ब्लॉगः महिलावादी बनना मुश्किल, वकालत आसान

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स्त्री पुरुष बराबरी की बात करना आसान है लेकिन इसे जीना मुश्किल है. ये ज्ञान कोई मोटी-मोटी किताबें पढ़कर नहीं आया है. बल्कि, शादी करने के बाद आया है.

अरे, आप हंस रहे होंगे! हंस भी लीजिए, हंसने की ही बात है.

मैं अब तक खुद को एक फैमिनिस्ट यानी महिलावादी शख्स के रूप में देखता था. मेरे लिए इसका मतलब साथ काम करने वाली महिलाओं और आम तौर पर महिलाओं एवं पुरुषों को बराबरी की नज़र देखना था.

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खुद को महिलावादी मानते हुए मैंने शादी में दहेज न लेने का फैसला किया, शादी की शॉपिंग में भी बराबरी का ख्याल रखा.

महिलावाद की वकालत

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शादी के समारोह की बात करें तो मैंने शादी का भार लड़की वालों पर न डालकर उन्हें अपने घर बुलाया. पूरी शादी के प्रबंधन का जिम्मा भी अपने कंधों पर उठाया. उनके ठहरने से लेकर रस्मों और रिश्तेदारों की खुशामद भी की. जैसा आमतौर पर लड़की वाले बारातियों की खुशामद करते हैं.

थोड़ा विरोध हुआ लेकिन मैं मज़े से मन ही मन सोच रहा था कि कम से कम मैंने पूरी ईमानदारी से महिलावादी होने का फर्ज़ निभाया.

यहां तक तो सब कुछ ठीक था. लेकिन अब असल मुसीबत आने वाली थी.

हम दिल्ली आ गए थे और अब महिलावाद को आम जिंदगी में उतारना था.

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बीते छह महीनों से मेरे मुंह से महिलावाद की तमाम वकालत सुनने वाली मेरी पत्नी ने मेरे साथ बराबरी वाला सुलूक करना शुरू कर दिया.

अब आप इस बात को किसी नकारात्मक अंदाज़ में मत लीजिए.

उसने वही सब करना शुरू कर दिया जिसके लिए मैं उसे बीते छह महीनों से प्रेरित कर रहा था.

नारीवादी इमेज़ का चक्कर

अरेंज मैरिज में भी इतने कम समय में मैंने उसे भरोसा दिला दिया था कि मैं वो शख़्स हूं जो महिलाओं को पुरुषों के बराबर सिर्फ़ मानता नहीं है बल्कि रोजमर्रा की ज़िंदगी में इसका पालन भी करता है.

अब वो कहते हैं न कि अक्सर आप अपनी ही बनाई इमेज़ में फंस जाते हैं. तो मेरे साथ भी वही सब हो रहा है.

मसलन, अक्सर मेरी पत्नी मुझसे कह देती हैं कि प्लीज़, चाय बना लीजिए या किचिन में जाकर गैस बंद कर दीजिए.

ये सभी सामान्य बातें हैं लेकिन मेरे लिए नहीं थीं.

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मैं एक ऐसे परिवार और समाज में पला-बढ़ा हूं जहां पर पतियों की सेवा करना महिलाओं का फर्ज़ माना जाता है.

महिलाएं भी इसे सहर्ष स्वीकार करती हैं. ऐसे में बार-बार कोई न कोई काम बता देने का आग्रह, वो भी अपनी पत्नी की तरफ से, थोड़ा अजीब लगा.

सही बात भी अजीब

अक्सर ऐसा ही होता है. जब आपने पढ़ाई ही गलत की हो तो सही बात भी अजीब और अटपटी सी ही लगती है.

अजीब तो लगता है लेकिन मैं बिना कोई प्रतिक्रिया दिए ये सारे काम खुशी-खुशी कर रहा हूं. घर के कामों में उनका साथ दे रहा हूं.

लेकिन जब बार-बार ऐसे आग्रह होते हैं तो मेरे अंदर समाया घोर पुरुषवादी व्यक्ति चिल्लाकर कहता - 'ऐ, ये क्या हो रहा है, कोई तरीका है ये'

लेकिन मैंने इस आवाज़ को शांत करते हुए घर के कामकाज में मदद करने का फैसला किया है.

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धारा के इस पार या उस पार होने का मौका

ये वो मौका है जब या तो मैं महिलावादी होने के नाम पर खुद को ढोंगी सिद्ध कर सकता हूं. अपनी पत्नी को ऐसे आग्रहों को करने से रोक सकता हूं, हो सकता है कि वो बिना कोई प्रतिक्रिया दिए मान भी जाएं.

या फिर मैं थोड़े कठिन रास्ते पर चलते हुए ईमानदारी से बराबरी के सिद्धांत का पालन कर सकता हूं. मैंने कठिन रास्ता चुना है.

लेकिन रोज सुबह जब मेरी पत्नी सुबह छह बजे उठकर मेरे लिए लंच और ब्रेकफास्ट तैयार करती हैं तो खुशी की जगह तनाव होता है.

मन में आता है कि ये इतना कर रही हैं तो मुझे भी इतना नहीं तो कुछ तो करना होगा.

चूंकि, मुझे पता है कि ये इतना आसान नहीं होगा.

मेरे अंदर फिर वही आवाज़ चीख रही है कि खाना बनाना और घर साफ रखना तो महिलाओं का काम होता ही है फिर चाहें वह घरेलू महिला हों या कामकाजी.

सुधार की ओर का कठिन रास्ता

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अब अगर मैं ये आवाज़ सुन लेता हूं तो मैं खुद को उन पाखंडी लोगों की जमात में एक नया सदस्य बनाऊंगा जो वकालत भूले-बिसरे और शोषितों की करते हैं लेकिन उनके हित में एसी बंद करने की बात भी आए तो बहाने गढ़ लेते हैं.

दूसरा तरीका है कि मैं अपनी पत्नी के साथ बराबरी का रिश्ता जियूं और कंधे से कंधा मिलाकर खाना बनाना भी सीख लूं.

पहला रास्ता सरल है और दूसरा कठिन. फिलहाल तो मैं कठिन रास्ते पर ही चल रहा हूं और आगे भी चलने की कोशिश करूंगा...

लेकिन ये बात तो जान ही ली है कि खुद को महिलावादी कहना तो आसान है लेकिन रोज़मर्रा की जिंदगी में ईमानदारी से इसका पालन ज़रा सा मुश्किल है. लेकिन पता ये बात भी चली है कि प्रेम अगर प्रदर्शन की जगह व्यवहार में हो तो ये मुश्किल आसान हो जाती है.

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