नियम में संशोधन के बाद 'बीफ़' पर राजनीति गरमायी

  • 31 मई 2017

केरल में सरे आम सड़क पर युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा बैल का वध करना अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है. हालाकिं कांग्रेस आला कमान ने इस सम्बन्ध में पांच कार्यकर्ताओं को निलंबित कर दिया है मगर घटना के विरोध में प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है.

मंगलवार को दिल्ली के जंतर मंतर से लेकर अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के ऑफिस तक भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना प्रदर्शन किया.

विरोध प्रदर्शनों के बीच केरल प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष डीन कुरियाकोस का कहना था कि केंद्र सरकार द्वारा 'पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (पशुधन बाजार का विनियमन) नियम - 1960' में बदलाव का विरोध होना चाहिए मगर जिस तरह से कन्नूर ज़िले में एक बैल का सरेआम बीच सड़क पर वध किया गया उससे पार्टी का आलाकमान नाराज़ है.

उनका कहना था कि इसलिए पार्टी ने पांच कार्यकर्ताओं को निलंबित कर दिया है. डीन कुरियाकोस यह भी कहना था कि उनकी पार्टी पूरे मामले की जांच भी कर रही है ताकि पता चल सके कि कन्नूर में हुई घटना में कौन कौन शामिल थे.

इस बीच कन्नूर की घटना और 'पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (पशुधन बाजार का विनियमन) नियम - 1960' में किये गए संशोधन को लेकर दक्षिण भारत में भी बीफ पर राजनीति गरमा गयी है.

राजनीतिक दलों का आरोप है कि 'बीफ' की आड़ में भारतीय जनता पार्टी समाज में फूट डालने की कोशिश कर रही है. उनका आरोप है कि 'बीफ' के सहारे ही भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में है.

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का कहना है कि उनकी सरकार अपने राज्य में केंद्र सरकार के संशोधित अध्यादेश को लागू नहीं करेगी. ऐसा ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी कहना है.

मगर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और संगठन में केरल के प्रभारी एच राजा ने बीबीसी से बात करते हुए इन आरोपों को ख़ारिज किया और कहा कि उनकी पार्टी के सामने सिर्फ 'बीफ' के सहारे अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की मजबूरी नहीं है.

रही बात 'पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (पशुधन बाजार का विनियमन) नियम - 1960' में संशोधन की तो राजा ने स्पष्ट किया है की यह तो भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार है जिसने ने पशुओं के खिलाफ क्रूरता अधिनियम में जो संशोधन करने की पहल की है. वो कहते हैं कि नए क़ानून को केंद्र सरकार लागू करवाना भी जानती है.

उनका कहना था: "तर्क का तर्क से और विचारधारा का विचारधारा से मुक़ाबला करना न तो कांग्रेस के बस की बात है और ना ही बामपंथियों के. इसी लिए ये लोग भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ इस तरह का कुप्रचार कर रहे हैं. 'पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (पशुधन बाजार का विनियमन) नियम - 1960' में हम ने संशोधन किया है. इसे राज्यों में कैसे लागू किया जाए ? ये हमें आता है."

'बीफ' पर हो रही राजनीति की चर्चा करते हुए राजा का कहना है कि ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं हो रहा है. उन्होंने क्यूबा का उद्धरण देते हुए कहा कि वहाँ भी ऐसा समय आया था जब क्यूबा के तत्कालीन राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने भी इसी तरह का क़ानून लागू किया था और गौवंश की ह्त्या पर प्रतिबन्ध लगाया था.

राजा चाहे कुछ कहें मगर केंद्र सरकार के नए प्रस्ताव से दक्षिण भारत के किसान खुश नज़र नहीं आ रहे हैं. खास तौर पर ऐसे लोग जो कई सालों से पशुपालन कर करे हैं. इन्हीं में से एक हैं तमिल नाडु के सेलम ज़िले के रहने वाले पियूष मानुष जिनके पास 25 भैसें हैं.

मानुष कहते हैं : "यह जो पहले के क़ानून में संशोधन किया गया है उसके बाद कोई भी किसान अब गाय या भैंस पाल नहीं सकता है. अब गाय पालने के दिन हमारे ख़त्म हो गए हैं. इस संशोधन में गाय और भैंस को एक ही फहरिस्त में जोड़ दिया गया है. अब हम इसका व्यवसाय नहीं कर सकते हैं. ना ख़रीद सकते हैं और ना बेच सकते हैं. जब हम अपनी गाय और भैंस को बेच ही नहीं सकते और ख़रीद ही नहीं सकते तो फिर हम इन्हे क्यों पालें ? पशु किसान का बैंक है. हम पशु पालते हैं और जब किसान संकट में होता है तो उसे बेच कर पैसों का इंतज़ाम करता है."

हलाकि तमिल नाडु की सरकार ने कहा है कि इस मामले में वो नया क़ानून लागू करेगी या नहीं इस पर विचार कर रही है, रविवार को चेन्नई की आईआईटी में भी कुछ छात्रों ने अध्यादेश में संशोधन का विरोध करने के लिए बीफ फेस्टिवल का आयोजन किया था. इस फेस्टिवल के आयोजकों में से एक अज़हर का कहना था कि सरकार नहीं तय करेगी कि कौन क्या खायेगा क्योंकि यह नागरिकों का मौलिक अधिकार है.

अज़हर कहते हैं कि 'बीफ-फैस्टीवल' आयोजित कर छत्रों ने अपना विरोध दर्ज कराया है.

जब से 'बीफ' पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग उठ रही है तभी से दक्षिण भारत में छात्रों का एक बड़ा सम्मूह ऐसा भी है जो इसका विरोध करता आ रहा है. हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय के सतीश भी इन्ही में से हैं जिन्होंने दुसरे छात्रों के साथ मिलकर कई बार विरोध स्वरुप इस तरह के 'फेस्टिवल' का आयोजन किया है.

सतीश का कहना था: " भारतीय जनता पार्टी 'बीफ' के मुद्दे को लेकर दक्षिण भारत की राजनीति में खुद को स्थापित करने की कोशिश तो कर रही है मगर वो कामियाब नहीं होगी. जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आयी है उसे लगता है कि जिस 'ब्रीफ़ के मुद्दे को लेकर वो उत्तर भारत में राजनीति करती रही उसके सहारे वो दक्षिण में भी ऐसा ही कुछ कर पाएगी. मगर दक्षिण भारत बिलकुल अलग है. यहाँ के अल्पसंख्यक, आदिवासी और दलित इस पर प्रतिबन्ध के ख़िलाफ़ हैं."

भारतीय जनता पार्टी के प्रभारी एच राजा कहते हैं कि दक्षिण भारत के मतदाता क्षेत्रीय दलों से ऊब चुके हैं इस लिए उनका रुझान भाजपा की तरफ हो रहा है.

वो यह भी कहते हैं कि केरल में हुए विधानसभा के चुनावों में भाजपा का मत प्रतिशत इस बात की पुष्टि करता है. ऐसा 'बीफ' की वजह से नहीं हुआ है बल्कि क्षेत्रीय दलों पर ले लोगों का भरोसा उठ जाने की वजह से हुआ है."

वहीं इस संशोधन से भैंस के मांस के व्यापार से जुड़े लोग भी हैरत में हैं. उनका कहना है कि जिस तरह कारोबार को भी इस संशोधन के दायरे में लाया गया है उससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ेगी.

भैंस के कारोबार जुड़े फ़ौज़ान कहते हैं मौजूदा समय में भारत में भैंस के मांस का निर्यात 5 अरब डालर का उद्योग है. इसके अलावा वो कहते हैं कि इसी से जुड़ा चमड़े का कारोबार 7.5 अरब डालर का है. इस फैसले से कितना आर्थिक नुकसान होगा और कितनी बेरोज़गारी बढ़ेगी अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

पशु चिकित्सक सेंथिल कुमार ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि 2012 के पशु गणना के आंकड़ों के अनुसार भारत में पशुओं की तादात 30 करोड़ है जबकि कृषि मंत्रालय के अनुसार देश में पशु चिकित्सकों की तादात 65 हज़ार के आसपास है.

वो कहते हैं : "जो संशोधन हुआ है उसके अनुसार अब चिकित्सकों को 30 करोड़ पशुओं के स्वस्थ्य का ब्योरा रखना होगा. न सिर्फ रखना होगा बल्कि हर 6 महीनों में उनकी सेहत से सम्बंधित दस्तावेज़ों को भी संभाल कर रखना होगा जो मानवीय रूप से संभव ही नहीं है."

हलाकि मद्रास उच्च न्यायलय ने मंगलवार को 'पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (पशुधन बाजार का विनियमन) नियम - 1960' में केंद्र सरकार द्वारा किये गए संशोधन पर फिलहाल रोक लगा दी है.

इसके अलावा भैंस के मांस के कारोबारियों ने सरकार को प्रतिवेदन देकर बकरी और भेड़ के साथ साथ भैंस को भी उन पशुओं की सूची से हटाने को कहा है जिनकी वध के लिए खरीद और बिक्री पर रोक लगाई गयी है.

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