अमरीकी फंड के लिए नहीं किया था पेरिस समझौता: हर्षवर्धन

  • 5 जून 2017
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केंद्रीय पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन ने कहा है कि भारत ने अमरीका से फंड हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुधारने के लिए पेरिस समझौता किया था.

बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा कि अमरीका के पेरिस समझौते से अलग होने से भारत के पर्यावरण के मोर्चे पर आगे बढ़ते रहने की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पिछले दिनों 2015 के पेरिस जलवायु समझौते से अलग होने की घोषणा की थी और कहा था कि इसका सबसे अधिक फ़ायदा चीन और भारत जैसे विकासशील देशों को होगा.

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दुनियाभर में कार्बन उत्सर्जन के मामले में चीन सबसे आगे है और उसके बाद अमरीका. प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की बात करें तो भारत इस मामले में काफी पीछे है.

2015 के पेरिस समझौते में अमरीका ने ग़रीब और विकासशील देशों को प्रोद्योगिकी उन्नतीकरण के लिए 300 करोड़ डॉलर देने का वादा किया था, लेकिन ट्रंप के इस पैंतरे के बाद अब इसपर भी असमंजस की स्थिति है.

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लेकिन हर्षवर्धन नहीं मानते कि ट्रंप के इस फ़ैसले का भारत की प्रतिबद्धता पर कोई असर पड़ेगा.

हर्षवर्धन कहते हैं, "पूरे भारत के लोग और ख़ासकर प्रधानमंत्री मोदी की इस मामले में सोच स्पष्ट है. पिछले दिनों वो कह भी चुके हैं और भारत इस समझौते से पीछे नहीं हटेगा."

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण में सुधार की पहल एक बात है, लेकिन देश में पर्यावरण से जुड़ी परियोजनाओं में सुस्ती के लिए भी मोदी सरकार की आलोचनाएं होती रहती हैं.

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नमामि गंगे जैसी परियोजनाएं पिछले तीन सालों में कहाँ पहुँची हैं, हर्षवर्धन कहते हैं, "इन परियोजनाओं पर गहराई से काम हो रहा है, हालाँकि इसके नतीजे दिखने में समय लगेगा."

हालाँकि पर्यावरण मंत्री ने माना कि जितनी तेज़ी से इस दिशा में काम हो रहा है उससे कहीं अधिक तेज़ी से काम होना बाकी है.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने गंगा नदी से प्रदूषण को समाप्त करने के लिए नमामि गंगा नामक एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन शुरू किया था. सरकार का दावा था कि करीब 20,000 करोड़ रुपये खर्च कर गंगा नदी की सफाई की जाएगी और 2020 तक इसे पुनर्जीवित कर दिया जाएगा.

(बीबीसी संवाददाता दिनेश उप्रेती से बातचीत पर आधारित)

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