नज़रिया: योगी आदित्यनाथ की अयोध्या यात्रा पर बवाल क्यों?

  • 31 मई 2017
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी हिंदुत्व और राम जन्मभूमि मंदिर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का डंका बजाने अयोध्या नहीं गए.

उग्र हिंदुत्व की विचारधारा के प्रति अपने समर्पण को ज़ाहिर करने के लिए उन्हें न तो ऐसी कोई सांकेतिक यात्रा करने की ज़रूरत है और न ही विवादास्पद ज़मीन पर बनाए गए रामलला के अस्थायी मंदिर में पूजा अर्चना करने की.

लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे भारतीय जनता पार्टी के पुरोधाओं के ख़िलाफ़ बाबरी मस्जिद ढहाने का षडयंत्र रचने के आरोप तय किए जाने के एक दिन बाद योगी का अयोध्या जाना हिंदुत्व के विशाल कड़ाह में राष्ट्रीय राजनीति को कभी तेज़ और कभी मंदी आँच में लगातार खदबदाते रहने की कोशिश का सिर्फ़ एक हिस्सा है.

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राजनीतिक संदेश को रेखांकित किया

भगवा वस्त्रधारी जोगी-जमातियों से घिरे योगी आदित्यनाथ जब अस्थायी मंदिर में पूजा करने के बाद सरयू नदी के तट पर खड़े होकर अर्घ्य चढ़ा रहे थे, तो वो उसी राजनीतिक संदेश को रेखांकित कर रहे थे जो भारतीय जनता पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को साफ़ साफ़ शब्दों में दिया था- "न हम मुसलमान को टिकट देंगे और न हमें उनके वोट की ज़रूरत है."

भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता यह जानते हैं कि मुख्यमंत्री के तौर पर योगी की अयोध्या यात्रा से राम जन्मभूमि के मुद्दे पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है.

भाजपा लगातार कहती रही है कि इस समस्या को आपसी बातचीत या अदालत से ही सुलझाया जाएगा.

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हिंदुत्व की भट्ठी की आग

लेकिन हिंदुत्व की भट्ठी की आग को लगातार जलाए रखने के लिए राम जन्मभूमि को ख़बरों में बनाए रखना ज़रूरी है, ताकि ये मुद्दा लोगों की स्मृति में बना रहे और इसे व्यापक हिंदू समाज की अस्मिता और अधिकार से जोड़ा जा सके.

इस आग को जलाए रखने के लिए संघ परिवार से जुड़े दसियों संगठन और व्यक्ति अपनी अपनी हैसियत और ताक़त के मुताबिक़ कभी गाय, कभी भारतीय सेना, जेएनयू, घर वापसी, एंटी-रोमियो स्कवॉड, लव जिहाद, हिंदुओं का कथित पलायन, राष्ट्रगान और देशभक्ति जैसे मुद्दे उठाते रहते हैं.

हिंदुत्व के कड़ाह को संघ परिवार पिछले तीन साल से तेज़ आंच में तपा रहा है, क्योंकि उसे सत्ता का समर्थन हासिल है.

इन तीन बरसों में दिल्ली के पास दादरी में गोमांस रखने की अफ़वाह के आधार पर अख़लाक़ को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला और जब अभियुक्तों में से एक की जेल में बीमारी से मौत हो गई, तो उसके शव को तिरंगे में लपेट कर उसे शहीद का दर्जा दिया गया.

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Image caption गोहत्या और गोमांस खाने की अफ़वाह के बाद भीड़ के हाथों मारे गए थे मोहम्मद अख़लाक़.

इन्हीं तीन बरसों में भगवा चरमपंथ के आरोपों में जेल में बंद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और स्वामी असीमानंद जैसे कई लोग ज़मानत पाकर बाहर आ गए हैं.

असीमानंद पर मक्का मस्जिद, अजमेर शरीफ़ और समझौता एक्सप्रेस में विस्फोट करके कई लोगों की हत्या करने का आरोप है.

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआइए) ने कहा कि मक्का मस्जिद मामले में स्वामी असीमानंद को ज़मानत दिए जाने पर उसे कोई एतराज़ नहीं है.

ये सभी घटनाएं हिंदुत्व के प्यादों को एक ठोस भरोसा दिलाती हैं कि क़ानून अपने हाथ में लेने के लिए अगर वो पुलिस और अदालत के चक्कर में पड़े भी, तो आख़िरकार उन्हें बचा ही लिया जाएगा.

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ख़ुद सीएम योगी पर हैं आरोप

ख़ुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी पर 2007 में सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने के आरोप थे, लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके ख़िलाफ़ मामला चलाए जाने की इजाज़त नहीं दी.

इससे पहले कई दशकों से ये कड़ाह टीवी कैमरों की नज़र से बचकर मंदी आँच पर लगातार पकता रहा है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सफलता ये है कि उसने हिंदुत्व की विचारधारा और हिंदू धर्म के फ़र्क़ को मिटाया भले ही न हो, आम जन की नज़रों में उसे धूमिल ज़रूर कर दिया है.

ऐसे में आदित्यनाथ योगी के अयोध्या जाने पर सवाल उठें भी तो उठते रहें.

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