#UnseenKashmir: 'कश्मीर की तरह मानवता को आज़ादी चाहिए'

  • 9 जून 2017

प्यारी दुआ,

तुम्हारा ख़त मिला और ख़त में तुमने मुझे कश्मीर आने के लिए न्यौता दिया और यह मुझे बहुत अच्छा लगा लेकिन अभी दो साल मैं कहीं निकलने का नहीं सोच रही हूं क्योंकि यह दो साल मेरे करियर के लिए बहुत अहम हैं.

हमारा ख़त पब्लिश होने से मेरे परिवार और जाननेवालों से मुझे भी बहुत सारी बधाइयां मिली.

हमारे ख़त को बीबीसी हिंदी की साइट पर करीबन 96000 लोगों ने देखा है और यह सब मेरे लिए बहुत एक्साइटिंग है.

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मिलिए श्रीनगर की दुआ और दिल्ली की सौम्या से

मेरे दोस्तों ने भी इसे पढ़ा और उनको भी यह ख़तों का सिलसिला बहुत अच्छा लगा.

वैसे मैं आज़ादी के बारे में तुमसे नहीं पूछना चाहती थी, लेकिन मैं अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाई. और मुझे तुम्हारा जवाब बहुत अच्छा लगा.

कश्मीरी जिन चीज़ों से आज़ादी चाहते हैं उन चीज़ों से पूरी मानवता को आज़ादी चाहिए.

आए दिन हमारा अख़बार क्रूरता और नफ़रत के उदाहरणों से रंगा होता है. कभी पिता अपने बेटे को नशे में मार देता है तो कभी बेटा अपने बूढ़े बाप को.

कहीं कोई एकतरफा प्यार करने वाला लड़का, लड़की पर तेज़ाब फेंक देता है, तो कभी कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को गोलियों से भून देता है.

मैं चाहती हूं कि कश्मीर की आज़ादी के सवाल पर और ज़्यादा जान सकूं इसलिए आगे भी हम लोग यह 'पत्र-व्यवहार' करते रहें तो मुझे भी अच्छा लगेगा.

मैं यह मानती हूं कि हर इंसान की कुछ न कुछ विशेषता होती है, सभी में किसी न किसी तरह की काबिलियत होती है और सभी को तरक्की करने का मौक़ा चाहिए.

यह जानकर भी मुझे अच्छा लगा कि अस्पताल, स्कूल, कॉलेज सब 20वीं सदी में ही बने थे कश्मीर में.

इस पत्र व्यवहार के ज़रिए मुझे लगा कि हमारी जैसी लड़कियों की पसंद-नापसंद मिलती-जुलती होती है.

इस प्रोजेक्ट से मुझे कश्मीर के बारे में अच्छी जानकारी मिली.

जैसी मेरी उम्मीद थी वैसा ही विकास किया है कश्मीर ने, लेकिन समय-समय पर टूरिज़्म प्रभावित होता रहा है अशांति से.

और उसका असर आम जीवन पर पड़ता रहा है और मैं चाहूँगी कि इन टॉपिक्स पर हम लोग आगे भी बात करते रहे.

जहां तक भ्रष्ट-प्रशासन का सवाल है तो भारत के दूसरे राज्यों की हालत कश्मीर से बेहतर नहीं है और विकास में इससे बाधा तो पड़ती है.

आख़िर में मैं बीबीसी को धन्यवाद करना चाहती हूँ जिसने हमें मिलने का मौक़ा दिया.

उम्मीद है यह चिट्ठी का सिलसिला कभी न थमे.

बहुत सारा प्यार

तुम्हारी दोस्त,

सौम्या


क्या आपने कभी सोचा है कि दशकों से तनाव और हिंसा का केंद्र रही कश्मीर घाटी में बड़ी हो रहीं लड़कियों और बाक़ि भारत में रहनेवाली लड़कियों की ज़िंदगी कितनी एक जैसी और कितनी अलग होगी?

यही समझने के लिए हमने वादी में रह रही दुआ और दिल्ली में रह रही सौम्या को एक दूसरे से ख़त लिखने को कहा. सौम्या और दुआ कभी एक दूसरे से नहीं मिले.

उन्होंने एक-दूसरे की ज़िंदगी को पिछले डेढ़ महीने में इन ख़तों से ही जाना.


(रिपोर्टर/प्रोड्यूसर: बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य)

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