ऐसे में बिहार के कितने 'माधव झा' आएंगे सेंट स्टीफ़ेंस

  • 3 जून 2017
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Image caption ख़राब नतीजों के बाद पटना में छात्र का विरोध प्रदर्शन.

बीते महीने रुपहले पर्दे पर फ़िल्म 'हाफ़ गर्लफ्रेंड' आई थी. इसका हीरो माधव झा बिहार से हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में पढ़ाई करते हैं.

यह वही कॉलेज है, जिसमें दाख़िले के लिए 95 फ़ीसदी अंक भी कई बार कम पड़ जाते हैं.

लेकिन बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की इंटरमीडिएट परीक्षा के इस बार जो नतीजे आए हैं, उनसे लगता नहीं कि बिहार के हिस्से में कुछ माधव झा आ सकेंगे.

इंटर की परीक्षा के नतीजे इस बार क़रीब 65 फ़ीसदी छात्रों के फ़ेल होने से ख़ासे चर्चा में हैं. लेकिन इन नतीजों का एक स्याह पहलू और है.

किसी को नहीं मिले नब्बे फ़ीसदी अंक

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Image caption 30 मई को नतीजे घोषित करते बोर्ड के अधिकारी

इस बार बोर्ड की इंटर परीक्षा में टॉप करने वाले छात्रों को दूसरे बोर्ड्स के मुक़ाबले काफ़ी कम अंक मिले हैं. किसी भी संकाय के टॉपर को नब्बे फ़ीसदी अंक भी नहीं मिले. जबकि सीबीएसई और दूसरे बोर्ड्स में नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा अंक लाने वाले छात्रों की संख्या सैकड़ों में है.

गया कॉलेज की सोनी कुमारी ने 81 फीसदी अंक लाकर कॉमर्स संकाय में दूसरा स्थान हासिल किया है. लेकिन नंबर देने में बिहार बोर्ड के 'कंजूस' रवैये पर वह कहती हैं, 'दूसरे बोर्ड के छात्रों के सामने हम कमतर महूसस करते हैं. और ज़्यादा नंबर लाकर टॉप करते तो ज़्यादा अच्छा लगता.'

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Image caption कॉमर्स की सेकेंड टॉपर सोनी

सोनी कहती हैं, 'अगर हम कोलकाता या दिल्ली में दाखिला लेना चाहें तो इतने कम नंबरों में दिक्क़त हो सकती है.'

डीयू में कैसे मिलेगा दाख़िला?

यह परेशानी उन सभी छात्रों की है जो बिहार से बाहर निकलकर अच्छी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करना चाहते हैं.

जानकारों का भी मानना है कि बिहार में उच्च शिक्षा की स्थिति को देखते हुए प्रतिभाएं पलायन करना ही पसंद करती हैं. लेकिन वहां नंबर नहीं मिल रहे, इसलिए छात्रों के लिए 'न घर के, न घाट के' वाली स्थिति हो गई है.

'असोसिएशन फॉर स्टडी एंड एक्शन' लंबे समय से बिहार में शिक्षा के सवालों पर काम कर रहा है. इसके सचिव अनिल कुमार राय बताते हैं कि 'लो मार्किंग पैटर्न' बिहार के छात्रों के लिए काफ़ी पहले से चिंता का विषय रहा है.

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Image caption आर्ट्स टॉपर गणेश

वो कहते हैं, 'छात्र हतोत्साहित हो जाते हैं. अंकों के आधार पर जहां दाखिला होना होता है, वहां उनका एडमिशन नहीं हो पाता. मेधा होने के बावजूद बिहार के छात्र अवसरों से वंचित रह जाते हैं.'

अनिल चाहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर एक कोर्स, एक समय पर परीक्षा और एक तरह की मूल्यांकन पद्धति हो.

'शिक्षकों को ट्रेनिंग की ज़रूरत'

एकेपी यादव बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के पूर्व अध्यक्ष हैं. उनके मुताबिक बिहार बोर्ड ने लगभग सीबीएसई का ही सिलेबस अपनाया हुआ है.

वह कहते हैं, 'परीक्षा के सवाल तय करने से लेकर उसकी मार्किंग के लिए शिक्षकों को ट्रेनिंग देने की ज़रूरत है. सवालों का सही जवाब तैयार किया जाना चाहिए. मार्किंग में यह बताना चाहिए कि किस सवाल के लिए कितनी लाइनें लिखने पर कितने अंक देने हैं और भाषा अशुद्ध है तो कितने अंक काटने हैं.'

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Image caption पटना में विरोध प्रदर्शन

एकेपी यादव के मुताबिक, अभी इन सब बातों का ध्यान नहीं रखा जाता है.

इस बार बोर्ड का दावा है कि उसने नक़ल रोकी और मूल्यांकन में पारदर्शिता बरती है. लेकिन जानकारों भविष्य में परीक्षा से लेकर मार्किंग पैटर्न में भी सुधार की वकालत करते हैं, ताकि प्रतिभाशाली छात्रों का रास्ता बंद न होने पाए.

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