ब्लॉग: 'डिजिटल इंडिया के भी अपने ही कर्मकांड हैं'

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आख़िरकार मेरी शादी हो गई क़ानूनी तौर पर.

हालांकि, मेरी शादी सात साल पहले हो गई थी, लेकिन कानूनी नहीं, पारंपरिक वाली.

मालूम हुआ कि शादियों का रजिस्ट्रेशन भी अब डिजिटल हो गया है. मैं सोचकर खुश हुआ कि सब काम आसान हो जाएगा. मैंने फॉर्म भर दिया और सारे दस्तावेज अपलोड कर दिए.

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अपलोड करने के लिए जो पापड़ बेलने पड़े वो एक अलग कहानी है.

नोटरी का तीन पन्ने का दस्तावेज 188 केबी में करना है और आधार कार्ड का आगे-पीछे, दोनों हिस्सों को स्कैन कर के इतने ही केबी में अपलोड करना है. यह सब टेढ़ी खीर ही था.

दो बार अपॉइंटमेंट लेने के बाद कैंसल हो गया, क्योंकि एक बार एसडीएम साहब की बैठक थी और दूसरी बार एमसीडी चुनाव थे.

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अपॉइंटमेंट पर अपॉइंटमेंट...

ख़ैर, हमें तीसरी बार अपॉइंटमेंट मिला. निर्धारित समय पर मैं पहुंच भी गया, लेकिन वहां छूटते ही कहा गया कि मैंने दस्तावेज़ ठीक से अपलोड नहीं किए हैं.

हालांकि, मेरे फ़ोन पर सारे दस्तावेज़ अपलोडेड दिख रहे थे. ऐसी दिक्कत साथ खड़े एक और व्यक्ति को भी हो रही थी.

मैं जब अड़ गया तो एसडीएम दफ़्तर में कार्यरत व्यक्ति ने कहा कि ठीक है, मैं अधिकारी से पूछ लेता हूं.

उन्होंने पूछा या नहीं, यह मुझे पता नहीं, लेकिन मेरी फ़ाइल आगे बढ़ गई.

फिर गवाह की फ़ाइल देख कर कहा गया कि पैन कार्ड चाहिए ही चाहिए. इसे लेकर अच्छी ख़ासी बकझक होने लगी, तो अधिकारी के साथ रहने वाले पुलिसकर्मी ने आकर कहा कि अरे आप हाइपर मत होइए.

पैन कार्ड ही पहचान?

मेरा तर्क था कि पैन कार्ड किसी की भी आइडेंटिटी का ऐसा सबूत नहीं हो सकता, जिसकी जगह कोई और कागज़ मान्य ही नहीं हो.

ख़ैर मैंने अपने गवाह से कहा कि वो पैन कार्ड लाए. उसका पैन कार्ड ई-मेल पर था और ओरिजिनल गुम हो चुका था.

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मैंने उसकी प्रति जमा की और कहा कि ओरिजिनल नहीं दिखा पाऊंगा. उसके बदले आप वोटर कार्ड देख लें.

दस्तावेज़ अपलोड करने वाले ने फिर कहा कि वो अधिकारी से पूछ कर बताएंगे. अब मैं बिल्कुल थक गया था क्योंकि सुबह के दस बजे मैंने दफ़्तर में कहा था कि मैं थोड़ी देर से आ जाऊंगा.

अब 12 बज रहे थे. किसी तरह नंबर आ गया तो अंदर बैठी अधिकारी के पास पहुंचे. महिला अधिकारी ने बेहद संयम से हमारे पासपोर्ट चेक किए.

जब गवाह के पैन कार्ड की बात आई, तो मैंने बताया कि इसका ओरिजिनल नहीं है तो उन्होंने कहा कि ये तो ज़रूरी होता है ताकि लोग कोई फ्रॉड न कर सकें.

एक युवा अधिकारी

मैंने गवाह का वोटर कार्ड दिखाते हुए कहा कि ये कोई पराया आदमी नहीं बल्कि मेरी पत्नी का भाई है और आप चाहें तो पिता का नाम चेक कर सकते हैं. इसपर अधिकारी ने कागज़ों का मिलान किया और हस्ताक्षर कर दिए.

मुझे लगा कि अब तो काम हो ही गया.

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लेकिन बाहर निकले तो पता चला कि अभी तो झोल शुरु हुआ है. बाहर बैठे कर्मचारी ने अहसान जताने के स्वर में बताया कि सर अभी तो आपका डॉक्यूमेंट मुझे अपलोड करना पड़ेगा और इस बीच में सरकारी कार्यालयों का नया एक्सक्यूज़ आ गया.

सर सर्वर तो डाउन हो गया...

मैंने माथा पीट लिया और कर्मचारी के सामने ही बैठ गया कि जब तक सर्वर अप नहीं होता तब तक उठूंगा नहीं.

कर्मचारी ख़ुद ही बताने लगा कि सर जी दिक्कत क्या है न कि स्पेस है नहीं, इसलिए लोगों को कम केबी की फ़ाइल अपलोड करने को कहते हैं. अब देखिए इतने कम केबी की फ़ाइल होने पर भी सर्वर लोड नहीं ले रहा.

मैंने जवाब में इतना ही कहा कि भई अब तो डिजिटल है पूरा इंडिया. केंद्र में नरेंद्र मोदी और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, दोनों टेक्नोलॉजी चाहने वाले हैं. तो ये सब दिक्कत तो नहीं होना चाहिए.

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जवाब में कर्मचारी बस मुस्कुराया, मानो कह रहा हो- 'डिजिटल इंडिया के अपने झोल हैं.'

ख़ैर, आधे घंटे में सर्वर अप हो गया और मुझे जाने को कहा गया.

दो दिन बाद सर्टिफ़िकेट अपलोड हो गया और मैं आधिकारिक रूप से विवाहित हो गया.

एक बात अच्छी लगी कि डिजिटल होने से भ्रष्टाचार का स्कोप काफ़ी कम हुआ है, लेकिन डिजिटल के भी अपने झोल ज़रूर हैं, अभी भी.

...तो काम आसान हो जाए

सरकारी अधिकारी बेहतर हुए हैं, ख़ासकर युवा अधिकारी, जो आपकी बात सुनते हैं, समझते हैं और समाधान बताते हैं.

लेकिन कर्मचारियों की समस्याएं हैं. कर्मचारी ख़ुद को अधिकारी से कम नहीं समझते. उनके व्यवहार में बदलाव की ज़रूरत महसूस हुई.

अगर वो बिना अधिकारी को पूछे ही समाधान बता दें, तो शायद काम और आसान हो जाए.

ख़ैर, शादी को लीगल करने में एक दिन पूरा लगा. मैंने कर्मकांडों से बचने के लिए अपनी पारंपरिक शादी आर्य समाज मंदिर में की थी और शादी में बस डेढ़ घंटे लगे थे, जिसमें सर्टिफ़िकेट बनवाना भी शामिल था.

मुझे पता नहीं था कि डिजिटल के भी अपने कर्मकांड होते हैं, जिसमें पूरा दिन लग जाता है.

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