घर में आईसीयू: बिल भी बचेगा, सेहत भी सुधरेगी

  • 2 जून 2017
आईसीयू (फ़ाइल फोटो)

इंटेसिव केयर यूनिट या आईसीयू में रहने के फ़ायदों के बारे में कोई भी डॉक्टर आपको बता सकता है.

कई बार इसके फ़ायदे होते हैं और कई बार खामियाजा भी भुगतना पड़ता है.

शंकर की 76 वर्षीय बीवी नलिनी इसकी गवाह हैं. उनके पति टेक्निकली एक आईसीयू में थे और उनकी सेहत में काफी सुधार हुआ.

इस आईसीयू को टेक्निकली कहने की वजह है, क्योंकि इस आईसीयू को घर में बनाया गया था.

और एक ऐसे युग में जब हर चीज़ इलेक्ट्रॉनिक या ई से शुरू होती हो, जैसे ई-कैश, ई-वेस्ट, इसे भी ई-आईसीयू नाम दिया गया है.

नलिनी शंकर ने बीबीसी को बताया, "हफ्ते भर बाद ही घर में बने आईसीयू से बाहर आने के बाद उनकी सेहत में सुधार था. हम सब ये बदलाव देख सकते थे. मानसिक रूप से भी वे ज्यादा बेहतर स्थिति में थे."

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आईसीयू में मरीज

नवंबर, 2016 में शंकर को आंत में छेद के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनकी हालत उस समय नाजुक थी. फौरन सर्जरी हुई और उन्हें आईसीयू में दाखिल कराया गया.

आईसीयू में उन्हें 75 दिन रहना पड़ा. जनवरी में उन्हें आईसीयू से निकालकर वॉर्ड में शिफ्ट किया गया. हालांकि अभी भी उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट की ज़रूरत थी.

इसके बाद मणिपाल हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने उनके घर पर एक आईसीयू बनाने का फैसला किया. यह तकनीक टेक महिंद्रा ने विकसित की थी.

इस घरेलू आईसीयू में भर्ती मरीज की स्थिति पर अस्पताल दूर से नज़र रख सकता था.

अस्पताल के कंसल्टेंट चेयरमैन डॉक्टर अनूप अमरनाथ कहते हैं, "इसकी पूरी व्यवस्था वेब आधारित है. हॉस्पिटल के कमांड सेंटर में हर अपडेट पहुंच जाता है. और हम अपने मोबाइल फ़ोन या टैबलेट से मरीज की हालत पर नजर रख सकते हैं."

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वेंटिलेटर सपोर्ट

उन्होंने बताया, "मरीज की सेहत के लिए ज़रूरी उपकरण इस घरेलू आईसीयू में लगाए जाते हैं. उसकी तीमारदारी के लिए एक नर्स भी रहती है."

शंकर के मामले में अप्रैल से मई के बीच दो बातें गौर करने वाली थीं. इन्फेक्शन का लेवल घटकर ज़ीरो हो गया था और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि शंकर को घर पर आराम मिल रहा था.

नलिनी शंकर बताती हैं, "निश्चित रूप से, घर पर होने से बहुत फर्क पड़ता है. घर के माहौल में मरीज की हालत सुधरती है. परिवार पास होता है तो वो भी आराम महसूस कर रहे थे."

मणिपाल हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉक्टर एच सुदर्शन बल्लाल कहते हैं, "उन मरीजों के लिए जिन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत होती है, कम लागत पर घर में आईसीयू का इंतजाम करना नई बात है."

नलिनी भी सुदर्शन बल्लाल की बात से सहमत हैं. वो कहती हैं कि पैसे के लिहाज से भी ये हॉस्पिटल के विकल्प से सस्ता है.

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मेडिकल इमरजेंसी टीम

हालांकि खर्चे के बारे में न तो अस्पताल ही और न मरीज के रिश्तेदार खुलकर बात करने के लिए तैयार थे, लेकिन ऐसे संकेत मिले कि रोजाना 25 से 30 हज़ार रुपये आने वाला खर्च घटकर 10 हज़ार पर आ गया है.

एक सवाल फिर भी रह ही जाता है कि इमरजेंसी में मरीज तक डॉक्टरों की मदद कैसे पहुंचती है?

अस्पताल के डॉक्टर अनन्य दास कहते हैं, "डॉक्टरों, मेडिकल इमर्जेंसी टीम और एम्बुलेंस किसी भी आपातकालीन परिस्थिति के लिए तैयार रहते हैं."

इसी से जुड़ा एक दूसरा सवाल ये भी है कि किस तरह के मरीजों को घर वाले आईसीयू में शिफ्ट किया जाता है?

डॉक्टर बल्लाल कहते हैं, "हर मामले की परिस्थिति के मुताबिक केवल डॉक्टर ही इस बारे में फैसला लेते हैं. शंकर के मामले में जनवरी तक हम उन्हें घर वाले आईसीयू में शिफ्ट करने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे."

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(मरीज और उनके परिवार की पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं.)

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