ब्लॉग: स्कर्ट जितनी लंबी ईमेल

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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

आजकल सब छोटा लिखने का चलन है. वेबसाइट के लेख हों, फ़ेसबुक का स्टेटस हो, व्हॉट्सऐप का मैसेज हो या ये ब्लॉग - कम शब्दों में अपनी बात कह दें तो बेहतर.

क्यों? क्योंकि फिर उसके पढ़े जाने की संभावना भी बेहतर होगी.

अब हुआ यूं कि 'ईमेल' लिखने के संदर्भ में यही साधारण सी बात - छोटा है तो बेहतर है - दिल्ली यूनिवर्सिटी की ओर से छात्रों को सुझाई एक किताब में लिखी गई.

बस लिखने के तरीके ने अर्थ का अनर्थ सा कर दिया.

2005 में छपी इस किताब में लिखा गया है, "ईमेल मैसेज स्कर्ट की तरह होने चाहिए - इतने छोटे कि दिलचस्पी पैदा हो और इतने लंबे की सभी ज़रूरी बिंदु कवर हो जाएं".

आगे हिदायत भी है कि, "अगर ईमेल संदेश लंबा होगा तो शायद पढ़ा ही ना जाए और पढ़ा भी जाए तो बेध्यानी से".

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Image caption जनवरी 2013 में बेंगलुरु में महिलाओं से बलात्कार और यौन शोषण के ख़िलाफ़ पुरुषों ने स्कर्ट पहनकर विरोध प्रदर्शन किया था.

यानी लब्बोलुबाब ये हुआ कि ईमेल की ही तरह स्कर्ट की सही लंबाई इतनी है जिसमें दिलचस्पी बनी रहे और सभी ज़रूरी 'बिंदु' कवर हो जाएं.

क्योंकि अगर उससे लंबी हुई तो कोई स्कर्ट पहननेवाली की तरफ़ देखेगा ही नहीं; और देखेगा भी तो बेध्यानी से.

बड़ी बेध्यानी से लिखी ये बात फिर उसी घिसी-पिटी सोच की ओर ध्यान ले जाती है जिसमें लड़कियों के शरीर का ज़िक्र हल्के और सेक्सिस्ट ढंग से कर दिया जाता है.

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ये ताज़ा उदाहरण ही ले लीजिए जब ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल, अमेज़न ने ऐसी ऐश-ट्रे निकाली जिसमें एक नग्न महिला को टांगें फैलाए बाथ-टब में लेटे हुए दिखाया गया.

अजूबा यही है कि औरतों के शरीर को चीज़ों सा तोलना बहुत आम है. चाहे इससे लड़कियों और लड़कों के बारे में कितनी ही ग़लत धारणाएं बनती चली जाएं.

मैं जब 12 साल की थी और पहली बार सड़क पर किसी ने मुझे छेड़ा और छूने की कोशिश की तो मैंने पूरी बाज़ू वाला कुर्ता और सलवार पहनी थी.

छोटी स्कर्ट ना पहने होने के बावजूद उस लड़के को मुझमें दिलचस्पी पैदा हो गई.

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और मैं क्या, ऐसा हज़ारों लड़कियों के अनुभव से पता चलता है.

बेंगलुरु में किए गए एक प्रोजेक्ट में लड़कियों से उन कपड़ों की तस्वीरें मांगी गईं जो उन्होंने तब पहन रखे थे जब उन्हें छेड़ा गया.

नतीजा ये कि सलवार, कुर्ते, जीन्स क्या साड़ी की भी तस्वीरें आईं.

यानी लड़कियों में दिलचस्पी, चाहे वो अच्छी हो या बुरी, का कपड़ों या टांगे दिखाने से कोई रिश्ता नहीं.

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ठीक वैसे जैसे अच्छी ऐशट्रे को औरत के गुप्तांग दिखाने की कोई ज़रूरत नहीं.

बल्कि ऐसी ऐशट्रे में सिगरेट बुझाने का ख़याल ही हिंसा को बढ़ावा देने वाला लगता है.

पर मायूस ना हों क्योंकि बदलाव की गुंजाइश कम नहीं बल्कि बढ़ ही रही है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी की किताब में 'ईमेल एटिकेट्स' में दिए गए स्कर्ट वाले सुझाव को अब एक छात्रा ने उठाया है जिसके बाद किताब के लेखक ने इसे हटाने का आश्वासन दिया.

सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना के बाद अमेज़न ने भी ऐशट्रे को अपनी वेबसाइट से हटा दिया है.

और अगर आपने ये ब्लॉग यहां तक पढ़ा है तो ज़ाहिर है कि दिलचस्पी लंबे लेख में भी बनाई जा सकती है.

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