सावरकर और उनकी सज़ा-ए काला पानी

सेल्युलर जेल के इसी कमरे में वीर सावरकर को क़ैद रखा गया था. डॉ. दीवान सिंह, योगेंद्र शुक्ल, भाई परमानंद, सोहन सिंह, वामन राव जोशी और नंद गोपाल जैसे लोग भी इसी जेल में क़ैद रहे थे.

यह सेल्युलर जेल का मुख्य द्वार है. अंडमान-निकोबार स्थित इस जेल का इस्तेमाल ब्रिटिश काल में राजनीतिक कैदियों को रखने के लिए किया जाता था. बहुत से लोग इसे काला पानी के नाम से भी बुलाते हैं. आज यह एक राष्ट्रीय स्मारक है.

जेल का निर्माण 1896 में शुरू हुआ और ये 1906 में बनकर पूरा हुआ. इमारत के लिए ईंटें बर्मा से लाई गई थीं. जेल सात हिस्सों में बंटा है. आज़ादी के बाद दो खंड को ध्वस्त कर दिया गया.

क़ैदियों से नारियल का तेल निकालने जैसे काम करवाए जाते थे और उन्हें बाथरूम जाने के लिए भी इजाज़त लेनी होती थी.

ज़ंजीरों का इस्तेमाल बहुत आम बात थी.

फांसी की सज़ा पाए क़ैदियों को यहां सूली पर लटकाया जाता था. 1942 में जापान ने अंडमान द्वीप पर क़ब्ज़ा कर अंग्रेज़ों को खदेड़ दिया था. हालांकि 1945 में दूसरा विश्वयुद्ध ख़त्म होने पर ये फिर से अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े में आ गया.

जेल में अब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पड़ावों को समर्पित कई गलियारे देखे जा सकते हैं.

इस जेल में कुल 693 कमरे थे. सेल बहुत छोटा था और बस छत के पास एक रोशनदान हुआ करता था.

जेल को 1969 में एक राष्ट्रीय स्मारक में तब्दील कर दिया गया. यह जेल अब भारतीयों के लिए 'स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का प्रतीक' है और पर्यटक यहां जाते हैं.

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