झारखंड: आदिवासी समुदाय में परिवार के भीतर ही क्यों हो रहे हैं क़त्ल

  • 14 जून 2017
झारखंड के आदिवासी समाज में जागरूकता की भारी कमी इमेज कॉपीरइट NIRAJ SINHA

झारखंड के आदिवासी इलाक़ों में क़त्ल की बढ़ती घटनाओं से इस समुदाय को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता चिंता में हैं. ये सारी हत्याएं शक और जागरूकता के अभाव के कारण हो रही हैं.

दरअसल इन घटनाओं की वजह से आदिवासी परिवार टूट-बिखर रहे हैं.

इससे सामाजिक तानाबाना बिगड़ने के ख़तरे भी बढ़े हैं. पिछले तीन महीने के दौरान पारिवारिक हत्या में कम से कम तीन दर्जन लोग मारे गए हैं.

पुलिस के मुताबिक अधिकतर घटनाओं में पत्नी, बच्चे, मां-बाप मारे जा रहे हैं. चाईबासा, खूंटी, रांची, दुमका, गुमला, पूर्वी सिंहभूम, सिमडेगा, पाकुड़ जैसे आदिवासी बहुल ज़िलों के गांवों में इन घटनाओं का सिलसिला जारी है.

चार जून को रांची में एक युवक ने सौतेले पिता की कथित तौर पर हत्या इसलिए कर दी कि उसे शराब पीने के लिए पैसे नहीं दिए.

'डायन' के शक में भी हत्याएं हो रही हैं. खूंटी के कनसीली गांव में डायन के शक में एक वृद्ध दंपती की हत्या के आरोप में पुलिस ने पिछले दिनों उनके दो भतीजों और बहू को गिरफ़्तार किया है.

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डायन प्रथा के ख़िलाफ़ सालों से काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता पूनम टोप्पो बताती हैं कि शिक्षा और जन जागरूकता के अभाव में जोदू-टोना, ओझा-गुनी के चक्कर में आदिवासी परिवार बिखर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि इन मामलों में सरकारी स्तर पर जो प्रयास हो रहे हैं, वे नाकाफ़ी हैं. टोप्पो ने कहा कि पंचायतों और ग्रामसभा को भी ज़िम्मेवारी लेनी होगी, वरना इन घटनाओं पर रोक मुश्किल है.

हाल के दो ख़ौफ़नाक मामले सुर्खियों में हैं. बीस अप्रैल को झारखंड की राजधानी रांची के सुदूर गांव पुरनाटोली में एक आदिवासी ने कुल्हाड़ी से अपने तीन साल के मासूम बेटे के कथित तौर पर तीन टुकड़े कर दिए.

बुढ़मू पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर जेल भेजा है, जबकि एक मई को खूंटी में एक आदिवासी को सात साल के बेटे की कथित हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.

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चाईबासा के पुलिस अधीक्षक अनीष गुप्ता बताते हैं जांच में ये तथ्य सामने आते रहे हैं कि इस तरह की अधिकतर घटनाएं देर शाम या रात में होती हैं. हड़िया-शराब भी इसकी बड़ी वजह रही है जबकि हथियार के तौर पर कुल्हाड़ी, लोढ़ा, दउली, लाठी जैसे पांरपरिक हथियारों का इस्तेमाल करते हैं.

कोल्हान की घटनाओं की चर्चा करते हुए वो बताते हैं कि कई मौक़े पर वे दो-तीन हत्याएं एक साथ कर देते हैं, लेकिन अब सुदूर इलाक़े से भी पुलिस तक ये मामले पहुंच रहे हैं, तब त्वरित कार्रवाई की जाती है.

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चाईबासा से पहले खूंटी में तैनात रहे ये पुलिस अधिकारी इस बात से इनकार नहीं करते कि गिरफ़्तारी और सज़ा जैसी क़ानूनी प्रक्रिया के बीच आदिवासी परिवार मुश्किलों में पड़ जाता है.

टूटते-बिखरते परिवार

रांची से 50 किलोमीटर दूर उबड़-खाबड़ रास्तों और जंगलों से गुजरते हम पुरनाटोली गांव में सुकरा उरांव के घर का हाल जानने पहुंचे थे.

उरांव को मासूम बेटे की कथित हत्या के आरोप में पुलिस ने गिरफ़्तार कर जेल भेजा है. बेटे की कथित हत्या के बाद उरांव की पत्नी बेटी को लेकर मायके चली गई है.

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घटना से चार दिन पहले यानी सोलह अप्रैल को सुकरा उरांव ने बहन की शादी की थी. सुकरा की ब्याही बहन भी इस घटना के बाद मायके चली आई हैं. वो बताती हैं कि उनता भतीजा बहुत सुंदर था और भाई भी समझदार था.

आख़िर ये सब हुआ कैसे? इस सवाल पर सुकरा के भाई सुखदेव उरांव बताते हैं कि बहन की शादी के बाद वो बेचैनी से इधर-उधर घूमता चल रहा था.

20 अप्रैल की सुबह बेटे को नहलाने की बात कहकर खेतों के बीच बने कुएं पर ले गया और यह हादसा हुआ. सुकरा की भाभी नागो उरांव ज़ोर देकर कहती हैं कि ज़रूर किसी ने जादू-टोना कर दिया.

रांची विश्विद्यालय के समाजशास्त्री डॉ प्रदीप कुमार सिंह बताते हैं कि बेशक झारखंड में आदिवासी परिवारों को पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और आधुनिक परिवेश के बीच संघर्ष परेशान कर रहा है.

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मासूम बच्चों और पत्नी की हत्या के सवाल पर वे कहते हैं कि कई घटनाओं की गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा कि पति को पत्नी के चरित्र पर संदेह है. उसे लगता है कि बच्चा किसी और से है.

उन्होंने कहा, ''इसका वे प्रत्यक्ष तौर पर अहसास नहीं कराते, लेकिन परोक्ष तौर पर वे भयावह घटना को अंजाम देते हैं.''

काटकर थैली में रखा सिर

पिछले दिनों कोल्हान के एक सुदूर गांव बांगरटोला में पत्नी की हत्या करने के बाद थैली में सिर लेकर सरेंडर करने कोर्ट पहुंचे एक आदिवासी को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. तब पुलिस तफ्तीश में ये बातें सामने आईं कि उसे चरित्र पर संदेह था.

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