आदिवासी महिलाओं की ज़िंदगियों में रोशनी लाते सोलर लैंप

  • 7 जून 2017
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Image caption रुक्मणी सोलर लैंप के अपने दुकान में.

राजस्थान में डूंगरपुर सोलर प्रोजेक्ट ने कई आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है. उनमें कोई 'सोलर सखी' है तो कोई सुपरवाइजर और कोई इंजीनियर. इन्हीं में से एक हैं रुक्मणि.

मांडवा-खारपेड़ी गांव की 30 साल की रुक्मणि कहती हैं, "किराने की दुकान से मेरी आमदनी होती थी कोई डेढ-दो हज़ार रुपये. लेकिन सोलर असेंबलिंग के काम से पहले महीने ही मेरी 15 हज़ार रुपये की आमदनी हुई. मैंने सोलर रिपेयरिंग की ट्रेनिंग भी ली और आज मेरी खुद की सोलर शॉप है."

वो बताती हैं, "घर में अब नया एलसीडी टीवी आ गया है और एक नई मोटरसाइकिल भी जिससे मेरे पति और बेटे को शहर जाने में सुविधा हो गई है."

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इस आदिवासी इलाके में एक अदने से 0.5 वॉट के सोलर लैंप ने और भी बहुत कुछ बदला है. पहाड़ी पर बसे जो घर दिन छिपते ही अँधेरे की चादर ओढ़ लेते थे, अब सोलर लैंपों की रोशनी से गुलज़ार हैं.

आईआईटी मुंबई और राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास मिशन के संयुक्त प्रयासों से 9 मई 2016 को यह प्रोजेक्ट शुरू किया गया था.

इसमें चार क्लस्टर लेवल फेडरेशन (सीएलएफ) के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी 110 महिलाओं को दस दिन की ट्रेनिंग दी गई.

आईआईटी मुंबई के टेक्निकल ट्रेनर अमित देशमुख ने बीबीसी को बताया कि महिलाओं को सोलर लैंप असेम्बल करना, सोल्डरिंग करना, बैटरी चेक करना आदि सिखाया गया.

उन्होंने बताया, "बहुत सी महिलाएं पढ़ी लिखी नहीं थीं और सिर्फ वागडी भाषा ही जानती थीं. इसलिए ट्रेनिंग देना थोड़ा चुनौती भरा था पर उनके टीम लीडर प्रोफेसर चेतन सिंह सोलंकी ने पूरी प्रक्रिया को बहुत ही सरल कॉन्सेप्ट में विकसित कर काम आसान कर दिया."

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इन आदिवासी महिलाओं की कामयाबी के चर्चे दूर दूर तक फैल चुके हैं. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डूंगरपुर कलेक्टर सुरेन्द्र सिंह सोलंकी को इस प्रोजेक्ट के लिए पुरस्कृत भी किया.

रुक्मणि ने बीबीसी को बताया, "सबसे बड़ी बात है कि सोलर प्रोजेक्ट से हमारा आत्मविश्वास बढ़ा है और कमाई भी. पहले तीन महीनों में ही हमने 10 हज़ार सोलर लैंप बनाए. अब तक 40 हज़ार लैंप बनाकर गरीब परिवारों और स्कूली बच्चों में बांट भी चुके हैं."

खजूरिया-रघुनाथपुरा की निरोज़ कहती हैं, "गरीब परिवारों को एक सोलर लैंप हम 200 रुपये में देते हैं. इसमें 2.4 वाट की रिचार्जेबल बैटरी होती है. वैसे इसकी कीमत 500 रुपये पड़ती है. एक लैंप बनाने पर हमें दस रुपये मिलते थे. कोई महिला एक दिन में 25 बना लेती थी तो कोई ज्यादा पर ढाई सौ-तीन सौ रुपये की कमाई तो पक्की थी."

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माड़तिया गाँव की चंदा सोलर प्रोजेक्ट से जुड़कर अपनी कमाई से अपने बेटे को पब्लिक स्कूल में पढ़ाने का सपना पूरा कर रही हैं.

वे कहती हैं, "सोलर सुपरवाइजर को 3,600 रुपये का मानदेय मिल रहा है और 750 रुपये यात्रा खर्चा. सोलर सखियाँ भी यात्रा खर्चे के अलावा 1600 रुपये हर महीना कमा रही हैं."

नवीं कक्षा में पढ़ने वाली हाजू डूंगरपुर ज़िला मुख्यालय के नजदीक गाँव में रहती है. गरीबी के कारण अब तक उनके घर में बिजली का कनेक्शन नहीं लग सका है.

हाजू कहती हैं, "हम लोग केरोसिन तेल की चिमनी जलाकर पढ़ते थे जो तेज़ हवा आते ही जल्दी से बुझ जाती थी. रात को कोई भी चीज़ ढूँढनी हो तो इसे हाथ में लेकर घूमना पड़ता था. अब घर में दो सोलर लैंप हैं. एक की रौशनी में मां खाना बनाती है, तो दूसरा लैंप जलाकर हम भाई-बहन आराम से पढ़ाई करते हैं. अब दिया बुझने की कोई चिंता नहीं."

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मांडवा गांव की 62 वर्षीय शारदा ने जब घर में पहली बार सोलर लैंप जलाया तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "पिछले सात-आठ महीनों से हमारी केरोसिन की खूब बचत हो रही है. वर्ना हर महीने हमें तीन लीटर के 70 रुपये खर्च करने पड़ते थे. शाम को बाहर आँगन में मवेशियों को संभालने या पड़ोस में जाने के लिए टॉर्च साथ रखनी पड़ती थी, उसकी बैटरी का खर्चा भी अब ख़त्म हो गया. अब सोलर लैंप ही साथ ले जाते हैं. एक जगह रखो तो भी पूरे घर में उजाला."

ज़िले के पिछड़े हिस्सों में ये सोलर सखियां अब तक 40,000 सोलर लैंप बनाकर वितरित कर चुकी हैं और पांच सोलर दुकानें भी चला रही हैं.

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