कि मैं पाकिस्तान में हूँ या दिल्ली के साकेत मॉल में घूम रहा हूँ.

मॉल एक ऐसा 'न्यूट्रल ज़ोन' है जहाँ सब कुछ एक जैसा होता है - ख़रीदार, उनका पहनावा, उनकी पसंद-नापसंद, वहाँ बिकने वाला सामान, बड़े बड़े ब्रैंड और यहाँ तक कि उनकी बातचीत का तरीक़ा भी — चाहे ये मॉल दिल्ली में हो या दुबई में.

इस्लामाबाद के सेंटोरियन मॉल में घुसते ही पहले मुझे ऐसे ही 'न्यूट्रल ज़ोन' में पहुँचने का एहसास हुआ जहाँ शहर की ख़ासियत मॉल के गेट पर ही दम तोड़ देती है और सब कुछ एक साँचे में ढला नज़र आने लगता है. अपने पाकिस्तान में होने का एहसास तभी होता था जब कानों में पंजाबी लहज़े में बोली जा रही उर्दू की बातचीत पड़ती थी या फिर उर्दू में लिखे साइनबोर्ड्स पर नज़र जाती थी.

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और फिर नज़र गई 'हिन्दी मीडियम' के पोस्टर पर और पूरा दृश्य गड्ड-मड्ड हो गया. फ़िल्म देखने का कोई इरादा नहीं था फिर भी टिकट ख़रीद लिया क्योंकि बार-बार मन में सवाल खटक रहा था कि हिन्दी मीडियम के मुद्दे और उसकी जटिलता का पाकिस्तान से क्या संबंध? ये तो छोटे क़स्बों और गाँवों के सरकारी स्कूलों में 'हिन्दी मीडियम' से पढ़ने के बाद दिल्ली जैसे अँग्रेज़ीदाँ महानगर में आ पहुँचे मेरे जैसे लोगों की जद्दोजहद का हिस्सा है.

पर हॉल के अंदर पूरी फ़िल्म में जिस तरह से लोगों ने हँस कर, तालियाँ बजा कर (और संजीदा पलों में ख़ामोशी से अपने आँसू पोंछकर) फ़िल्म का मज़ा लिया उसे देखकर लगा कि मेरे जैसे लोगों की पाकिस्तान में भी कमी नहीं है.

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'हिन्दी मीडियम' का सही नाम दरअसल 'इंग्लिश मीडियम' होना चाहिए था क्योंकि ये फ़िल्म भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों में अँग्रेज़ी मीडियम की पढ़ाई को लेकर वहशत की हद तक पहुँच चुकी दीवानगी को दर्शाती है. ये दीवानगी उस असुरक्षा से पैदा हुई है जो मध्यवर्ग के माता-पिताओं को लगातार घेरे रहती है कि अगर हमारा बच्चा अँग्रेज़ी न बोल पाया तो पिछड़ा कहलाएगा और हिन्दी मीडियम में पढ़ने वाले तो करियर की दौड़ में पिछड़ ही जाते हैं.

पिछले बीस-तीस सालों में राजनीतिक पार्टियों ने उत्तर भारत में वोट लेने के लिए भले ही हिंदी की बात कही हो, लेकिन शिक्षा के हिंग्लिशीकरण में सरकारों का ज़्यादा बड़ा हाथ है. हिंदी की गिनती कब प्राइमरी स्कूलों से चुपचाप ख़त्म कर दी गई और उसकी जगह वन-टू-थ्री सिखाया जाने लगा, पता ही नहीं चला.

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इसका असर अब दिखाई देता है जब दिल्ली की बसों में सफ़र करने वाले नई उम्र के लड़के लड़कियाँ कंडक्टर से टिकट माँगते हुए कहते हैं — "टेन के टू, फ़ाइव के थ्री टिकट देना अंकल". या फिर पुराने फ़ैशन के दुकानदार से सवाल पूछते हैं - अंकल, डेढ़ रुपया कितना होता है या उनहत्तर कितना होता है?

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ये नज़ारा अभी पाकिस्तान में कम दिखाई पड़ता है. अब भी उर्दू में बात करने वाले - एक, दो, तीन … उननचास, उनहत्तर और उनसठ का आम बातचीत में इस्तेमाल करते हैं और समझते हैं. पर वहाँ भी पिछले तीस-चालीस बरस में एक वर्ग उभरा है जिसे 'उर्दू मीडियम' वाले तंज़ में 'मम्मी-डैडी क्राउड' या 'जिलाटो क्राउड' कहते हैं. उर्दू भाषियों की नज़र में ये लोग जिलाटो आइसक्रीम खाते हैं और अम्मी-अब्बू को मम्मी-डैडी कहकर पुकारते हैं.

'हिन्दी मीडियम' चाँदनी चौक में कपड़े के एक नौजवान और अमीर व्यापारी (इरफ़ान ख़ान) और उसकी मॉडर्न बीवी (पाकिस्तानी एक्टर सबा क़मर) की कहानी है जो अपनी बच्ची को दिल्ली के एक आभिजात्य इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाख़िला दिलवाने के लिए चाँदनी चौक के अपने पुराने घर से वसंत विहार की पॉश कॉलोनी में आ जाते हैं. पर फिर भी जब एडमिशन नहीं होता तो ग़रीब कोटे में सीट हासिल करने के लिए एक स्लम में आकर रहने लगते हैं.

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इस अटपटे से सफ़र के दौरान होने वाली घटनाओं पर इस्लामाबाद के उस मल्टीप्लेक्स में बैठे लोगों के ठहाके बता रहे थे कि 'उर्दू मीडियम' के लोग 'हिन्दी मीडियम' फ़िल्म का कितना आनंद ले रहे हैं और 'मम्मी-डैडी क्राउड' का मज़ाक उड़ता देख कितना ख़ुश हैं. उनके ठहाकों को सुनते सुनते फ़िल्म ख़त्म होने पर हॉल की सीढ़ियाँ उतरते हुए मैं घर लौटने के बारे में सोचने लगा और फिर हठात ख़्याल आया कि मैं दिल्ली में नहीं बल्कि पाकिस्तान में हूँ.

हमारी चिंताएँ और परेशानियाँ भी तो कितनी एक जैसी हैं!

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