मोदी के लिए क्यों ज़रूरी था कज़ाकस्तान जाना?

  • 7 जून 2017
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Image caption कज़ाकस्तान के राष्ट्रपति के साथ मोदी (फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कज़ाकस्तान में आठ और नौ जून को होने वाली शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में हिस्सा लेंगे.

कज़ाकस्तान मध्य एशिया का बहुत महत्वपूर्ण देश है और पारंपरिक रूप से भारत के साथ उसके रिश्ते बहुत अच्छे रहे हैं.

अगर भारत मध्य एशिया में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है तो कज़ाकस्तान एक नैचुरल पार्टनर हैं. मोदी 2015 में भी कज़ाकस्तान का दौरा कर चुके हैं.

उस समय भी कुछ महत्वपूर्ण समझौतों पर रजामंदी बनी थी. ये समझौते ऊर्जा और खनिज स्रोतों से जुड़े थे. इन दोनों ही क्षेत्रों में कज़ाकस्तान केंद्रीय भूमिका निभा रहा है.

ख़ासकर परमाणु ऊर्जा के सवाल पर कज़ाकस्तान से यूरेनियम सप्लाई पर भी बात हुई थी. इस सिलसिले में पहली डील भारत ने कज़ाकस्तान के साथ ही की थी.

रणनीतिक लिहाज से भी कज़ाकस्तान की बड़ी अहमियत है. अमरीका और रूस दोनों की ही उसमें दिलचस्पी है.

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मध्य एशिया

इस संबंध में कज़ाकस्तान ने बड़ी ताकतों के बीच चतुराई के साथ संतुलन साधा हुआ है. एक समय था जब कज़ाकस्तान पर रूस का दबदबा हुआ करता था.

धीरे-धीरे कज़ाकस्तान ने अमरीका के साथ अपने रिश्ते बैलेंस किए. और अब चीन भी कज़ाकस्तान में अहम रोल निभा रहा है.

लगभग हरा बड़ा रोल मध्य एशिया में कज़ाकस्तान की अहमियत को स्वीकार करता है. इसलिए वे काफी समय से वहां अपनी प्रभुत्व जमाना चाहती हैं.

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वहां जाने का प्रमुख मकसद शंघाई सहयोगी संगठन की बैठक में शिरकत करना है.

भारत काफी समय से शंघाई सहयोग संगठन में ऑब्ज़र्वर की भूमिका निभाता रहा है.

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शंघाई सहयोग संगठन

मध्य एशिया के लिए एससीओ को एक तरह से एक केंद्रीय संगठन के तौर पर देखा जा सकता है.

अगर मध्य एशिया में स्थिरता की बात होगी तो एक क्षेत्रीय संगठन की जरूरत महसूस की जाती है.

ऐसा संगठन जो सेंट्रल एशिया की जरूरतों, उसकी चुनौतियों और समस्याओं को समझे और उसके हल का रास्ता निकाल सके.

शुरू में भारत नहीं चाहता था कि वह इसका पूर्ण सदस्य बने. 2011-12 से भारत की कोशिशें ज्यादा तेज हुई हैं.

इस समय भारत और पाकिस्तान दोनों ही शंघाई सहयोग संगठन के पूर्ण सदस्य बनने जा रहे हैं.

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चीन का दबदबा

इससे भारत को सेंट्रल एशिया की चुनौतियों, समस्याओं और राजनीति में महत्वपूर्ण रोल निभाने का मौका मिलेगा और भारत अपने आप को एक क्षेत्रीय ताकत के तौर पर प्रोजेक्ट कर पाएगा.

ऐसा नहीं है कि ये बहुत आसान है. इसमें जटिलताएं भी बहुत हैं. पहली बात तो ये है कि शंघाई सहयोग संगठन में चीन का दबदबा है.

चीन ने इसे रूस की मदद से शुरू किया था. राजनीतिक समीकरणों को देखा जाए तो चीन और रूस इस समय बहुत मिलकर काम कर रहे हैं.

पाकिस्तान को इसमें जोड़ दिया जाए तो भारत की कूटनीतिक और राजनीतिक समस्याएं बढ़ भी सकती हैं.

दूसरी तरफ भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ये स्पष्ट कर दिया है कि कज़ाकस्तान दौरे में प्रधानमंत्री मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की मुलाकात नहीं होगी.

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कुछ हलकों में ये सवाल उठ रहा है कि एससीओ में आने से क्या भारत के चीन से रिश्ते सुधरेंगे और एनएसजी में उसकी सदस्यता पर बीजिंग के रवैये में बदलाव आएगा?

भारत और चीन कई अन्य संगठनों में भी साथ जुड़े हुए हैं. इससे तो दोनों देशों के रिश्तों में कोई फर्क पड़ा नहीं.

भारत और चीन उभरती हुई ताकतों के संगठन ब्रिक्स में साथ है, इससे तो दोनों के रिश्तों में कोई फर्क नहीं पड़ा.

मुझे नहीं लगता कि शंघाई सहयोग संगठन में भारत के जाने से चीन के साथ उसके संबंधों में कोई बड़ा सुधार आने वाला है.

मुझे ये डर है कि एससीओ में भारत खुद को अलग-थलग पाएगा क्यों कि इसके ज्यादातर सदस्य देश इस्लामी मुल्क हैं.

हमने देखा है कि एससीओ के दो ताक़तवर देश धीरे-धीरे पाकिस्तान की तरफ मुड़ते जा रहे हैं.

(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बातचीत पर आधारित)

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