छापों के पीछे एनआईए का मकसद क्या है?

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श्रीनगर, जम्मू, दिल्ली और हरियाणा में कई जगहों पर पड़े राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी एनआईए के छापों ने कश्मीर में बहस छेड़ दी है. कुछ लोगों का मानना है कि इस कदम से सरकार को 'चरमपंथियों को मिलने वाले फंड' के स्रोतों के बारे में जानकारी मिलेगी और वो उन्हें धर-दबोचेगी.

दूसरी ओर कुछ लोग ख़ास तौर पर अलगाववादी नेताओं ने इसे विच-हंटिंग बताया है.

दिलचस्प है कि इसकी शुरुआत होती है निजी चैनल के एक स्टिंग ऑपरेशन से.

इस स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया है कि तीन अलगाववादी नईम अहमद खान, फारूक़ डार उर्फ बिट्टा कराटे और गाज़ी बाबा कश्मीर में साल 2016 में विरोध-प्रदर्शन भड़काने के लिए पैसे लेने की बात कबूल रहे हैं.

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Image caption कश्मीरी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी

हालांकि कश्मीर के लोगों के लिए यह सच है या नकली, इससे कोई बहुत फर्क़ नहीं पड़ा और ना ही कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों पर.

लेकिन बेशक भारत के दूसरे हिस्सों में इसे लेकर आक्रोश जरूर देखा गया और इसने एनआईए को मौजूदा कदम उठाने का मौका भी दिया.

यह कहा जा सकता है कि ये छापे कोई अप्रत्याशित नहीं थे. इससे पहले भी सीबीआई और इनकम टैक्स की ओर से अलगाववादी नेताओं के घर पर छापे पड़ चुके हैं लेकिन उसके बाद उन पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई. इससे लोगों में यह विश्वास बैठ गया है कि ये कार्रवाई अलगाववादियों पर दबाव डालने के लिए हुई थी.

हालांकि इस बार एनआईए ने सिर्फ़ अलगाववादी नेताओं तक ही छापेमारी को सीमित नहीं रखा है. उसने उनके अलावा कुछ व्यापारियों को भी निशाना बनाया है खास तौर पर उन्हें जिनके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सीमा पार के लोगों से व्यापारिक संबंध है.

व्यापार पर संदेह

यहां यह बता दें कि पिछले कुछ समय से सीमा पार से होने वाले व्यापार को लेकर अच्छी ख़बरें नहीं आई हैं.

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30 मार्च, 2017 को पुलिस को हथियारों का एक ज़खीरा हाथ लगा था जो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से तस्करी करके एक ट्रक में लाया जा रहा था. इस ट्रक का इस्तेमाल नियंत्रण रेखा के पार से व्यापारिक गतिविधियों के लिए श्रीनगर-मुजफ्फराबाद मार्ग पर किया जाता था.

पुलिस ने एक चीनी पिस्तौल, दो पिस्टल मैगज़ीन, 14 राउंड पिस्टल की गोली, चार एके मैगज़ीन, 120 एके की गोलियां और दो चीनी ग्रेनेड मिलने का दावा किया था.

साल 2014 और 2015 में नियंत्रण रेखा के पार से व्यापार कई हफ़्तों के लिए ठप पड़ा रहा था क्योंकि मुज़फ्फराबाद से आने वाले कुछ ट्रकों से नशीले पदार्थ जब्त किए गए थे.

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हालांकि अधिकारियों का कहना है कि हाल में पड़े छापों के 'मायने' हैं. उन्होंने छापों में कुछ नकदी और कुछ आपत्तिजनक दस्तावेज़ मिलने का दावा किया है.

लेकिन अभी तक एनआईए ने जब्त हुए समानों के बारे में स्पष्टता से कुछ नहीं बताया है और ना ही यह बताया कि 'चरमपंथी फंडिंग' से जुड़ा कुछ मिला है या नहीं.

हालांकि अलगाववादी नेताओं ने इन छापों को 'विच हंटिंग' बताया है और कहा है कि भारत सरकार उन्हें प्रताड़ित करने की कोशिश कर रही है क्योंकि वो 'कश्मीरियों को तोड़ने में हर मोर्चे में नाकाम' रहे हैं.

उन्होंने व्यापारियों के यहां छापा मारने को लेकर भारत सरकार पर कश्मीर की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का भी आरोप लगाया है.

डराने-धमकाने की कोशिश

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कुछ राजनीतिक विश्लेषक इन छापों को दूसरी नज़र से देख रहे हैं. उनका मानना है कि कश्मीरी अलगाववादी नेताओं से किसी भी तरह की बातचीत से बार-बार इंकार करने के बाद भारत सरकार इन छापों के माध्यम से अलगाववादियों को डराने-धमकाने की कोशिश कर रही है ताकि वो देश या देश के बाहर बातचीत की किसी भी मांग को दबा सके.

व्यापारियों पर छापा मारने पर ये विश्लेषक मानते हैं कि भारत-पाकिस्तान के बीच लगातार बढ़ते तनाव की स्थिति में सीमा पर से व्यापार को लेकर सरकार सकारात्मक नहीं है.

इसलिए वो इन्हें निशाना बनाकर इस वक्त के लिए इसे निरस्त ही कर देने की मंशा रखती है.

हालांकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी. अब देखना यह है कि एनआईए इन छापों की बदौलत 'चरमपंथी फंड' से जुड़े किन सबूतों को सामने लाती है.

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