नज़रिया: सोनिया नहीं, मोदी का लंच नीतीश को क्यों भाया?

  • 28 मई 2017
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जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे अनुभवी और मंझे हुए राजनेता अपना हर क़दम फूंक-फूंक कर उठाते हैं.

वह कोई फ़ैसला करें या बयान दें, किसी से हाथ मिलायें या गले मिलें, किसी को देखकर मुस्कराएं या मुँह फेर लें, किसके साथ भोज करें, किसके साथ नहीं, किससे मिलें, किससे नहीं, सबकुछ एक सोच और योजना के तहत वह करते हैं.

---और हमारे जैसे देश की राजनीति में इस तरह की 'व्यवस्था' और 'अनुशासन' कोई बुरी बात नहीं. इस मायने में वह अपने मौजूदा गठबंधन सहयोगी लालू प्रसाद से बिल्कुल अलग हैं.

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कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निमंत्रण पर विपक्षी नेताओं की भोज-बैठक में उनका शामिल न होना, लेकिन अगले ही दिन 27 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बुलावे पर उनका दिल्ली आना, उनके लंच में शामिल होना और बाद में प्रधानमंत्री से लंबी बैठक करना, यह सब महज संयोग नहीं हो सकता.

अपने राजनीतिक स्वभाव के हिसाब से उन्होंने यह सब सोच-समझकर ही किया होगा.

यह मानने वाली बात नहीं कि नीतीश जैसे बड़े और अनुभवी नेता को इस बात का पूर्व-आकलन नहीं रहा होगा कि सोनिया गांधी द्वारा आयोजित विपक्षी-नेताओं की भोज-बैठक में उनके न शामिल होने और अगले ही दिन प्रधानमंत्री के लंच में शामिल होने को लेकर सियासी गलियारों और मीडिया में तरह-तरह की अटकलें लगाई जाएंगी!

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दरअसल, नीतीश कुमार जैसे सधे राजनेता अपनी वर्तमान भूमिका निभाते हुए हमेशा भविष्य के राजनीतिक समीकरणों पर नज़र रखते हैं.

उन्हें नज़दीक से जानने वालों की बातों पर यक़ीन करें तो जनता दल (यू) अध्यक्ष इन दिनों 2019-20 की राजनीति और संभावित समीकरणों पर नज़र लगाए हुए हैं. 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और 2020 में बिहार विधानसभा के.

नीतीश के लिए 2020 का महत्व तो है ही, लेकिन 2019 का भी कुछ कम नहीं. बल्कि यूं कहें कि 2019 के संसदीय चुनाव के लिए बनते सियासी समीकरणों से ही बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव के समीकरण तय होंगे.

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इसमें कोई दो राय नहीं कि आज की तारीख़ में जनता दल (यू) और राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन को लेकर किसी तरह की समस्या नहीं है. नीतीश और लालू दोनों के लिए गठबंधन बनाए रखना ज़रूरी है.

लेकिन हाल के दिनों में भारतीय जनता पार्टी ने बिहार के बहाने देश के विपक्षी-खेमे की संभावित एकजुटता को कमज़ोर करने के उपक्रम तेज कर दिए हैं.

शुरुआत उसने बिहार से की है. अगला निशाना कर्नाटक हो सकता है. बिहार में भाजपा नेताओं ने लालू के बाद अब उनके पूरे परिवार को भ्रष्टाचार के मामले में घेरना शुरू किया है.

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ऐसा करते हुए वे समय-समय पर नीतीश कुमार को ललकारते भी रहते हैं कि 'सुशासन बाबू', आप की शराफ़त का क्या मतलब, जब आप 'भ्रष्टाचार में लिप्त लालू परिवार' के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं!'

भाजपा के इस अभियान में नीतीश के लिए एक ख़ुशगवार पहलू है कि राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी उनका आज भी पहले की तरह आदर कर रही है, उन पर किसी तरह का सवाल नहीं उठा रही है, उसके सारे सवाल लालू पर हैं!

जहां तक राज्य प्रशासन के संचालन का सवाल है, सियासी गलियारे में आमधारणा है कि नीतीश कुमार राजद की सिफ़ारिशों या दबावों को ज़्यादा तवज्ज़ो नहीं देते. बड़े अफसरों या निगम-बोर्डों के पदाधिकारियों के चयन में राजद खेमे की नहीं चलती.

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इसे लेकर यदा-कदा दोनों खेमों के बीच तीखापन भी नज़र आने लगता है. लेकिन लालू-नीतीश मिलकर फिर दुरुस्त करते रहते हैं. स्पोर्ट्स कोटे से सरकारी नियुक्तियां शुरू करने की मांग को लेकर हाल ही में राजद नेताओं-कार्यकर्ताओं ने बाकायदा नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ पटना में धरना-प्रदर्शन किया.

पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह समय-समय पर नीतीश के ख़िलाफ़ भड़कीला बयान देकर गठबंधन के दोनों खेमों के बीच चलती रहने वाली सियासी खलबलाहट को स्वर देते रहते हैं.

तब नीतीश को संतुष्ट करने के लिए लालू ऐसे बयानों के लिए अपने विश्वस्त सहयोगी रघुवंश की खिंचाई भी करते हैं. लेकिन ऐसे घटनाक्रमों के बावजूद गठबंधन के समक्ष फिलहाल कोई बड़ी चुनौती नहीं है.

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असल चुनौती तब आएगी, जब लालू प्रसाद के दोनों बेटों के ख़िलाफ़ भाजपा अपने मौजूदा अभियान को अदालती-आरोपपत्र तक पहुंचाने में कामयाब होगी. अगर उनके मंत्री-बेटों के ख़िलाफ़ बेनामी सम्पत्ति या ऐसे किसी मामले में आरोपपत्र जारी हुआ तो सरकार से उन्हें हटाने की मांग भी उठेगी.

ऐसे दौर में लालू-नीतीश के बीच टकराव तेज़ हो सकता है. भाजपा की फ़िलवक्त पूरी कोशिश है कि बिहार की राजनीति में जल्दी ही ऐसी स्थिति पैदा हो! मीडिया, ख़ासकर न्यूज़ चैनलों के एक हिस्से का भी इस अभियान में उसे भरपूर समर्थन मिल रहा है.

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भाजपा को अच्छी तरह पता है कि बिहार में जद (यू)-राजद गठबंधन के दरकने का उसे 2019 के संसदीय चुनाव में भरपूर फायदा मिलेगा. अगर गठबंधन कायम रहा तो बिहार में उसके सामने मुश्किलें ही मुश्किलें हैं.

लालू-नीतीश की साझा ताक़त के आगे बिहार में भाजपा आज भी बहुत पीछे है. मौजूदा समीकरणों में 'मोदी-मैजिक' फिलहाल वहां यूपी की तरह कारगर नहीं हो सकता.

यह मानने का कोई कारण नहीं कि नीतीश कुमार भाजपा के मौजूदा अभियान के इस ख़ास राजनीतिक पहलू को नहीं समझ रहे हैं. लेकिन यह भी सच है कि नीतीश केंद्र सरकार की एजेंसियों और भाजपा के अपने तंत्र की ताक़त भी समझते हैं.

इस वक़्त दोनों ही लालू-परिवार को नए सिरे से घेरने में जुटे हुए हैं. भ्रष्टाचार और बेनामी सम्पत्ति के ताजा आरोपों में अगर कोई भी मामला अदालती आरोपपत्र दाखिल होने की स्थिति में पहुंचा तो बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन की मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

फिर भाजपा के बल्ले-बल्ले! इन्हीं पहलुओं के मद्देनजर नीतीश ने भावी सियासी समीकरणों में बदलाव के विकल्प भी खुले रखे हैं. 2014-15 के मुकाबले भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से उनके रिश्ते सहज हुए हैं.

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बिहार में भाजपा वाले भी नीतीश पर पहले की तरह निशाना कम साधते हैं. उनके निशाने पर फिलहाल सिर्फ़ लालू हैं.

लंबे समय तक भाजपा के साथ सरकार चला चुके या केंद्र में भाजपा-नीत सरकार का हिस्सा रहे नीतीश कुमार कभी भी कांग्रेस-वाम रुझान वाले सेक्युलर-लोकतांत्रिक समीकरण या गठबंधन की राजनीतिक-सांगठनिक प्रतिबद्धता को लेकर सुसंगत नहीं रहे.

ऐसे में राष्ट्रपति चुनाव से पहले की ताज़ा राजनीतिक कवायद में उनकी नज़र 2020 के लिए उभरते बिहार के भावी राजनीतिक समीकरणों पर भी है!

जहां तक राष्ट्रीय राजनीति में 2019 के परिदृश्य का सवाल है, विपक्षी गठबंधन की स्थिति और संरचना को लेकर अभी भी कुहासा बरकरार है. संभवतः इसीलिए नीतीश ने अपने रिश्तों और भावी समीकरणों के विकल्प खुले रखे हैं!

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