बिहार बोर्ड: प्रैक्टिकल में इतने नंबर कैसे लुटते हैं?

  • 5 जून 2017
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बिहार बोर्ड की इंटरमीडिएट परीक्षा के परिणामों में आर्ट्स टॉपर गणेश को लेकर जो पहला विवाद उठा, वो उनके संगीत विषय में प्रैक्टिल में कुल 70 में से 65 अंक आने को लेकर था.

लेकिन प्रैक्टिल में नंबर बटोरने वाले गणेश कुमार अकेले नहीं है.

इंटर के नतीज़ों पर नज़र डाले तो भले ही इंटर के कुल 12.40 लाख परीक्षार्थी में से चार लाख यानी 35 फ़ीसदी ही सफल रहे हो.

लेकिन प्रैक्टिकल की बात करें तो अधितकांश छात्रों को भरपूर नंबर मिले.

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Image caption इक़बाल मिस्त्री

प्रैक्टिकल में नंबरों का खेल

इक़बाल मिस्त्री ऐसे ही एक छात्र हैं. जहानाबाद के इक़बाल मिस्त्री पसीने से तर बतर है वो पटना स्थित बिहार इंटर कांउसिल के बाहर अपनी मार्क्सशीट लेकर खड़े हैं.

उन्हें फिजिक्स और कैमिस्ट्री की थ्योरी में 70 में से क्रमश: 12 और 13 नंबर मिले हैं.

जबकि प्रैक्टिकल की बात करें तो फिजिक्स प्रैक्टिकल में उन्हे 30 में से 27 और कैमिस्ट्री प्रैक्टिकल में 28 नंबर मिले हैं.

वो रूआंसे होकर कहते हैं, "हमको तो कहीं का नहीं छोड़ा बोर्ड ने."

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Image caption परीक्षाफल से नाराज़ छात्र विरोध-प्रदर्शन करते हुए.

नकल मुक्त परीक्षा

जाहिर तौर पर छात्रों का गुस्सा उफान पर है. लेकिन इससे इंकार नहीं कि बिहार बोर्ड की परीक्षाओं में प्रैक्टिकल में नंबर पाने का बड़ा खेल चलता है.

बिना प्रक्टिल के और पैसे लेकर नंबरों की बंदर बांट की जाती है.

बिहार बोर्ड थ्योरी की परीक्षा चाहे "नकल मुक्त" करा लेकिन प्रैक्टिकल के मोर्चे पर अभी बहुत काम किया जाना बाकी है.

बाढ़ के छात्र बिपिन बताते हैं, "गांव देहात में कहां कोई लैब है. लैब का ढांचा है तो टेक्निशियन नहीं है. तो पहले तो बोर्ड अपनी व्यवस्था सुधारे."

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Image caption आनंद किशोर

बोर्ड की नाकामी

बिहार बोर्ड के अध्यक्ष आनंद किशोर इस संबंध में कहते है, "प्रैक्टिकल को लेकर बिहार बोर्ड सहित सीबीएसई, आईसीएसई में यही नीति है कि होम सेंटर पर प्रैक्टिकल होता है. लेकिन इस बार गणेश के संबंध में जो विवाद उठा है तो निश्चित तौर पर हम अपनी प्रक्टिकल पॉलिसी को रिव्यू करेंगे. देखेंगे कि प्रैक्टिकल प्राइवेट कॉलेज में करवाने की अनुमति हो या ना हो. साथ ही एक्सटर्नल और इंटरनल पॉलिसी को भी बोर्ड देखेगा. जहां तक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है तो वो बिहार विद्यालय समिति का मसला नहीं है."

ऐसा नहीं है कि बोर्ड की नाकामी सिर्फ़ प्रैक्टिकल के मोर्चे पर है. इंटर के नतीजे देखें तो 654 स्कूल-कॉलेज ऐसे है जहां का रिजल्ट सिफर रहा है.

यानी इन स्कूल-कॉलेजों का एक भी छात्र पास नहीं हुआ.

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बोर्ड के नतीजे आने के बाद से ही ये बहस भी चल पड़ी है कि पढ़ाई होती ही नहीं है तो बच्चे पास कैसे होंगे?

लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि स्कूलों में शिक्षक है ही नहीं.

बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के मुताबिक राज्य के 3000 माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालय महज 12 हज़ार शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं.

इसमें भी विज्ञान और जीव विज्ञान के महज 500 शिक्षक ही है. जबकि शिक्षकों के कुल 37000 पद स्वीकृत हैं.

माध्यमिक शिक्षक संघ के सचिव शत्रुघ्न प्रसाद सिंह कहते है, "सरकार की नियोजन नियमावली 2006 ही गड़बड़ है. सरकार को ये समझ नहीं कि शिक्षा में निवेश ऐसा है जो स्थाई निवेश है. सरकार उसको मौसमी समझ रही है. सभी परमानेंट पोस्ट ख़त्म कर दी गई और शिक्षा कांट्रैक्ट पर है. जब शिक्षा ही कांट्रैक्ट पर है तो नतीजे ऐसे ही होंगे."

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