क्या भारत 'फूड फासीवाद' की तरफ बढ़ रहा है

  • 2 जून 2017
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Image caption वीटी बलराम

केरल के एक विधायक ने मांस, मछली और अंडा खाना फिर से शुरू करने की बात कही है.

दो दशकों से शाकाहारी रहे किसी व्यक्ति की इस घोषणा में कोई असामान्य बात नहीं है. लोग क्या खाएं, क्या न खाएं, ये उनका अधिकार होता है.

एमएलए वीटी बलराम को लगता है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी लोगों से उनका ये हक छीनने की कोशिश कर रही है और इसी वजह से उन्होंने मांसाहार फिर से अपनाने की घोषणा की.

वीटी बलराम ने अपने दोस्तों के साथ बीफ़ खाते हुए एक वीडियो भी पोस्ट किया.

उन्होंने कहा, "मैं मांस, मछली और अंडा खाए बिना 1998 से ही रह रहा था. लेकिन अब समय आ गया है कि इसे तोड़ा जाए और खाने के अधिकार के पक्ष में आवाज़ बुलंद की जाए."

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'गायों का संरक्षण'

केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ये मानती है कि गायों का संरक्षण किया जाना चाहिए क्योंकि देश में बहुमत वाली हिंदू आबादी इसे पवित्र मानती है.

देश के तकरीबन 18 राज्यों में गोहत्या पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है. लेकिन 20 करोड़ से ज्यादा भारतीय बीफ खाते हैं. इनमें मुसलमान और ईसाई भी हैं.

ये और बात है कि देश के हिंदू किसान बछड़ों को बेच देते हैं. चूंकि ग्रामीण भारत में ट्रैक्टर बैलों की जगह ले रहे हैं तो जब जानवर किसी काम के नहीं रह जाते, तब उन्हें काटने के लिए किसी बिचौलिए को बेच दिया जाता है.

और बहुत से लोग कहते हैं कि इसे लेकर कोई हल्ला नहीं होता है.

विडंबना ये है कि गाय वो जानवर बन गया है जिसके इर्द-गिर्द ध्रुवीकरण हो रहा है. दो साल पहले एक भीड़ ने एक आदमी पर हमला कर उसकी जान ले ली. वजह वो अफवाहें थीं कि उस आदमी के परिवार ने बीफ खाया था.

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'राष्ट्रीय पशु'

गाय की रक्षा के नाम पर गिरोह बन रहे हैं. वे इस तरह से काम कर रहे हैं मानो किसी का कोई खौफ नहीं है. पालतू जानवरों को लाने-ले जाने के लिए इन गोरक्षकों ने लोगों की जान ली है.

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने गोहत्या पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने की मांग की थी.

और इसी हफ्ते एक हाई कोर्ट जज ने कहा कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाना चाहिए. इतना ही नहीं उनका ये भी कहना है कि गोहत्या करने वाले व्यक्ति को उम्र कैद की सजा होनी चाहिए.

बहुत से लोग ये कह रहे हैं कि इस शोर शराबे में भारत का फलता-फूलता भैंस के मांस का धंधा दम तोड़ रहा है.

इस हफ्ते की शुरुआत में केंद्र सरकार ने मवेशी हाटों में काटने के लिए जानवरों की खरीद-बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया जिसका कई राज्यों ने विरोध किया.

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नकारात्मक असर

सरकार ने दलील दी कि उसका मकसद जानवरों की अनियंत्रित और अनियमित खरीद-बिक्री पर लगाम लगाना था.

लेकिन जानकार कहते हैं कि इस प्रतिबंध से चार अरब डॉलर के बीफ निर्यात पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और लाखों लोगों का रोजगार भी छिन सकता है.

देश में 19 करोड़ पालतू पशु हैं. इनमें से हर साल करोड़ों जानवर मर जाते हैं या फिर उन्हें मारे जाने की ज़रूरत पड़ती है.

तो गरीब किसान किस तरह से अपने जानवर बेच पाएंगे? पेशे से वकील गौतम भाटिया कहते हैं, "नए नियम बीफ पर एक तरह से अप्रत्यक्ष प्रतिबंध हैं."

उनका मानना है कि अगर इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जाती है तो सरकार के लिए इसका बचाव करना मुश्किल हो जाएगा.

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'सांस्कृतिक साम्राज्यवाद'

खान-पान की आजादी की दलील के बिना पर एक हाई कोर्ट ने पहले ही इस फैसले पर स्टे ऑर्डर दे दिया है.

भाटिया कहते हैं, "बुरी तरह से ड्राफ्ट किए गए नियम नागरिकों और अदालतों को एक बार फिर से ये सोचने का मौका देते हैं कि खान-पान का अधिकार संविधान की कसौटी पर कितना खरा उतरता है. वही संविधान जो हम सबको आर्थिक और सामाजिक आजादी का अधिकार देता है."

आलोचकों का कहना है कि बीफ़ बैन लोगों के खान-पान की आदतों पर लगाम लगाने का उदाहरण है. वे इसे 'फूड फासीवाद' करार देते हैं.

कुछ और लोग इसे 'सांस्कृतिक साम्राज्यवाद' की आहट के तौर पर देख रहे हैं. उन्हें लगता है कि ये कोशिशें भारत की धर्मनिरपेक्षता और संविधानिक मूल्यों पर हमला है.

किसी ने किसी ने इसे भारत को शाकाहारी राज्य में बदलने की साजिश तक करार दिया.

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विविधतापूर्ण खान-पान

बहुत से लोग ये मानते हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार देश की विविधतापूर्ण खान-पान की शैली से पूरी तरह से अनजान है.

भारत में खान-पान की आदतें धर्म, क्षेत्र, जाति, वर्ग, उम्र और लिंग के आधार पर अलग-अलग पाई जाती हैं.

गैर सरकारी संगठन इंडियास्पेंड ने आंकड़ों की पड़ताल के बाद ये रिपोर्ट दी है कि भारतीय अब पहले से ज्यादा मांस खा रहे हैं.

इसमें गाय और भैंस का मांस भी शामिल है. शहरों में बीफ की खपत 14 फीसदी और गांवों में 35 फीसदी तक बढ़ी है.

पूर्वोत्तर के राज्यों में बीफ ज्यादा पसंद किया जाता है. नेशनल सैंपल सर्वे का कहना है कि 42 फीसदी भारतीय शाकाहारी हैं जो मांस, मछली या अंडा नहीं खाते हैं.

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मांसाहारी भारतीय

एक और सरकारी सर्वे में ये पाया गया है कि 15 साल से ज्यादा उम्र के 71 फीसदी भारतीय नॉनवेज खाने वाले हैं.

दुनिया भर में खान-पान की आदतों पर लगाम लगाने की कोशिशें होती आई हैं. ज्यादातर इसके कारण स्वास्थ्य, पर्यावरण और स्वच्छता संबंधी रहे हैं.

उदाहरण के लिए अमरीका में सब्जी की खेती को सब्सिडी, ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों को बढ़ावा और ज्यादा वसा वाले खाने पर टैक्स लगाने का विरोध किया गया.

बैंकॉक में स्वच्छता के नाम पर स्ट्रीट फूड पर बैन लगा दिया गया. भारत ने भी इसी तर्ज पर बीटी बैगन पर प्रतिबंध लगाया. मैगी पर तात्कालिक प्रतिबंध लगा.

अतीत में किसी चीज की कमी की वजह भी प्रतिबंध का कारण बन चुकी है. 70 के दशक में दिल्ली में दूध की कमी के कारण दूध से बनी मिठाइयों पर बैन लगा दिया गया था.

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