#UnseenKashmir: कश्मीरी बच्चों की यह चित्रकारी विचलित कर देगी

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किसी शायर ने कहा है कि बच्चों की दुनिया में मौत नहीं होती. बच्चों की दुनिया में उमंगें होती हैं, ख़्वाब होते हैं, खिलखिलाहट होती है, मुस्कान होती है, खिलंदड़पन होता है. बचपन मासूम होता है, भोला और दुनियावी बुराइयों से अछूता.

मगर भारत प्रशासित कश्मीर के बच्चों की दुनिया अलग-सी लगती है. उनकी दुनिया से भोलापन लापता हो गया है. उनकी मासूमियत भरी मुस्कान कहीं गुम होती जा रही है.

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कश्मीर के बच्चों की दुनिया कैसे दूसरों से अलग है. वीडियो प्रोडक्शन: शालू यादव और नेहा शर्मा.

कश्मीर की कुछ तस्वीरें इस तरफ़ इशारा करती हैं. ये तस्वीरें कश्मीर के बच्चों ने उकेरी हैं.

इन बच्चों ने अपने हाथों से अपनी दुनिया की जो तस्वीरें बनाई हैं, उनमें वहां की हिंसा, ख़ून-ख़ून होती घाटी, सड़कों पर बिखरे पत्थर और बंद घरों की झलक मिलती है.

मासूमों के हाथ की कलाकारी से कश्मीर का दर्द छलककर इन तस्वीरों में फैला-सा दिखता है.

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कश्मीर का अंधेरा

कश्मीरी बच्चों ने अपने हाथों से कश्मीरियों के दिलों में बैठे मौजूदा हालात के आतंक को बयां किया है. आने वाले वक़्त को लेकर जो डर उनके ज़हन में है, उसे भी बच्चों ने अपनी तस्वीरों में उकेरा है. बच्चों के पूरे कैनवास पर लाल रंग हावी है.

कभी वो आग की शक्ल में दिखता है तो कभी ख़ून की. लाल के बाद काले रंग का भी बहुत इस्तेमाल हुआ है. कहीं काला आसमान है तो कहीं काली ज़मीं.

इन तस्वीरों से ऐसा लगता है कि कश्मीर में अंधेरा पूरी तरह से भले ही नहीं छाया, मगर ये बच्चों के मुस्तक़बिल पर, उनके ज़हन पर तेज़ी से हावी होता जा रहा है.

भारत प्रशासित कश्मीर के बच्चों ने अपनी कॉपी में जब रंग भरे तो उसमें मानों कश्मीर के हालात दर्ज हो गए.

कश्मीर की हिंसा दुनिया में सबसे लंबे वक़्त से चले आ रहे 'विवाद' का नतीजा है. आज हालात इतने बिगड़ गए हैं कि वो कश्मीरी बच्चों के ज़हन पर तारी हो गए हैं. आज वहां के बच्चों की दुनिया, वहां के बड़ों के संसार जैसी ही है.

कश्मीर को वहां के ऊंचे, बर्फ़ से ढके पहाड़ों, चरागाहों, बाग़ों और नदियों-धाराओं की वजह से जाना जाता था.

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धरती का जन्नत

इसी क़ुदरती ख़ूबसूरती पर फ़िदा एक मुग़ल बादशाह ने इसे धरती पर जन्नत कहा था.

कश्मीर के बारे में मशहूर शायर अमीर ख़ुसरो ने कहा था, 'गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीं अस्त, हमी अस्तो, हमी अस्तो हमी अस्तो.' मतलब धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है.

मगर आज कश्मीर के बच्चों की चित्रकारी में वो कश्मीर नहीं दिखता जिसे धरती की जन्नत कहा जाता था.

आज बच्चे पत्थरबाज़ प्रदर्शनकारियों की, बंदूकें ताने सुरक्षाकर्मियों की, जलते हुए स्कूलों की और मलबे से भरी सड़कों की तस्वीरें बना रहे हैं.

आज कश्मीरी बच्चों के कैनवास पर ख़ून बिखरा है. लाशें बिछी हैं. गोलियां चल रही हैं. कश्मीर में पिछले साल गर्मी का मौसम बेहद हिंसक दौर वाला रहा था.

साल 2016 में चरमपंथी बुरहान वानी के सुरक्षाबलों के हाथों मारे जाने के बाद, कश्मीर में ज़बरदस्त हिंसा भड़क उठी थी.

सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच भिड़ंत में सौ से ज़्यादा लोग मारे गए थे. मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी चार महीने से ज़्यादा वक़्त तक जलती रही थी.

प्रदर्शनकारियों को क़ाबू करने के लिए सुरक्षा बलों ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया. इसकी वजह से बहुत से प्रदर्शनकारियों की आंखों की रोशनी चली गई.

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बेक़ाबू हिंसा

हिंसक प्रदर्शनों में 9 हज़ार से ज़्यादा लोग ज़ख्मी हुए थे. इनमें पंद्रह साल से कम उम्र के क़रीब 1200 बच्चे भी थे.

पैलेट गन की वजह से कई बच्चों की एक आंख ख़राब हुई तो बहुत से बच्चों की आंखों की रोशनी पूरी तरह से चली गई.

जब हिंसा बेक़ाबू हो गई तो स्कूल बंद करने पड़े. कश्मीर के बच्चे अपने घरों के क़ैदी बनकर रह गए. उनका ज़्यादा वक़्त टीवी पर हिंसा की ख़बरें देखते हुए बीतता था जिसमें हिंसक हालात ही बयां होते थे.

बाक़ी वक़्त में बच्चे पढ़ते थे और ड्रॉइंग बनाते थे. बच्चों को अपने दोस्तों की याद आती थी. उन्हें खेल के मैदान, क्रिकेट के मैच याद आते थे.

घर में बंद बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर आया करते थे. कई बच्चों ने घरों पर ही इम्तिहान दिए. एक स्कूल ने तो एक इनडोर स्टेडियम में इम्तिहान कराया.

आख़िरकार सर्दियों में स्कूल खुले. महीनों बाद जब बच्चे स्कूल पहुंचे तो वो ग़ुस्से में थे. खीझे हुए थे, बेहद नर्वस थे और अपने भविष्य को लेकर बेहद फ़िक्रमंद थे.

ये बच्चे सरकारी मुलाज़िमों के थे, कारोबारियों के थे, डॉक्टरों, इंजीनियरों, बैंक कर्मचारियों और किसानों के थे.

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कश्मीरी बच्चों का गुस्सा

स्कूल पहुंचते ही ये बच्चे अपने दोस्तों से मिलकर रो पड़े. उन्होंने एक-दूसरे को गले लगा लिया.

महीनों तक अपने घर में क़ैद रहे बच्चे अपने टीचर से बस यही सवाल कर रहे थे-आख़िर उनके स्कूल क्यों बंद किए गए थे?

कुछ बच्चों का बर्ताव तो बेहद अजीब था. वो बेबात ही चीख़ने लगते थे. टेबल पर मुक्के मारते थे. वो बिना वजह ही क्लास में फ़र्नीचर तोड़ने लगते थे.

बच्चों को समझाने के लिए, उन्हें शांत करने के लिए काउंसलर की मदद लेनी पड़ी. एक स्कूल के प्रिंसिपल ने मुझे बताया कि, 'बच्चों के अंदर बहुत ग़ुस्सा भरा हुआ था.'

महीनों बाद स्कूल लौटे इन बच्चों में से क़रीब तीन सौ बच्चे एक स्कूल के हॉल में इकट्ठा हुए. उन्होंने कागज और रंग निकाले और तस्वीरें बनाने लगे.

प्रिंसिपल ने बताया कि पहले दिन इन बच्चों ने सिर्फ़ तस्वीरें बनाईं. पूरे दिन बच्चे ड्राइंग बनाते रहे. वो बेहद ख़ामोशी से अपना काम कर रहे थे.

किसी ने एक लफ़्ज़ भी नहीं बोला. ये मंज़र हिला देने वाला था. बच्चों ने रंगों और पेंसिल से तस्वीरें बनाईं. कई बच्चों ने तस्वीरों के ऊपर कुछ-कुछ लिखा भी.

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पैलेट गन

किसी ने बबल की मदद से जज़्बात बयां किए, तो किसी ने टीवी की नक़ल करके सुर्ख़ियां बनाईं. किसी ने पूरा का पूरा वाक्य लिखकर अपनी भावनाएं ज़ाहिर कीं.

बच्चों की बनाई इन तस्वीरों में घाटी में लगी आग साफ़ दिखती है. सड़कों पर पत्थर बिखरे हुए हैं. कुछ तस्वीरों में काला मलबा दिखता है. आसमान पर जलता हुआ सूरज है.

हवा में परिंदे दिखते हैं. मगर ज़मीन पर हिंसा के निशान ही दिखाई देते हैं. बच्चों ने जो तस्वीरें बनाईं उनमें जख़्मी चेहरे हैं.

पैलेट गन से अपनी आंखें गंवा चुके लोग हैं. ज़्यादातर बच्चों की तस्वीरों में यही मंज़र है.

एक तस्वीर में एक शख़्स को ये कहते हुए दिखाया गया है कि, 'मैं फिर से दुनिया नहीं देख सकूंगा. मैं अपने दोस्तों को अब कभी नहीं देख सकूंगा. मैं अब अंधा हो गया हूं'.

बच्चों की दुनिया जिसके बारे में कहा जाता है कि जहां हिंसा और मौत के लिए जगह नहीं होती, वो दुनिया इन तस्वीरों में ख़ून और अंधेरे से भरी दिखाई देती है.

कुछ बच्चों की बनाई पेंटिंग में सड़कों पर बिखरी लाशें हैं, हिंसक प्रदर्शन कर रहे लोग भी हैं.

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सियासी संदेश

अनंतनाग के एक बच्चे ने अपनी तस्वीर को कुछ इस तरह बयां किया, 'ये कश्मीर के पहाड़ हैं. ये बच्चों का एक स्कूल है. बायीं ओर सेना के जवान हैं और उनके सामने पत्थर फेंक रहे प्रदर्शनकारी हैं, जो आज़ादी मांग रहे हैं'.

बच्चा आगे कहता है, 'जब प्रदर्शनकारी पत्थर फेंकते हैं तो सेना के जवान गोलियां चलाने लगते हैं. इस गोलीबारी में एक स्कूली बच्चा मारा जाता है और फिर उसका दोस्त तन्हा रह जाता है'.

कश्मीरी बच्चों की ड्रॉइंग में एक और बात भी ख़ूब दिखती है. इन तस्वीरों में कई ऐसी हैं जो स्कूल जलाए जाने की घटनाओं को बयां करती हैं.

एक तस्वीर में एक स्कूल में आग लगी है और उसमें एक बच्चा फंसा हुआ है. वो चीख रहा है कि हमारी मदद करो...मदद करो...हमारे स्कूल को बचा लो...हमारे भविष्य को बचा लो.

कुछ तस्वीरों में ग़ुस्सा है तो किसी में सियासी संदेश भी है. बहुत सी ड्रॉइंग में आज़ादी के समर्थन वाले चित्र हैं. कई पेंटिंग ऐसी हैं जिसमें हमारा कश्मीर बचा लिखे हुए साइनबोर्ड हैं.

वहीं कई ड्रॉइंग में बुरहान वानी की तारीफ़ और भारत विरोधी नारे है. कुछ बच्चों ने कश्मीर का नक़्शा बनाया है जिससे ख़ून बह रहा है.

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मोबाइल और इंटरनेट

दक्षिण कश्मीर के एक गांव में कुछ बच्चों ने अपने घरों की तस्वीरें बनाई थीं जिन पर भारत का झंडा लगा हुआ था.

एक बच्चे ने एक त्योरी चढ़ाए हुए इंसान की तस्वीर बनाई थी जिसका चेहरा दो हिस्सों में बंटा हुआ था.

ये कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की खींचतान को ज़ाहिर कर रहा था और इस होड़ में फंसे कश्मीर की तकलीफ़ तस्वीर के ज़रिए बयां की गई थी.

एक और तस्वीर जो पेंसिल से उकेरी गई थी जिसमें एक मां अपने बेटे का इंतज़ार कर रही है. ये तस्वीरें हिला देने वाली हैं.

कश्मीरी बच्चों ने हिंसक प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन पर लगी रोक पर भी ग़ुस्सा जताया.

पांच साल पहले ऑस्ट्रेलिया की आर्ट थेरेपिस्ट डेना लॉरेंस ने कश्मीरी युवाओं और बच्चों के लिए कुछ कक्षाएं लगाई थीं.

डेना ने देखा कि इन युवाओं और किशोरों की पेंटिंग में सबसे ज़्यादा स्याह रंग का इस्तेमाल हुआ था. डेना के मुताबिक़ ज़्यादातर तस्वीरों में बच्चों ने ग़ुस्से और डिप्रेशन के जज़्बात बयां किए थे.

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माहौल का असर

कश्मीरी कलाकार मसूद हुसैन 4 से 16 बरस के बच्चों के बीच आर्ट के मुक़ाबलों में जज बनते रहे हैं. मसूद कहते हैं कि बच्चों की कला के विषय अब तब्दील हो गए हैं.

हुसैन के मुताबिक़ पहले की तस्वीरों में अमन झलकता था. आज उसकी जगह हिंसा ने ले ली है. आज वो लाल फ़लक उकेरते हैं. वो बंदूकों, टैंकों, सड़क पर हिंसा की तस्वीरें बनाते हैं. आज कश्मीरी बच्चे मरते हुए लोगों की तस्वीरें अपने कैनवास पर उकेर रहे हैं.

श्रीनगर के मनोवैज्ञानिक अरशद हुसैन कहते हैं कि बच्चों की कला में उनकी तकलीफ़ की झलक मिलती है.

अरशद हुसैन कहते हैं, 'हमें लगता है कि बच्चे कुछ नहीं समझते. ऐसा नहीं है. उनके ऊपर आस-पास के माहौल का असर होता है. वो हालात को अपने भीतर जज़्ब कर लेते हैं. फिर उसे अपने-अपने तरीक़ों से ज़ाहिर करते हैं'.

अरशद याद दिलाते हैं कि हिंसक हालात की तस्वीरें बनाने वाले वो बच्चे हैं जो महीनों तक घरों में क़ैद रहे थे. वो कहते हैं कि ज़रा सोचिए, वो बच्चे कैसी तस्वीरें बनाएंगे जो सड़कों पर हो रहे हिंसक प्रदर्शन का हिस्सा हैं.

कश्मीरी बच्चों की बनाई ड्रॉइंग, 9/11 के हमले के बाद अमरीकी बच्चों की बनाई पेंटिंग की याद दिलाती है.

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अमन का पैगाम

अमरीकी बच्चों ने उस हमले के बाद रोते हुए बच्चों, आग में झुलस रहे ट्विन टावर्स और ओसामा बिन लादेन के उसे गिराते हुए मंज़र की तस्वीरें उकेरी थीं.

उस वक़्त अमरीकी बच्चों ने भी सुर्ख़, जलते हुए फ़लक को अपने कैनवास पर उकेरा था. एक पेंटिंग में एक डरी हुई बच्ची आई लव न्यूयॉर्क लिखी हुई टी-शर्ट पहने दिखाई गई थी.

कश्मीर में परियों की कहानियां, बुरे ख़्वाबों तब्दील होते वक़्त नहीं लगता. लेकिन अभी भी हालात इतने नहीं बिगड़े कि संभाले न जा सकें.

एक बच्चे की बनाई तस्वीर में एक बच्ची गुज़ारिश करती दिख रही है कि हमारा भविष्य सुनहरा बनाओ. हमें पढ़ाओ लिखाओ. मौजूदा हालात के बहाने हमारे भविष्य को अंधकारमय न बनाओ.

यानी अभी भी बच्चों को उम्मीद है. अभी भी उनके ज़हन में सुनहरे ख़्वाब हैं. ज़रूरत है उन आंखों में बसे ख़्वाबों की ताबीर की.

कश्मीर को ज़रूरत है, अमन के पैग़ाम की. इन बच्चों को इसका बेसब्री से इंतज़ार है.

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(कश्मीर पर बीबीसी की विशेष सिरीज़ की पहली कड़ी)

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