नज़रिया: 'सुधरने के बदले और चरमरा रहा है भारतीय क्रिकेट का ढाँचा'

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भारतीय क्रिकेट का ढांचा व्यवस्थित होने के बदले कहीं और अव्यवस्थित होता दिख रहा है. पहले तो चौंकाने वाली ये ख़बर आई कि कप्तान विराट कोहली की टीम के कोच अनिल कुंबले से नहीं बन रही है.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के द्वारा क्रिकेट प्रशासक के तौर पर नियुक्त रामचंद्र गुहा के इस्तीफ़े की ख़बर आ गई है. हम जिस दौर में रह रहे हैं, उसमें मीडिया की नज़रों से परे जाकर कोई गोपनीय काम कर पाना बेहद मुश्किल है, ऐसे में अगर विराट कोहली की अनिल कुंबले से कोई मुश्किल होगी तो वो दुनिया को पता चल ही जाएगी.

हालांकि ऐसी किसी स्थिति के होने पर विश्वास करना मुश्किल दिख रहा है, ख़ासकर बीते एक साल में जिस तरह से कोहली और कुंबले की जोड़ी का जैसा प्रदर्शन रहा है. दोनों हमेशा एक दूसरे की तारीफ़ करते ही नज़र आए हैं.

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हालांकि निराश करने वाला पहलू ये है कि कोहली और कुंबले की अनबन की ख़बर टीआरपी रेस में शामिल मीडिया की मनगढ़ंत कहानी नहीं है और चैंपियंस ट्रॉफ़ी में भारत और पाकिस्तान के बीच मुक़ाबले से पहले किसी सोप ओपेरा में तब्दील हो गया है.

ईगो संघर्ष का मामला

क्या बोर्ड के अधिकारी और सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों को इस मामले में समय रहते दखल नहीं देना चाहिए और इस मामले का हल नहीं करना चाहिए, भले ही मामला बहुत गंभीर ना रहा हो और आईपीएल के दौरान उभरा हो. अगर ईगो संघर्ष के मसले को छोड़ दिया जाए तो आगे चलकर यह उस विश्वास को चकनाचूर कर सकता है जिसे बनने में काफ़ी वक्त लगता है.

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लेकिन क्या अब वैसी कोशिश की जा सकती है जिससे कोहली और कुंबले के आपसी रिश्तों को बेहतर बनाया जा सके और इसका असर भारतीय क्रिकेट टीम पर नहीं पड़े.

हालांकि विचित्र बात ये है कि बोर्ड की ओर से अब तक ऐसी किसी अनबन की ख़बर सामने नहीं आई है, बावजूद इसके वीरेंद्र सहवाग जैसे बड़े खिलाड़ी ने कुंबले के पद के लिए आवेदन किया है. सहवाग बोर्ड की सहमति के बिना ऐसी किसी रेस में शामिल होंगे, इस पर विश्वास करना मुश्किल है.

क्या बोर्ड के सबसे शक्तिशाली अधिकारियों में से एक, जिन्हें कई लोग पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन का आदमी मानते हैं, वो हरियाणा के नहीं? जहाँ अपने करियर के अंतिम सालों में पनाह ली थी?

इन सबको मिलाकर देखें तो एक सोची समझी रणनीति दिखाई देती है, मीडिया उसी रणनीति के तहत कोहली के निशाने पर कुंबले को बता रहा है. और दुनिया ये भी जानती है कि जब कोच और कप्तान के बीच मतभेद हों तो आम तौर पर कप्तान की सुनी जाती है. ख़ासकर भारत जैसे देश में, जहां खिलाड़ी भगवान की तरह पूजे जाते हैं, सुपरस्टार माने जाते हैं.

गुहा के अहम सवाल

ऐसे में भारतीय क्रिकेट में कोई हैसियत नहीं रखने वाले रामचंद्र गुहा इसमें कहां से फ़िट होंगे? उन्होंने विस्तार से एक चिट्ठी लिखी और उसमें उन्होंने अपने इस्तीफ़े की वजहों के बारे में विस्तार से बताया है.

उनका पत्र समाचार एजेंसी पीटीआई ने जारी किया है, हालांकि उनके पत्र से ये ज़ाहिर होता है कि वे क्रिकेट प्रशासकों के रवैए से बेहद नाख़ुश हैं.

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गुहा ने बोर्ड के अंदर हितों के टकराव से जुड़े मुद्दे उठाए हैं, जिनमें वर्तमान और मौजूदा क्रिकेटर शामिल रहे हैं. ये हितों के टकराव का मुद्दा ही था जिसके चलते बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन दलदल में फंसे थे.

गुहा ने अपने पत्र में भारत के दो महान खिलाड़ियों पर सवाल उठाए हैं, एक तो सुनील गावस्कर हैं. गावस्कर अभी बीसीसीआई कमेंटेटर भी हैं और खिलाड़ियों का प्रबंधन संभालने वाली कंपनी के मुखिया भी है. उनके अलावा राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली जैसे खिलाड़ी भी शामिल हैं.

इसके अलावा भी कई मुद्दे हैं, जिसमें लोढ़ा समिति की अनुशंसाओं को लागू करना और क्रिकेट को चलाने के दिन प्रतिदिन के काम काज से संबंधित हैं. क्रिकेट प्रशासक आईपीएल के दौरान पुरस्कार वितरण समारोह में भी दिखे, हालांकि ये बोर्ड अधिकारियों और पूर्व खिलाड़ियों के लिए छोड़ा जाना चाहिए था.

खेल जारी है...

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इसके अलावा कुंबले का मुद्दा भी है. गुहा ने अपने पत्र में साफ़ लिखा है कि जिस तरह से कोच के मामले को हैंडल किया जा रहा है, उससे भी वे नाराज़ हैं. वे कुंबले के कार्यकाल को बढ़ाने के पक्ष में थे.

उनके मुताबिक भारतीय कप्तान को इतना अधिकार नहीं होना चाहिए कि वे ये तय कर सकें कि कौन कोच बने और कौन नहीं. बहरहाल, अगर कोच और कप्तान में मतभेद हो तो वो काफ़ी पहले दूर होना चाहिए, इतने अहम टूर्नामेंट से पहले ये दूर होना चाहिए था.

गुहा की अपनी प्रतिष्ठा है और गरिमा भी. उन्होंने ऐसे में इन चीज़ों से ख़ुद को दूर रखना बेहतर समझा होगा. जब वादे के मुताबिक सुधार नहीं दिख रहा हो तो ऐसा करना सम्मानजनक है. हालांकि, दूसरी तरफ़ बोर्ड के अंदर चल रहा खेल खुले तौर पर जारी है.

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