भारत क्यों छोड़ रहा है इतने रॉकेट, 4 वजहें

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Image caption 2300 किलोग्राम से ज़्यादा वजन का रॉकेट है GSLV मार्क-III

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने सोमवार को GSLV मार्क-III-D1 रॉकेट का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण किया. इस रॉकेट की लंबाई 140 फ़ीट है और वज़न 200 हाथियों जितना. यानी 640 टन.

इसीलिए इसे 'दानवाकार रॉकेट' की संज्ञा दी गई है और इस दिन को ऐतिहासिक माना गया.

इस सैटेलाइट को तैयार करने में इसरो के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को 15 साल लगे जिसमे भारत में ही विकसित किया गया क्रायोजेनिक इंजन लगाया गया है.

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इस इंजन के लिए 'लिक्विड ऑक्सीजन' और 'हाइड्रोजन' को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.

एक चौथाई से अधिक आबादी के ग़रीबी रेखा के नीचे होने के बावजूद अंतरिक्ष परियोजनाओं पर इतना भारी-भरकम खर्च करने के लिए अक्सर भारत की आलोचना की जाती रही है.

तो फिर भारत अंतरिक्ष को लेकर इतना उत्साहित क्यों है? बीबीसी के शिवरामाकृष्णन परमेश्वरन की रिपोर्ट.

1-सस्ता है

भारत की दलील है कि विदेशी परियोजनाओं के मुक़ाबले अंतरिक्ष परियोजनाओं पर उसका ख़र्च बहुत कम है. लॉन्च करने की लागत करीब 50 लाख डॉलर है.

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Image caption इसरो ने प्रक्षेपण को ऐतिहासिक करार दिया है

उपग्रह की अनुमानित उम्र 10 साल मानी जाती है और संचालन का खर्च भी दिन पर दिन घटता जाता है. इस तरह माना जा रहा है कि भारत का अंतरिक्ष प्रक्षेपण उद्योग दुनिया में सबसे सस्ता है.

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विज्ञान अनुसंधान पर भारत लगातार बजट बढ़ाता जा रहा है, ख़ासकर अंतरिक्ष अनुसंधान पर. कई बार तो भारत सरकार की इस बात के लिए आलोचना भी हुई है कि वो विज्ञान पर ज़रूरत से ज़्यादा खर्च कर रही है.

2-अंतरिक्ष उद्योग

अभी तक अंतरिक्ष उद्योग की 75 फ़ीसदी हिस्सेदारी अमरीका, फ्रांस और रूस के पास है. ये उद्योग काफ़ी मुनाफ़े वाला है और भारत जैसे विकासशील देश के पास इसमें तरक्की की काफी गुंजाइश है.

Image caption भारत समेत कुछ ही देशों के पास प्रक्षेपण की क्षमता है

अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की बात करें तो भारत इसमें कुछ किलोग्राम से लेकर कई टन के सैटेलाइट लॉन्च होते हैं.

सैटेलाइट इंडस्ट्री एसोसिएशन के मुताबिक अरबों डॉलर की इस इंडस्ट्री में भारत का हिस्सा बहुत कम है और तकरीबन आधा प्रतिशत से अधिक है. जबकि चीन का मार्केट शेयर करीब तीन प्रतिशत है.

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भारत पहले अपने उपग्रह प्रक्षेपण के लिए रूस या फ्रांस जैसे दूसरे देशों पर निर्भर था, लेकिन ये बात अब बीते जमाने की बात हो गई है.

3-बदल रहा है बाज़ार

मौसम और संचार के लिए छोड़े जाने वाले ज़्यादातर सैटेलाइट लगभग चार टन वज़नी होते हैं और इनके प्रक्षेपण के लिए बड़े रॉकेट की ज़रूरत होती है.

जीएसएलवी मार्क 3 के तौर पर भारत न केवल अभीतक के सबसे विशाल रॉकेट के प्रक्षेपण में कामयाब रहा है बल्कि इसके साथ गया सेटेलाइन जीसैट 19 को संचार के लिहाज से एक गेमचेंजर माना जा रहा है, जो आने वाले दिनों में संचार और इंटरनेट की दुनिया में क्रांति ला सकता है.

अकेला जीसैट-19 पुराने 6-7 संचार उपग्रहों की बराबरी कर सकता है. फिलहाल भारत के 41 उपग्रहों में से 13 संचार उपग्रह हैं.

वैश्विक उपग्रह बाजार, जिसमें उपग्रहों के निर्माण, लॉन्चिंग, और उनके बीच संवाद बनाए रखना शामिल है, 120 बिलियन अमरीकी डॉलर का है. हाल के सालों में कनेक्टिविटी की बढ़ती मांग के चलते ये बाजार तेजी से विकसित हुआ है.

4-अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत अपनी कम कीमतों के साथ सेटेलाइट लॉन्च उद्योग में अपनी विशेष जगह बना सकता है.

आलोचक सवाल उठाते हैं कि जब सामाजिक विकास के मामले में भारत इतना पीछे है तो भारत सरकार वैज्ञानिक विकास पर धन खर्च क्यों कर रही है.

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Image caption भारत में करोड़ों लोग साफ पेयजल के लिए परेशान रहते हैं

भारत में आज भी करोड़ों लोगों को साफ पेयजल, अबाध बिजली आपूर्ति, शौचालय और रेल-रोड सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.

लेकिन बीती सरकारों ने तर्क दिया है कि विज्ञान और तकनीक पर खर्च से समावेशित सामाजिक विकास होता है.

हालिया रॉकेट लॉन्च इसी दिशा में एक कदम है. भारत को उम्मीद है कि विकासशील देश अपने उपग्रह लॉन्च करने के लिए पश्चिमी देशों की जगह भारत का रुख करेंगे.

आलोचना के बावजूद भारत सरकार ने इस मद में बजट को बढ़ा दिया है और शुक्र ग्रह के लिए एक मिशन लॉन्च करने की योजना बनाई है.

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