देश जो है ही नहीं, पर उसका पासपोर्ट होता है

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आज पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद का बोल-बाला है. जैसे नब्बे के दशक में पूरी दुनिया ग्लोबलाइज़ेशन की दीवानी थी. उसी तरह आज कई देशों में राष्ट्रवाद उफ़ान पर है. लोग अपनी पहचान अपने देश की ताक़त से जोड़ रहे हैं. अपने पासपोर्ट की नुमाइश करते हुए बहुत से लोग ख़ुद को राष्ट्रवादी बताते हैं.

पासपोर्ट किसी भी देश के नागरिक की पहचान का पुख़्ता सबूत होता है. हर देश अपने नागरिकों के लिए पासपोर्ट जारी करता है. इसकी मदद से ही वो किसी और देश में दाख़िले की इजाज़त हासिल कर सकते हैं.

मगर क्या हो, अगर किसी पासपोर्ट का देश ही न हो? यानी ऐसा देश जो धरती पर तो कहीं दर्ज नहीं, मगर पासपोर्ट जारी करता हो.

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आप इस बात को मज़ाक़ कहकर हंसी में उड़ा देंगे. मगर ये बात है सौ फ़ीसद सच. इटली के शहर वेनिस में वहां की मशहूर आर्ट प्रदर्शनी लगी. इसका नाम है-वेनिस बायेनेल. दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत शहरों में से एक वेनिस में आर्ट की ये नुमाइश हर दूसरे साल लगती है.

इस बार कला प्रदर्शनी में सबसे ज़्यादा चर्चा हुई एनएसके (NSK) के पवेलियन की. एनएसके यानी न्यू स्लोवेनीस कुंस्त. ये स्लोवानिया नाम के देश के कलाकारों का पवलेनियन है.

इस पवेलियन में जाने के लिए आपको पासपोर्ट लेना पड़ेगा. क्योंकि ये सिर्फ़ आर्ट एग्जीबिशन का पवेलियन ही नहीं है. आय़ोजकों ने इसे अलग देश के तौर पर पेश किया, ऐसा देश, जो सिर्फ़ ख़्यालों है. उसकी कोई सीमा नहीं है.

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वेनिस की इस कला प्रदर्शनी में 85 देशों के पवेलियन हैं. यूरोप के देश अल्बानिया से लेकर अफ्रीकी मुल्क़ ज़िम्बाब्वे तक के अपने पवेलियन हैं. इसमें यूनिवर्सिटी ऑफ डिजैस्टर या थिएटर ऑफ़ ग्लोइंग डार्क जैसी थीम पर आधारित कला की नुमाइश की गई.

कलाकार आम तौर पर व्यवस्था विरोधी होते हैं. इसीलिए कुछ कलाकारों ने इस बार दुनिया भर में उफान पर आई राष्ट्रवादी विचारधारा को चुनौती देने की ठानी. इसके लिए सबसे अच्छा प्लेटफॉर्म वेनिस बाइनिएल ही हो सकता था. इसीलिए यहां पर एक पवेलियन इंसानियत के नाम पर है.

जिसमें इंसान की व्यापक पहचान पर ज़ोर दिया गया है. वहीं ट्यूनिशिया के पवेलियन में जाने के लिए लोगों को फ्रीसा (freesa) यानी फ्री वीज़ा दिया जा रहा है. कलाकार इस नुमाइश के ज़रिए दुनिया को बता रहे हैं कि इंसान को आज़ाद ही रहने दो. उसे राष्ट्रवाद की बंदिशों में क़ैद न करो.

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एनएसके ने ख़ुद 1992 में एक राष्ट्र घोषित किया था. उससे ठीक एक साल पहले ही स्लोवेनिया ने ख़ुद को आज़ाद मुल्क़ घोषित किया था. एनएसके आर्ट पवेलियन में जाने से पहले आपको वहां का पासपोर्ट बनवाना होता है. इस पासपोर्ट में लिखा होता है कि ये एक ग्लोबल राष्ट्र है.

ये ऐसा मुल्क़ है जो किसी सरहद में क़ैद नहीं. क्योंकि इस देश को राष्ट्रों की सीमाएं तय करने में यक़ीन नहीं. एनएसके चाहता है कि इंसानों के लिए ऐसे क़ानून बनें जो हर देश पर लागू हों. तभी तो उनके नागरिक ग्लोबल सिटिज़न माने जाएंगे.

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बरसों से पासपोर्ट किसी नागरिक के सबसे पुख़्ता पहचानपत्र माने जाते रहे हैं. इनकी अहमियत कुछ मिसालों से समझी जा सकती है. जब इस्लामिक स्टेट ने अपनी ख़िलाफ़त का एलान किया, तो उसने अपने लड़काों से कहा कि वो अपने पासपोर्ट फाड़ दें. क्योंकि ये उनकी ग़ुलामी के प्रतीक हैं. ये पासपोर्ट साम्राज्यवाद के प्रतीक हैं. पासपोर्ट फाड़ने से लड़ाकों को एक नए मुल्क़ की पहचान हासिल होगी.

ख़ूबसूरत देश है एनएसके

इससे पहले 1954 में शांति के लिए काम करने वाले गैरी डेविस ने वर्ल्ड पासपोर्ट जारी करने शुरू किए थे. उन्होंने विश्व के नागरिकों की मदद से वैश्विक सरकार भी बनाई थी.

उस वक़्त क़रीब दस हज़ार लोगों ने ये वर्ल्ड पासपोर्ट लिया था. हालांकि किसी भी देश ने इसे मान्यता नहीं दी थी. 2016 में हिप-हॉप कलाकार मॉस डेफ को इस पासपोर्ट की मदद से सफ़र करते वक्त दक्षिण अफ्रीका में गिरफ़्तार कर लिया गया था.

पासपोर्ट का असली होना बेहद जरूरी है. क्योंकि ये हमारी पहचान से जुड़ा है. 2004 में स्लोवेनिया के जुबलिजाना शहर में एनएसके के मुख्यालय में हज़ारों लोगों ने यहां के पासपोर्ट के लिए अर्ज़ी दी थी.

सबसे ज़्यादा अर्ज़ियां नाइजीरिया के इबादान शहर से आई थी. कई लोगों ने चिट्ठी में लिखा था कि उन्हें पता चला है कि एनएसके बेहद ख़ूबसूरत देश है, इसलिए वो उस देश की सैर पर आना चाहते हैं.

वेनिस की प्रदर्शन में जो भी एनएसके के पवेलियन में जाता है, उसे वहां का अख़बार भी दिया जाता है. इसमें आधुनिकता पर माफ़ी मांगने वाला लेख है. इसमें लिखा है कि शरणार्थियों को शरण न देना निर्दयता है. एनएसके का मानना है कि ये बेदर्दी पश्चिमी देश और उनके साथी दिखा रहे हैं. जो देश शरणार्थियों को नहीं आने दे रहे हैं उनके नागरिक भी मानवता के ख़िलाफ़ अपराध के लिए ज़िम्मेदार हैं.

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कला की दुनिया में ऐसे बग़ावती सुर आम होते हैं. एनएसके के अख़बार में लिखा है कि किसी नागरिक के लिए सरकार बुनियादी ज़रूरत है. उनकी नैतिक और राजनैतिक आज़ादी के लिए राष्ट्र का होना ज़रूरी है. ये कलाकारो की ज़िम्मेदारी है कि वो लोगो को इन मूल्यों का एहसास कराएं.

एनएसके के सबसे चर्चित दूत हं विवादित दार्शनिक स्लावोज ज़िज़ेक. स्लावोज कहते हैं कि एनएसके बिना राष्ट्र का राष्ट्र है. ये किसी वामपंथी सोच पर आधारित नहीं है. वो किसी राष्ट्र का मज़ाक नहीं उड़ा रहे. लेकिन स्लावोज कहते हैं कि दुनिया को उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए.

स्लावोज ज़िज़ेक लेनिन की विचारधारा के सर्थक हैं. वो मानते हैं कि एनएसके पवेलियन ऐसे देश की सेवा कर रहा है जो फिलहाल धरती पर नहीं है. वो निजता के ख़िलाफ़ हैं. वो चाहते हैं कि एनएसके का हर नागरिक उनके बड़े मिशन का हिस्सा बने.

अफ़सरशाही का राज

स्लावोज ज़िज़ेक को अफ़सरशाही से परहेज़ नहीं. एनएसके पवेलियन के आयोजक दावा करते हैं कि उनका देश दूसरे देशों के अपराध के लिए ज़िम्मेदार नहीं. ये देश बिना किसी सीमा के भी आज़ाद मुल्क़ होने का एहसास कराता है. लेकिन इसके नागरिकों को अफसरशाही को मानना होगा. क्योंकि ऐसा नहीं होगा तो मुल्क़ अराजकता की चपेट में आ जाएगा. हर नागरिक को अपने बारे में पूरी जानकारी अफसरों को देनी होगी.

ज़िज़ेक कहते हैं कि तमाम देशों में जब शरणार्थी आते हैं, तो पुलिसकर्मी उनसे रजिस्ट्रेशन कराने को कहते हैं. जबकि वो शरणार्थी कहते हैं कि वो कोई जानवर नहीं जो रजिस्ट्रेशन कराएं. वो इंसान हैं. लेकिन ये शरणार्थी नॉर्वे जाना चाहते हैं, क्योंकि वहां अफ़सरशाही का राज है.

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हर शरणार्थी के अपना मुल्क़ छोड़ने की अलग वजह होती है. कोई अपने तानाशाह शासक से परेशान होकर भागता है. तो, कोई युद्ध और हिंसा की वजह से अपना वतन छोड़ता है. स्लावोज ज़िज़ेक मानते हैं कि वो अपने देश को किसी सिटी स्टेट यानी सिंगापुर जैसे मॉडल पर भी तो चला सकते हैं. तो वो कहते हैं कि दुनिया की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए तमाम राष्ट्रों के एकजुट होने की ज़रूरत है.

जैसे यूरोपीय समुदाय. वो मानते हैं कि अगर वो एनएसके को एक सिटी स्टेट बनाते हैं तो वहां भी रईस तबक़े के कुछ लोगों का राज हो जाएगा. इसीलिए वो अपने मुल्क़ को स्टेटलेस स्टेट ही रहने देना चाहते हैं.

मानवता एक ही है

ज़िज़ेक मानते हैं कि किसी भी देश की स्थापना किसी ख़ास, जाति, नस्ल या समुदाय के आधार पर नहीं की जानी चाहिए. ज़िज़ेक मानते हैं कि किसी भी देश को हर तरह से इंसान को अपनाने के लिए राज़ी होना चाहिए. क्योंकि मानवता एक ही है.

वेनिस की प्रदर्शनी में एनएसके का पवेलियन खुलने के एक घंटे बाद ही इसे देखने वालों की लंबी लाइन लग गई. ये पवेलियन अजीब तरह का है, एक तरफ़ झुका हुआ. इसमें घूमते हुए आपको अपना बैलेंस बनाए रखने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है.

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इस आर्ट प्रदर्शनी में शामिल कलाकार अहमत ओगुट कहते हैं कि इस तरह से यहां आने वाले अपना पूरा फ़ोकस नुमाइश पर रखते हैं. वरना वो तो यूं ही घूम-टहलकर पवेलियन से निकल जाएंगे. यहां ज़ोर इस बात पर है कि हम उन समस्याओं को समझें जिनसे दुनिया का आज सामना हो रहा है. फिर उसका हल तलाशने की कोशिश करें.

स्लावोज ज़िज़ेक की नज़र में आज की चुनौतियों का हल उनके काल्पनिक देश एनएसके में तलाशा जा सकता है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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