क़ातिल नेवी अफ़सर जिस पर 'मुल्क' था क़ुर्बान

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27 अप्रैल, 1959 का दिन था. बंबई पुलिस के उप कमिश्नर जॉन लोबो मुंबई की चिपचिपाती गर्मी से बचने के लिए नीलगिरि के पहाड़ों में जाने की योजना बना रहे थे.

लेकिन तभी शाम पांच बजे उनके फ़ोन की घंटी बजी. नौसेना के कमांडर सैमुअल लाइन पर थे. 'कमांडर नानावती आप से मिलने आ रहे हैं. अभी वो मेरे पास ही थे.'

लोबो ने पूछा, 'हुआ क्या है?' सैमुअल का जवाब आया, 'उनका एक आदमी से झगड़ा हुआ था, जिसे उन्होंने गोली मार दी है.'

कुछ देर बाद लोबो को अपने कमरे के बाहर एक आवाज़ सुनाई दी, 'लोबो साहब का कमरा कहाँ है?'

नौसेना की सफ़ेद वर्दी पहने हुए एक लंबा शख़्स उनके कमरे में दाखिल हुआ. उसने अपना परिचय कमांडर नानावती कह कर कराया.

नानावती ने बिना कोई वक्त ज़ाया करते हुए कहा, 'मैंने एक शख़्स को गोली मार दी है.'

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नानावटी केस पर आधारित पत्रकार बची करकरिया की किताब ‘इन हॉट ब्लड’ पर रेहान फ़ज़ल की विवेचना

नानावटी को झटका

लोबो ने जवाब दिया, 'वो मर चुका है. अभी-अभी गामदेवी पुलिस स्टेशन से मेरे पास एक संदेश आया है.'

ये सुनते ही नानावती का मुंह पीला पड़ गया. कुछ सेकेंड तक कोई कुछ नहीं बोला.

लोबो ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, 'आप एक प्याला चाय पीना पसंद करेंगे?' 'नहीं मुझे सिर्फ़ एक ग्लास पानी चाहिए,' पसीने से तर नानावती ने जवाब दिया.

किस्सा कुछ यूँ था कि उस दिन आईएनएस मैसूर के सेकेंड-इन-कमान लेफ़्टिनेंट कमांडर नानावती कुछ दिन बाहर रहने के बाद जब वापस अपने घर लौटे तो उन्होंने अपनी अंग्रेज़ पत्नी सिल्विया का हाथ अपने हाथों में लेना चाहा, तो उन्होंने उसे झटक दिया.

आहत नानावती ने जब सिल्विया से पूछा, 'क्या अब तुम मुझे प्यार नहीं करतीं?', सिल्विया ने कोई जवाब नहीं दिया.

नानावती ने फिर ज़ोर दे कर पूछा, 'क्या हमारे बीच कोई दूसरा शख़्स आ गया है?' इसका जो जवाब सिल्विया ने दिया, उसको न सुनने के लिए नानावती पूरी दुनिया क़ुर्बान कर सकते थे.

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Image caption बची करकरिया की किताब 'इन हॉट ब्लड द नानवती केस दैट शुक इंडिया'

बची करकरिया की किताब

लेकिन कवास नानावती ने अपनी पत्नी से एक शब्द भी नहीं कहा. इसके बाद वो दोनों अपने कुत्ते को दिखाने डॉक्टर के पास ले कर गए.

लौट कर उन्होंने शोरबेदार कटलेट्स और प्रॉन करी और चावल का भोजन किया और पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार नानावती ने सिल्विया और बच्चों को अंग्रेज़ी फ़िल्म 'टॉम थंब' का मैटिनी शो दिखाने के लिए मेट्रो सिनेमा पर छोड़ दिया.

इसके बाद नानावती अपने पोत पर गए जहाँ से उन्होंने .38 स्मिथ एंड बेसन रिवॉल्वर निकाली और अपनी पत्नी के प्रेमी प्रेम आहूजा को उनके घर जा कर गोली से उड़ा दिया.

उस समय आहूजा, नहाने के बाद कमर पर तौलिया लपेटे, आईने के सामने अपने बालों में कंधी कर रहे थे.

'इन हॉट ब्लड द नानवती केस दैट शुक इंडिया' की लेखिका बची करकरिया बताती हैं, ''मुझे इस केस में सबसे ख़ास बात ये लगी कि ये मामूली हत्या का केस इतनी ऊँचाई तक पहुंच गया कि प्रधानमंत्री नेहरू तक को इसके बारे में प्रेस को जवाब देना पड़ा. जब हाईकोर्ट ने नानावती को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई तो चार घंटे के भीतर बंबई के राज्यपाल ने आदेश दे दिया कि इस फ़ैसले को तब तक स्थगित रखा जाए जब तक नानावती की अपील पर फ़ैसला नहीं आ जाता. इसकी समीक्षा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को बैठना पड़ा. एक अडल्ट्री के केस में ऐसा पहली बार हुआ था. इस केस में रक्षा मंत्री से ले कर प्रधानमंत्री तक को बीच में पड़ना पड़ा. ये एक अजीब-सा केस था जिसमें प्रेम था, दग़ाबाज़ी थी, ऊँचे समाज का अपराध था. यही वजह है कि इस घटना को हुए 58 साल बीत चुके हैं, लेकिन लोगों की दिलचस्पी अभी तक इस केस में बनी हुई है.''

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Image caption राम जेठमलानी को नानावती केस ने राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया

नामचीन वकील

उस समय भारत के चोटी के वकीलों ने दोनों पक्षों की ओर से अपनी अपनी दलीलें रखीं. नानावती ने मशहूर क्रिमिनल वकील कार्ल खंडालवाला की सेवाएं लीं.

खंडालवाला ने ये कहते हुए अपने तर्कों का अंत किया कि वो अपने मुवक्किल के लिए सहानुभूति या दया की मांग नहीं करेंगे क्योंकि उनकी नज़रों में उन्होंने कोई अपराध किया ही नहीं है.

बाद में रजनी पटेल, वाई वी चंद्रचूड़, ननी पालखीवाला, एम सी सीतलवाड, सी के दफ़्तरी और गोपाल स्वरूप पाठक ने एक न एक पक्ष की ओर से बहस में हिस्सा लिया.

उस ज़माने में अपना करियर शुरू कर रहे राम जेठमलानी को तो इस केस ने राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया.

करकरिया बताती हैं, ''उस समय राम जेठमलानी काफ़ी जूनियर वकील थे और पब्लिक प्रॉसीक्यूटर नहीं थे. प्रेम आहूजा की बहन मैमी ने एक पर्यवेक्षक की तरह उनकी सेवाएं ली थीं. जेठमलानी उस समय भी बहुत होशियार वकील थे. उनका तर्क था कि अगर खंडालवाला की इस दलील को सही माना जाए कि गोलियाँ हाथापाई के बाद चलीं, तो प्रेम भाटिया का तौलिया गोलियाँ लगने के बाद भी उनकी कमर से चिपका क्यों रह गया? उनकी दलीलों की वजह से ही डिफ़ेस की इतनी बड़ी कहानी धराशाई हो गई.''

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Image caption नानावती और सिल्विया

नौसेना के बड़े अधिकारी

प्रेम आहूजा की तरफ़ से बहस कर रहे सी एम त्रिवेदी ने कार्ल खंडालवाला की उस दलील की काट पेश की कि ये गोलियाँ दुर्घटनावश चली थीं और नानावती का इरादा प्रेम अहूजा को मौत के घाट उतारने का नहीं था.

अदालत में बोलते हुए त्रिवेदी ने कहा, ''मेरे प्रतिद्वंदी की बातें ठोस तथ्यों और दलीलों की जगह नहीं ले सकतीं. मुझे तो बहुत शक है कि वो अदालत में बोल रहे हैं या किसी नाटक के मंच पर. मैं जूरी को आगाह करना चाहता हूँ कि इस शख़्स के दिखावे और बड़े तमग़ों की कतारों से प्रभावित न हों. वो इस बात से भी प्रभावित न हों कि नौसेना के बड़े से बड़े अधिकारी इस शख़्स के चरित्र को सही ठहराने के लिए इस अदालत में आ कर गवाही दे रहे हैं. मुझे तो ऐसा लग रहा है कि पूरी नौसेना, नागरिक प्रशासन से लड़ाई पर उतर गई है. सच मानिए, ये पूरा मामला एक प्रेम त्रिकोण का है और ये आदम और हव्वा के ज़माने से होता आ रहा है.''

ललिता रामदास पूर्व नौसेनाध्यक्ष ऐडमिरल रामदास की पत्नी हैं. जिस समय ये घटना हुई थी, वो कॉलेज में पढ़ रही थीं. उस समय के नौसेनाध्यक्ष ऐडमिरल रामदास कटारी उनके पिता थे. चूंकि नानावती उनके पिता के प्रिय अफ़सर थे, ललिता उन्हें अंकल कह कर बुलाती थी.

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आर्थर रोड जेल

ललिता रामदास याद करती हैं, 'जब मैं पहली बार नानावती से मिली तो वो लेफ़्टिनेंट हुआ करते थे. ये सब हमारे घर पर आते थे, खाना खाते थे और गप्पें लगाते थे. मेरे पिता ऐडमिरल रामदास आज़ादी के बाद पहले भारतीय नौसेनाध्यक्ष बनाए गए थे. मेरी नज़र में नानावती बहुत ही पेशेवर नौसैनिक अधिकारी थे. मुझे याद है जब इन दोनों की शादी हुई थी. सिल्विया बहुत सुंदर थीं. नानावती बहुत डैशिंग थे और लोग हम उनको हीरो वरशिप किया करते थे. गज़ब के कपल थे वो दोनों.'

दिलचस्प बात ये थी कि कमांडर नानावती को उनकी गिरफ़्तारी के बाद आर्थर रोड जेल में न रख कर नौसेना की जेल में रखा गया था.

कहा तो यहाँ तक जाता था कि उनके कुत्ते तक को उनसे मिलवाने नौसेना की उस जेल में ले जाया जाता था.

जब भी नानावती अदालत में सुनवाई के लिए आते, वो नौसेना की सफ़ेद बुर्राक वर्दी पहने हुए होते और उनको मिले तमग़े उन पर चमक रहे होते. मैंने बची करकरिया से पूछा, ''क्या उन्होंने ऐसा अपने वकीलों की सलाह पर किया था?''

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'ब्लिट्ज़' का समर्थन

बची का जवाब था, ''ऐसा लगता है कि ऐसा उन्होंने जानबूझ कर किया था. एक तो वो लंबे-चौड़े थे... छह फ़ीट से ऊँचा उनका कद था. अदालत में ये चीज़ बारबार कही गई कि नानावती की गिनती भारतीय नौसेना के सबसे काबिल अफ़सरों में होती है. ऐसा लग रहा था कि प्रेम ने उनकी बीबी को अपने प्रेम जाल में फंसा कर ग़ैर देशभक्तिपूर्ण काम किया था.''

इस पूरे मामले में बंबई से छपने वाला अंग्रेज़ी टैबलॉएड 'ब्लिट्ज़' खुल कर नानावती के समर्थन में उतर आया.

आजकल आमतौर से अपराधी का मीडिया ट्रायल किया जाता है, लेकिन तब 'ब्लिट्ज़' ने पीड़ित का मीडिया ट्रायल कर एक नई मिसाल कायम की थी.

सबीना गडियोक जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के एके किदवई मीडिया रिसर्च सेंटर में प्रोफ़ेसर हैं जिन्होंने इस हत्याकांड के उस समय के मीडिया कवरेज पर एक लेख लिखा है.

सबीना बताती हैं, ''टेलीविज़न युग से पहले नानावती केस एक तरह का मीडिया इवेंट था. प्रेम आहूजा के नाम पर तौलिए बिकने लगे और हॉकर आवाज़ें लगाने लगे, आहूजा का तौलिया... मारेगा तो भी नहीं गिरेगा.''

Image caption बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ सबीना गडियोक

राष्ट्रीय महत्व

जब नानावती कोर्ट में जाते थे तो लड़कियाँ खड़े हो कर उन पर फूल फेंकती थीं. ब्लिट्ज़ ने सुनिश्चित किया कि हर क़ानूनी लड़ाई हारने के बावजूद नानावती दिमाग़ और दिल की लड़ाई जीतें.

शायद इसी वजह से उन्हें माफ़ी भी मिली, लेकिन उन्हें अपने ऊँचे उठते करियर से हाथ धोना पड़ा. इस तरह से एक स्कैंडल को राष्ट्रीय महत्व मिल गया.

ये एक ऐसा समय नहीं था जिसे राजनीतिक रूप से ठंडा कहा जा सके. पाकिस्तान के साथ भारत का तनाव बढ़ रहा था. चीन के साथ भी भारत के मतभेद शुरू हो चुके थे.

नए राज्यों का गठन हो रहा था. केरल में पहली कम्युनिस्ट सरकार का गठन हो चुका था. लेकिन इसके बावजूद हर जगह नानावती केस की चर्चा हो रही थी. दिल्ली के अख़बारों में भी इसका काफ़ी ज़िक्र था.'

मीडिया कवरेज का ही असर था कि अपराध करने के बावजूद पूरे देश की सहानुभूति नानावती के साथ थी. यहाँ तक कि कुछ हलकों में इस मुक़दमे की तुलना महात्मा गांधी की हत्या के मुक़दमे से की गई थी.

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Image caption नानावटी के बचाव में तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन खुल कर आ गए थे और यहां तक कि नेहरू को भी इस बारे में बयान देना पड़ा था

गांडी हत्याकांड से तुलना

सबीना बताती हैं, 'इंडियन एक्सप्रेस ने न सिर्फ़ इसकी गांधी हत्याकांड बल्कि बंगाल के भुवाल संन्यासी मुकदमे, मेरठ कॉन्सपिरेसी केस और यहाँ तक कि भगत सिंह के मुकदमे से भी इसकी तुलना की.'

ब्लिट्ज़ इस हद तक गया कि उसने ये तर्क भी दे डाला कि कमांडर नानावती को सिर्फ़ इसलिए छोड़ दिया जाए कि चीन के साथ युद्ध में उनके विशाल अनुभव का फ़ायदा उठाया जा सके.

ये पहला मौका था जब नौसेनाध्यक्ष ऐडमिरल कटारी ख़ुद अपने कैनबरा विमान से उड़ कर नानावती के पक्ष में गवाही देने बंबई पहुंचे थे. पूरी नौसेना और यहाँ तक कि रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन भी खुल कर नानावती के समर्थन में आ गए थे.

बची करकरिया बताती हैं, ''रक्षा मंत्री ने कई कदम आगे बढ़ कर नानावती का समर्थन किया. नानावती लंदन में भारतीय उच्चायोग में नैवेल अटाशी के पद पर काम कर चुके थे. शायद उस समय से मेनन उनको जानते थे. नेहरू तक ने सफाई दी कि नानावती के किसी परिवार वाले ने उनकी सिफ़ारिश उनसे नहीं की थी. लेकिन नौसेनाध्यक्ष ने ज़रूर कहा था कि नानावती बहुत काबिल अफ़सर हैं, इसलिए उनके साथ इतनी सख़्ती से पेश नहीं आया जाए.'

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Image caption नानावती पर कई फ़िल्में बनीं, इनमें सुनील दत्त और लीला नायडू अभिनीत 'ये रास्ते हैं प्यार के' भी एक थी

नानावती पर फ़िल्में

लेकिन तमाम जन समर्थन के बावजूद कवास नानावती सारी कानूनी लड़ाइयाँ हार गए और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई.

पर नानावती को बहुत अधिक समय तक जेल में नहीं रहना पड़ा. महाराष्ट्र की तत्कालीन राज्यपाल विजयलक्ष्मी पंडित ने उनकी सज़ा समाप्त करते हुए उन्हें क्षमादान दे दिया.

नानावती और सिल्विया की इस कहानी को भारत ही नहीं दूसरे देशों में भी काफ़ी कवरेज मिली. टाइम और न्यूयॉर्कर ने इस पर कहानियाँ की.

इस विषय पर कम से कम तीन हिंदी फ़िल्में बनाई गईं.

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Image caption सिल्विया (बाएं से पहलीं) अभी भी जीवित हैं और नानावती (बाएं से दूसरे) का 2003 में निधन हो गया

नानावती का निधन

प्रोफ़ेसर सबीना गडियोक बताती हैं, "एक फ़िल्म बनी 'ये रास्ते हैं प्यार के', फिर एक फ़िल्म बनी 'अचानक' और हाल में एक और फ़िल्म बनी 'रुस्तम' जिसमें इस कहानी को आधार बनाया गया. सलमान रुश्दी की 'मिडनाइट चिल्ड्रेन' में भी इसकी झलक दिखाई दी. साल 2002 में इंदिरा सिन्हा ने इस पर एक उपन्यास लिखा, 'द डेथ ऑफ़ मिस्टर लव.' रोहिंटन मिस्त्री की किताब 'सच ए लॉन्ग जर्नी' में भी इसका ज़िक्र किया गया. दो साल पहले आई फ़िल्म 'बॉम्बे वेलवेट' में भी इस प्रकरण को याद करते हुए एक गाना फ़िल्माया गया, 'ये तूने क्या किया, सिल्विया."

17 मार्च, 1964 को नानावती को लोनावला के एक बंगले, 'सनडाउन' से रिहा कर दिया गया. यहाँ वो एक-एक महीने के परोल पर पिछले छह महीनों से रह रहे थे.

नानावती ने तीन साल से भी कम समय जेल में बिताया. जेल से छूटते ही नानावती अपनी पत्नी सिल्विया के साथ कनाडा जा कर वहीं बस गए.

वहाँ सन 2003 में उनका देहांत हो गया. उनकी पत्नी सिल्विया अभी भी जीवित हैं, लेकिन इस मुदे पर किसी से बात नहीं करना चाहतीं.

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