दिल्ली: पेशाब करने से रोका तो रिक्शे वाले को पीट-पीटकर मार डाला

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उत्तरी दिल्ली के गुरु तेगबहादुर मेट्रो स्टेशन के सामने न्यू किशोर मार्केट बस्ती में मातम है.

32-वषीय र्ई-रिक्शा ड्राइवर रविंदर कुमार की हत्या से लोग सकते में हैं. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

सोमवार दोपहर को करीब साढ़े बारह बजे लाल बत्ती और तेज़ सायरन के साथ आई पुलिस की सफ़ेद गाड़ी हमारे पास में रुकी.

गाड़ी में रविंदर का सफ़ेद चादर में लिपटा शव रखा था. अपने भाई का शव उठाने के लिए विजेंद्र और उनके साथी गाड़ी की ओर भागे.

शव देखते ही लोगों के सब्र का बांध टूट गया. पुरुष, महिलाएं, बच्चे, सबकी आंखें नम थीं.

कुछ लोग 12-13 साल के एक रोते बिलखते बच्चे को संभालने की कोशिश कर रहे थे.

जल्द ही रोने की आवाज़ों ने ट्रैफ़िक के शोर को डूबा दिया.

बस्ती के मुहाने पर रखे रविंदर के शव को जिसने भी देखा, उसको विश्वास नहीं हुआ.

चश्मदीदों के मुताबिक, ई-रिक्शा ड्राइवर रविंदर ने दो छात्रों को शौचालय में जाकर पेशाब करने को कहा.

आरोप है कि टोकने से गुस्साए 20-25 छात्रों ने बाद में वहीं आकर रविंदर को पीटकर मार डाला.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रविंदर की हत्या की निंदा की और प्रशासन से अपराधियों को सज़ा देने के लिए कहा है.

नौ मई को थी शादी की सालगिरह

बस्ती की मुख्य गली में घुसते ही 50 मीटर आगे रविंदर का घर पड़ता है.

घर के ऊपरी हिस्से पर सीढ़ी से पहुंचना पड़ता है. रविंदर यहीं अपनी पत्नी के साथ रहते थे.

वह यहीं पैदा हुए, यहीं बड़े हुए, यहीं उनकी शादी हुई और आज इस बस्ती को उन्होंने हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.

नौ मई को उनकी शादी की पहली सालगिरह थी.

घर के बाहर कुछ महिलाएं उनकी पत्नी और मां को ढांढस बंधा रहीं थीं लेकिन जैसे ही रविंदर का शव आया, उनका खुद पर काबू नहीं रहा.

Image caption रविंदर के भाई विजेंद्र

अंतिम दर्शन के बाद वो बस्ती की संकरी गली में दरवाज़े के मुहाने के सामने बैठ गईं.

कुछ महिलाएं उन्हें संभालने की कोशिश कर रही थीं.

शनिवार करीब डेढ़ बजे का वक्त था. प्रमोद, रविंदर और आरिफ़ जीटीबी मेट्रो स्टेशन के सामने खाना खा रहे थे.

पास ही दो लड़के बीयर पी रहे थे. बीयर पीने के बाद एक लड़के ने पास ही पेशाब करना शुरू कर दिया.

प्रमोद बताते हैं, "हमने लड़के को मना किया, कहा कि हम यहां खाना खा रहे हैं, आप यहां पेशाब न करो. उन्होंने गाली गलौज शुरू कर दी. दोनो ने ड्रिंक कर रखी थी."

कुछ ही देर में पास खड़े दो-चार रिक्शे वाले और इकट्ठा हो गए.

प्रमोद कहते हैं, "जाते जाते एक लड़के ने धमकी दी. कहा, अभी मेरा पेपर है इसलिए जा रहा हूं, शाम को बताऊंगा."

रविंदर ने इस धमकी पर ध्यान नहीं दिया और काम में जुट गए.

प्रमोद के मुताबिक उन्हीं दो लड़कों में से एक को उनका साथी किरोड़ीमल कॉलेज छोड़कर आया.

रात साढ़े आठ बजे जब रविंदर सवारी ले जा रहे थे तभी 20-25 लड़के वहां इकट्ठा हो गए. उन्होंने रविंदर और साथी ड्राइवरों को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया.

'गमछे में ईंट बाधकर उससे मारा'

जिन ई-रिक्शा ड्राइवरों की पिटाई हुई, उनमें मनोज भी एक थे.

वो बताते हैं, "शनिवार रात साढ़े आठ बजे मैं सवारी भर रहा था तभी करीब 20-25 लड़के आए. उन्होंने रविंदर और साथी ड्राइवरों पर हमला कर दिया. उन्होंने गमछे में ईंट बांध रखी थी. उन्होंने रविंदर को उससे घुमा-घुमाकर मारा."

मनोज किसी तरह खुद को छुड़ाकर परिवार को बुलाने भागे.

मनोज कहते हैं, "रविंदर के सीने समेत शरीर के हर हिस्से पर चोट लगी थी. जब तक मैं परिवार को वहां बुलाकर लाता तब तक लोग जा चुके थे."

मेट्रो स्टेशन के बाहर आइसक्रीम का ठेला लगाने वाले कालूराम भी हमले के वक्त वहीं थे.

डर से सहमे कालूराम बताते हैं, "एक (हमलावर) ने कहा कि वो बुराड़ी का रहने वाला है. एक (और) ने कहा कि मैं संतनगर का रहने वाला हूं. देखने से लग रहा था कि वो छात्र हैं."

मनोज और कालूराम बताते हैं जिस किसी ने भी बीच बचाव या रविंदर को बचाने की कोशिश की, लड़के उसे ही मारने लगे.

इसी दौरान एक रिक्शा चालक दौड़कर बस्ती में घटना के बारे में भाई विजेंद्र को बताने आया.

विजेंद्र अपने घर में लेटे हुए थे. जब तक वो घटनास्थल पर पहुंचते, हमलावर जा चुके थे.

जब तक रविंदर रिक्शे पर हिंदुराव अस्पताल पहुंचते, उनकी मौत हो चुकी थी.

रविंदर की एक महिला पड़ोसी कहती हैं, ''हम तो कहते हैं कि उन लड़कों को पब्लिक के हवाले कर दीजिए. हमारे सामने बच्चा छोटे से बड़ा हुआ था."

वो कहती हैं, "उनकी मां और पत्नी शोक में हैं. लोग आ जा रहे हैं तो पता चल नहीं रहा है. जब लोग चले जाएंगे, अकेलेपन में बेटा सामने नहीं आएगा तब पता चलेगा तब पता चलेगा."

रविंदर के बारे में उनके नज़दीकी भूपेंद्र बताते हैं, 'बहुत अच्छे नेचर का बंदा था. हर किसी से मिलकर बोलकर चलता था. '

बस्ती के सभी लोग सन्नाटे में हैं. पहले कभी भी किसी ने ऐसी घटना नहीं देखी, न सुनी.

एक शख्स ने कहा, "यहां रोज़ कमाने खाने वाले लोग रहते हैं. कुछ सब्ज़ी बेचते हैं. कुछ रिक्शा चलाकर गुज़ारा करते हैं. अगर ये रविंदर के साथ हुआ तो हमारे साथ भी हो सकता है."

रविंदर की एक अन्य पड़ोसी कहती हैं, "शहर में हम गांव की तरह, परिवार की तरह रहते हैं. लड़ते हैं लेकिन फिर एक जुट हो जाते हैं. इस घटना पर विश्वास नहीं होता."

बस्ती में डर का माहौल है. चश्मदीद अपनी तस्वीरें नहीं खिंचवाना चाहते. उन्हें लगता है कि कहीं हमलावर उन्हें ढूंढते बदला लेने बस्ती में न आ जाएं.

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