'सरकारी कर्मी को कंडोम भत्ता, किसान को लागत भी नहीं'

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देश के कई हिस्सों में किसान आंदोलन कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिस ने फायरिंग की और कम से कम छह किसानों की मौत हुई और कई आंदोलनकारी घायल भी हो गए.

महाराष्ट्र में किसान अपनी मांगों को लेकर बीती एक जून से हड़ताल पर हैं.

इसके पहले तमिलनाडु के किसान हाथ में खोपड़िया लिए और मुंह में चूहा दबाकर दिल्ली में अर्धनग्न प्रदर्शन कर चुके हैं.

केंद्र सरकार ने अपने कार्यकाल के तीन साल पूरे होने पर दावा किया कि उसने किसानों के हित में कई योजनाएं लागू की हैं. नीम कोटेड यूरिया, किसान चैनल और सोइल कार्ड जैसी योजनाओं का कई बार बखान हुआ.

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लेकिन खेत छोड़कर सड़कों पर उतरे किसानों की आवाज़ एक अलग कहानी सुना रही है.

विपक्षी दल भी किसानों के समर्थन में आंदोलन छेड़ने का ऐलान कर रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ के अखिल भारतीय कृषि ग्रामीण मजदूर महासंघ ने भी केंद्र और राज्य सरकारों की किसान से जुड़ी नीतियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.

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हरित क्रांति के दावे और किसानों के दिन बदलने के वादों के बीच किसानों, उनके बीच काम करने वालों और कृषि विशेषज्ञों समेत सभी की राय है कि खेती करने वालों के सामने हालात दिन-ब-दिन मुश्किल होते जा रहे हैं.

बीबीसी हिंदी ने इन सभी के नजरिए से पूरी समस्या और उसके समाधान को जानने की कोशिश की.

किसानों की दिक्कत क्या है?

सबसे अहम सवाल है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान आंदोलन के लिए सड़क पर क्यों उतर रहे हैं.

कृषि मामलों के विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि दशकों से किसानों के साथ अन्याय हो रहा है. सारे देश में किसान दुखी हैं और उनके सामने सड़क पर उतरने के अलावा कोई चारा नहीं है. किसानों की एक ही दिक्कत है कि उन्हें उचित कीमत नहीं मिलती.

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देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "सरकारी कर्मचारी को वेतन के अलावा 108 भत्ते मिलते हैं जिसमें कंडोम के उपयोग का भत्ता भी होता है. लेकिन क्या किसानों की फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करते समय ऐसा कभी उनकी जरुरतों के बारे में सोचा गया."

किसानों के दर्द को समझने का दावा करने वाले राजस्थान के सांगानेर से भारतीय जनता पार्टी के विधायक घनश्याम तिवाड़ी कहते हैं, "विश्व में अमीर और गरीब का फर्क भारत में सबसे ज्यादा है. देश में 68.8 फीसदी किसान हैं और उनके पास सिर्फ 8 फीसदी संपदा है."

तिवाड़ी के मुताबिक यही उनकी सबसे बड़ी दिक्कत है.

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नीतियों से क्या परेशानी है?

देवेंद्र शर्मा दावा करते हैं कि साल 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के 17 राज्यों में किसान परिवार की औसतन आय 20 हजार रुपये साल है.

वो सवाल करते हैं, "आधे देश में अगर 17 सौ रुपये किसान की मासिक आय है तो क्या ये शर्म की बात नहीं है."

देवेंद्र शर्मा ये भी कहते हैं कि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के कहने पर अब तक की सरकारें किसानों को खेती से बेदखल करने की नीति पर काम करती रही हैं. शहरों में सस्ती मजदूरी के लिए किसानों को लाने की नीति पर ही काम होता रहा है.

विधायक घनश्याम तिवाड़ी भी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं.

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वो कहते हैं, "किसानों को बिजली नहीं मिलती. समर्थन मूल्य नहीं मिलता. फसल के वक्त सब्जी हो या अनाज सस्ता हो जाता है लेकिन बाद में महंगा हो जाता है. ये संतुलन बिठाने में सरकार नाकाम रही हैं."

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तिवाड़ी राजस्थान की बीजेपी सरकार को सामंतवादी बताते हुए आरोप लगाते हैं कि सरकार उनकी किसी सलाह को नहीं सुनती है.

वो केंद्र सरकार के लोकतांत्रिक होने का दम भरते हैं लेकिन उनका दावा है, "सरकार ने नीति तो बदली हैं लेकिन इससे किसान की स्थिति नहीं बदली है."

वहीं, भारतीय मजदूर संघ के अखिल भारतीय कृषि ग्रामीण मजदूर महासंघ के महामंत्री जेपीएस सिसोदिया का दावा है कि केंद्र सरकार की नीति की वजह से खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है.

सिसोदिया दावा करते हैं कि अगर किसान की लागत सौ रुपये है तो उसे फसल बेचकर सिर्फ 70 रुपये मिल रहे हैं.

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सिसोदिया कहते हैं कि सरकार की नीतियों पर गुस्सा बढ़ रहा है. "जीएसटी को लेकर सरकार की नीति के खिलाफ पूरे देश में 22 और 23 जून को जिलाधिकारियों के माध्यम से सरकार को नोटिस दिया जाएगा."

उन्नतशील से तरीके से खेती करने के लिए पुरस्कार जीत चुके मथुरा के किसान दिलीप कुमार यादव कहते हैं कि सरकार नीति बनाते समय देश के किसानों का ध्यान नहीं रखती.

वो याद दिलाते हैं, "बीते साल अरहर की दाल की कीमत 200 रुपये हुई तो सरकार मोजाम्बिक पहुंच गई और वादा किया कि वहां से दाल के साथ भूसा भी खरीदा जाएगा लेकिन आज भारत में 40 रुपये में भी दाल के खरीदार नहीं है. और किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल रहा है."

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कॉरपोरेट बनाम किसान

विधायक घनश्याम तिवाड़ी का दावा है कि 'सरकारें कॉर्पोरेट जगत समर्थक और किसान विरोधी नीतियां बनाती रही हैं.'

देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि बीते डेढ़ दशक से बजट का विश्लेषण करते हुए उन्हें लगता है कि सारा खजाना कॉर्पोरेट जगत के लिए खोल दिया जाता है. उसके बाद उनकी ऋण माफी होती है.

जेपीएस सिसोदिया सरकार की समझ पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "गेहूं का उत्पादन होता है मार्च और अप्रैल में जबकि मूल्य तय हो जाता है जनवरी में. जबकि उद्योगों में उत्पादन के बाद मूल्य तय होता है."

वो कहते हैं कि सरकार ने एक्सप्रेस वे बनाने के लिए किसानों की ज़मीन ली इससे उपज पर असर हुआ.

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वादों का जाल- किसान बेहाल

देंवेंद्र शर्मा याद दिलाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के वक्त वादा किया था कि सरकार बनने के बाद वो स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट के हिसाब से लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफा देंगे. सरकार बनने के बाद वो इसका जिक्र भी नहीं करते.

देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस चुनाव के वक्त कहते थे कि सोयाबीन का भाव छह हज़ार रुपये होना चाहिए. उस वक्त भाव 3 हज़ार आठ सौ था आज जब वो मुख्यमंत्री हैं तब भाव पच्चीस सौ रुपये है."

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आत्महत्या क्यों करते हैं किसान ?

देवेंद्र शर्मा दावा करते हैं कि बीते 21 साल में तीन लाख 18 हज़ार किसान आत्महत्या कर चुके हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में करीब 12 हज़ार किसानों ने आत्महत्या की.

वो कहते हैं, "आज किसान के मरने का एक कारण ये भी है कि हेल्थ के ऊपर उसका खर्च बढ़ता जा रहा है. स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हो रहा है वो महंगी हो रही हैं."

वहीं जेपीएस सिसोदिया का दावा है कि किसान जब कर्ज़ के बोझ तले दब जाते हैं तो उनके पास आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता.

वहीं किसान दिलीप कुमार यादव का कहना है कि प्राइवेट फाइनेंसरों के कर्ज़ के जाल में फंसने के बाद किसान आत्महत्या के लिए मजबूर होते हैं.

वो बताते हैं, "ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की भूमिका घट रही है और प्राइवेट फाइनेंसर बढ़ रहे हैं. बैंक की शर्त है कि पांच एकड़ जमीन से कम के मालिक को वो ट्रैक्टर का लोन नहीं दे सकती हैं. ऐसे में वो प्राइवेट फाइनेंसरों के पास जाने के लिए मजबूर होते हैं"

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कर्ज़ माफी से सुलझेगी समस्या?

देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि कर्ज़ माफ करना दीर्घकालिक समाधान नहीं है लेकिन अगर किसानों को मुख्य धारा में लाना है तो एक बार उनकी स्लेट को साफ करना होगा.

वो कहते हैं, " पिछले 13 साल में 55 लाख करोड़ रुपये की टैक्स छूट कॉर्पोरेट जगत को दी गई है. एक अध्ययन के हिसाब से हमारे देश में एक साल में गरीबी मिटानी हो तो 48 हज़ार करोड़ रुपये चाहिए. 55 लाख करोड़ रुपये में 110 साल की गरीबी हट जाती."

वहीं बीजेपी विधायक घनश्याम तिवाड़ी कहते हैं कि कॉर्पोरेट जगत को छूट मिल सकती है तो किसानों को भी कर्ज़ माफी मिलनी चाहिए.

वो कहते हैं, "सरकार जब 60 हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष कॉर्पोरेट को प्रोत्साहन के लिए देती है तो उसका अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ता तो किसान को देने पर क्यों पड़ेगा."

सिसोदिया कहते हैं कि किसान को इतनी आय नहीं होती है कि वो ट्रैक्टर के ऋण की किश्त तक दे सके. भले ही ऋण सिर्फ आठ फीसद की दर मिलता हो लेकिन किसान बिना ज़मीन बेचे ट्रैक्टर का ऋण नहीं चुका पा रहा है.

वो कहते हैं, "अगर कोई उद्योगपति उद्योग लगाता है तो पांच साल के लिए सारे टैक्स माफ कर दिए जाते हैं. जब किसान ऋण लेता है तो उसे कहा जाता है कि तुम पूरा भरो और वो भरता है."

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समाधान का रास्ता क्या है?

देवेंद्र शर्मा की राय में 'हर राज्य सरकार को राज्य किसान आय आयोग (स्टेट फार्मर इनकम कमीशन) का गठन करना चाहिए जिसमें ये तय किया जाए कि हर किसान को हर महीने 18 हज़ार रुपये की औसत आय कैसे मिले'

विधायक घनश्याम तिवाड़ी कहते हैं कि जिस प्रकार कोर्पोरेट को सब्सिडी दी जाती है, उसी तरह खेती के लिए किसान को प्रोत्साहन राशि दी जानी चाहिए.

वो कहते हैं, " अगर किसान को बिजली मुफ्त देंगे और मनरेगा को खेती से जोड़ेंगे तो दो संसाधन मुफ्त मिलने पर जो उत्पादन होगा, उससे उपभोक्ता को भी सस्ती चीजें मिलेंगी और सरकार पर भी बोझ नहीं पड़ेगा."

जेपीएस सिसोदिया की राय में सरकार को चाहिए कि वो किसानों को सब्सिडी दे और मंडियों में पारदर्शिता बढ़ाई जाए और किसानों को फसल का उचित मूल्य मिलना तय किया जाए. तभी किसानों की दिक्कत दूर हो सकती है.

दिलीप कुमार यादव की राय में किसानों को जब तक फ़सल की उचित कीमत नहीं मिलेगी उनकी दिक्कतें कम नहीं होंगी.

वो कहते हैं कि मथुरा और दिल्ली की दूरी सिर्फ 140 किलोमीटर है लेकिन किसान के लिहाज से दूरी ज़मीन और आसमान की है.

मथुरा में किसान दो रुपये प्रति किलो की कीमत पर लौकी बेचता है और दिल्ली में उसकी कीमत 15 गुना बढ़कर 30 रुपये हो जाती है.

सरकार की चुनौती है कि वो इस फर्क को दूर करे.

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