क्या वाकई नोटबंदी के अच्छे परिणाम आएंगे ?

  • 2 जून 2017
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वित्तीय वर्ष 2016-2017 की आख़री तिमाही यानी जनवरी से लेकर मार्च के आंकड़ों के अनुसार भारत के विकास दर में गिरावट दर्ज की गई है.

वित्तीय वर्ष की आख़री तिमाही में विकास दर यानी सकल घरेलू उत्पाद की दर 6. 1 प्रतिशत दर्ज की गई है जो इससे पहले की तिमाही से भी कम है. अक्तूबर 2016 से लेकर दिसंबर 2016 की तिमाही के दौरान भारत की विकास दर 7 प्रतिशत थी.

ये आंकड़े सरकार ने 31 मई को जारी किए हैं.

अर्थशास्त्री नोटबंदी और निर्यात में आई गिरावट को विकास दर में गिरावट के बड़े कारण मानते हैं.

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'नोटबंदी के अच्छे परिणाम आएंगे'

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संघ परिवार से नज़दीक माने जाने वाले अर्थशास्त्री जगदीश शेट्टीगर भी मानते हैं कि नवंबर में हुई नोटबंदी का असर तीन महीनों के बाद दर्ज होना शुरू हुआ.

मगर वो मानते हैं कि इस नोटबंदी के अच्छे परिणाम भी जल्दी ही सामने आएंगे.

वो कहते हैं, "नोटबंदी का बुरा असर अल्पकालिक ही है जबकि इसके दीर्घकालिक फायदे हैं."

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शेट्टीगर कहते हैं कि विकास दर में गिरावट के और भी कई कारण हैं. वो मानते हैं कि वैश्विक मंदी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भी इसके बड़े कारण रहे हैं.

वो कहते हैं, "वैश्विक मंदी के परिणामस्वरूप निर्यात में कमी दर्ज हुई है जिसका प्रभाव तो पड़ा ही है. उसी तरह खाड़ी देशों में भी तेल की कीमतों में आई गिरावट की वजह से वहां भारत से होने वाले निर्यात पर भी असर पड़ा."

वो कहते हैं, "सरकार चाहे जिसकी भी हो, वैश्विक आर्थिक मंदी का प्रभाव ज़रूर पड़ता है. इसमें सिर्फ मौजूदा सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता है क्योंकि पिछले कई सालों से रोज़गार विहीन विकास दर ही देखने को मिली है."

बैंकों की स्थिति चिंताजनक

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जाने-माने अर्थशास्त्री मिहिर शर्मा ने बीबीसी से कहा, "बैंकों की बुरी हालत ने भी विकास दर में गिरावट लाने में बड़ी भूमिका निभाई है."

उनका कहना है "बैंकों ने लाखों करोड़ों रुपए बतौर क़र्ज़ दिए तो थे मगर क़र्ज़ लेने वालों ने उन्हें लौटाया ही नहीं जिससे बैंकों की आर्थिक स्थिति चरमरा गई है."

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मिहिर शर्मा बताते हैं, "विकास दर घटने का मतलब होता है कि लोग निवेश नहीं कर रहे हैं, नए उद्योग नहीं लग रहे हैं, नए स्टार्ट-अप नहीं आ रहे हैं और लोगों को रोज़गार नहीं मिल रहा है."

मिहिर शर्मा का कहना है कि यह गिरावट शहरी इलाकों की स्थिति की वजह से ज़्यादा है न की ग्रामीण इलाकों की वजह से.

वो कहते हैं, "समस्या उत्पादन इकाइयों में उत्पादन में कमी की वजह से है. निर्माण क्षेत्र में भी काफ़ी गिरावट है जिसका असर सीधे तौर पर विकास दर पर पड़ रहा है."

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में हालात सुधर सकते हैं क्योंकि नोटबंदी का असर अब ख़त्म हो चुका है और निर्माण क्षेत्र में भी बंद पड़ा काम अब शुरू हो गया है.

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