औरतों की माहवारीः कब तक जारी रहेगी शर्म?

  • 28 मई 2017
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"मैं अपनी बेटी को माहवारी के दौरान उन तकलीफों से नही गुज़रने दूंगी जिससे मैं गुज़रती रही हूं."

32 साल की मंजू बलूनी की आवाज़ में एलान करने जैसी दृढ़ता थी और आंखों में चमक.

वो कहती हैं, "मुझसे मेरा परिवार तब अछूत की तरह व्यवहार करता है. मैं रसोई में नहीं जा सकती, मंदिर में जाना मना है, पूजा नहीं कर सकती, यहां तक कि दूसरों के साथ बैठ भी नहीं सकती."

मेरी मुलाक़ात मंजू से उत्तराखंड के एक सूदर गांव मंडोल में हुई.

भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर अमूमन एक ख़ामोशी रहती है, ख़ासकर माहवारी के दौरान.

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इससे जुड़े हास्यास्पद मिथक गहरी वर्जनाओं को जन्म देते हैं. माना जाता है कि महिलाएं इस दौरान अपवित्र, बीमार और अभिशप्त होती हैं.

इससे जुड़ी शर्म

एक सैनेटरी पैड बनाने वाली कम्पनी ने अपने अध्ययन में पाया कि 75 फ़ीसदी महिलाएं अब भी पैड किसी भूरे लिफ़ाफ़े या काली पॉलीथीन में लपेटकर ख़रीदती हैं.

इससे जुड़ी शर्म के कारण परिवार के किसी पुरुष के हाथों इसे मंगवाना तो बहुत कम होता है.

मुझे याद है कि अपनी तीन बड़ी बहनों के साथ एक बड़े परिवार में पलते-बढ़ते हम क्या-क्या जतन करते थे कि किसी को हमारी माहवारी के बारे में ख़बर न लगे. पिता और भाइयों को तो बिल्कुल भी नहीं.

माहवारी के दौरान हमारी माँ पहले से ही पुरानी चादरों को काट कर एक बक्से में छुपा कर रख देती थीं.

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'तस्वीर नहीं बदली'

उन कपड़े के टुकड़ों को दूसरे कपड़ों के अंदर किस तरकीब से सुखाना है- ये मेरी बड़ी बहनों ने सिखाया था.

पर यूं छिपाकर कपड़ों को सुखाने का परिणाम यह होता कि वे टुकड़े कभी पूरी तरह नहीं सूखते और बदबूदार हो जाते थे.

फिर बार-बार उनका इस्तेमाल करना बहुत ही बुरा महसूस कराता था. पानी की कमी के कारण उनकी सफाई की परेशानी हमेशा रहती थी.

तब से अब तक भारत में कई औरतों के लिए माहवारी की तस्वीर नहीं बदली है. बहुत से हालिया अध्ययनों से पता चला है कि औरतों के स्वास्थ्य के लिए ये सब कितना बड़ा ख़तरा है.

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Image caption लखनऊ में एक कैंपेन के दौरान डिंपल यादव और करीना कपूर

स्कूल नहीं जाती!

शोध से पता चलता है कि ये एक ऐसा विषय है जिसने औरतों की बेहतरी, उनके स्वास्थ्य और स्वच्छता के मसले को प्रभावित किया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार गर्भाशय के मुंह के कैंसर के कुल मामलों में से 27 फ़ीसदी भारत में होते हैं और डॉक्टरों के अनुसार माहवारी के दौरान साफ़-सफाई की कमी इसकी बड़ी वजह है.

रिपोर्टों के मुताबिक़ भारत में हर पांच में से एक लड़की माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जाती है.

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Image caption मार्गदर्शी

'शर्म आती है'

15 साल की मार्गदर्शी उत्तरकाशी के गांव में रहती हैं और स्कूल जाना पंसद करती हैं.

पहाड़ी रास्तों पर लंबा चलकर वो स्कूल जाती हैं, लेकिन पिछले साल जब उन्हें पहली बार माहवारी हुई थी तो उन्होंने स्कूल लगभग छोड़ ही दिया था.

वे कहती हैं, "सबसे बड़ी मुश्किल इसको संभालने में होती है. मुझे शर्म आती है, डर लगता है कि कहीं दाग़ न लग जाए और लोग मेरा मज़ाक न उड़ाए."

मार्गदर्शी बताती हैं, "मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है. समझ नहीं आता है कि इसको लेकर इतनी शर्म क्यों जुड़ी हुई है."

मार्गदर्शी डॉक्टर बनना चाहती हैं और इस बात से हैरान हैं कि जीव विज्ञान की कक्षा में जब माहवारी पर चर्चा होती है तो लड़के इतना हँसते क्यों हैं.

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चुप्पी की संस्कृति

मार्गदर्शी कहती हैं, "ये तो हर लड़की के साथ होता है. इतनी प्राकृतिक और सहज बात से हमें असहज होने पर मजबूर क्यों कर दिया जाता है."

ज़ाहिर है इस थोपी गई शर्म और चुप्पी की संस्कृति से बाहर आने का सिलसिला शुरू हो गया है.

जैसे-जैसे औरतें अपने फ़ैसले ख़ुद करने लगी हैं, वैसे-वैसे तस्वीर भी बदलती जा रही है.

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