'वो रहम की भीख माँगता रहा, लोग पिटाई का वीडियो बनाते रहे'

  • 13 जून 2017
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क्या चलता है उन्मादी भीड़ के दिमाग़ में? यह उनसे बेहतर कौन बता सकता है जिन लोगों ने ख़ुद ऐसी भीड़ का सामना किया हो.

उन्मादी भीड़ के हमलों के मामले में झारखंड से सबसे ज़्यादा ख़बरें आ रही हैं.

चाहे वो जमशेदपुर के दो भाई- विकास और गौतम की हत्या का मामला हो, या फिर सरायकेला खरसांवा ज़िले में चार लोगों की हत्या का मामला हो.

अनियंत्रित भीड़ की चपेट में जो आया वो बेरहमी से मारा गया.

सरायकेला खरसांवा ज़िले के शोभापुर गावं में 18 मई को जो कुछ हुआ उसे ना तो शम्सुल हक़ भुला पा रहे हैं ना गांव के दूसरे लोग.

बच्चा चोर होने के शक में उन्मादी भीड़ ने चार लोगों की पीट पीट कर हत्या कर दी थी. शम्सुल हक़ इस वारदात के चश्मदीद थे.

सुनिए उस ख़ौफ़ भरे दिन की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी.

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शम्सुल हक की ज़बानी-

ग्राम- शोभापुर, जिला- सरायकेला खरसांवा, झारखंड.

"अरे पकड़ो. मारो. देखो, छिपा है. बच्चा चोर है. इसको नहीं छोड़ेंगे. जो बचाने आएगा, उसको भी मारेंगे. सब बच्चा चोर हैं. पूरा गिरोह है. आग लगा देंगे. मार देंगे. फूंक दो.

फिर मां-बहन की गंदी-गंदी गालियां. तेज़ आवाज़. खूब हल्ला. धम-धड़ाक. दौड़ने-भागने और चिल्लाने की आवाज़ें, मानो कोई हमला हुआ हो.

18 मई की वह खौफ़नाक सुबह अजीब थी. मुझे फ़ज्र की नमाज पढ़नी थी. औरतों को चूल्हा-चौका करना था ताकि बच्चों के जगने के पहले खाने का इंतजाम हो सके.

तभी यह आवाज़ हमारे कानों में गूंजने लगी. शोर धीरे-धीरे हमारे और क़रीब आता जा रहा था. आवाज़ें तेज़ होने लगीं. तो, हम लोग डरे हुए घर से बाहर निकले. .

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तब पता नहीं था कि बाहर क्या हो रहा है. यह शोर मेरे चाचा मुर्तुज़ा अंसारी के घर की तरफ़ हो रहा था.

मैं दौड़कर उनकी घर के तरफ गया, तो वहां का नज़ारा देखकर माथा घूम गया. उनके घर का एक हिस्सा जल रहा था. लोगों ने उनके घर में आग लगा दी थी.

चचीजान और उनके घर की दूसरी औरतें अपने-अपने बच्चों के साथ मेरे घर की तरफ भागीं ताकि बच्चों को बचा सकें.

घर की नकदी और गहने भी निकाल लिए कि कोई लूट न ले. उन्होंने बताया कि लोगों ने चचाजान (मुर्तुजा अंसारी) को घेर लिया है. उन्हें पीट रहे हैं.

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मैं सड़क पर आया तो भीड़ देखकर डर गया. अमन की मिसाल देने वाले मेरे गांव में दो-तीन हज़ार बाहरी लोग हंगामा कर रहे थे. वे पास के गांवों से आए थे.

चचाजान उनकी भीड़ में घिर चुके थे. वो उनसे बच्चा चोरों को सौंपने की मांग कर रहे थे. सड़क किनारे एक कार जल रही थी.

तब तक मेरे गांव के तमाम लोग भी वहां पहुंचने लगे. सबने भीड़ से शांत होने की अपील की. लेकिन, वे भीड़ के उन्माद के सामने बेबस हो चुके थे.

भीड़ में शामिल लोगों के हाथों में लाठी, तलवार, रॉड, भाला, गड़ासा जैसे हथियार थे.

मेरे चाचा को पीट रहे थे. बोल रहे थे कि इसने बच्चा चोरों को पनाह दी है. गांव के लोगों को भी तत्काल कुछ समझ नहीं आया. जितने मुंह, उतनी बातें.

कोई कुछ कहे तो कोई कुछ और. कोई भी ऐसे आतंक के लिए तैयार नहीं था.

तभी पता चला कि मुर्तुजा चाचा के साढ़ू शेख हलीम और उनके साथी सज्जाद, सेराज खां और शेख नईम देर रात कार से उनके घऱ आए थे.

'लोग भाग रहे मेहमानों का पीछा करने लगे'

उन लोगों ने उन्हें बताया था कि किसी काम से जमशेदपुर जा रहे थे, तभी इधर मुड़ गए. इन्हीं चारों लोगों पर भीड़ बच्चा चोर होने का आरोप लगा रही थी.

यह मंज़र देख चचाजान के साढ़ू और उनके साथी पहाड़ी की तरफ भाग निकले ताकि भीड़ से जान बचा सकें.

इधर भीड़ चचाजान से उन चारों को सौंपने की मांग करने लगी. तो, कुछ लोग भाग रहे मेहमानों का पीछा करते हुए पहाड़ी की तरफ जाने लगे.

वे चार लोग थे और उनके पीछे सौकड़ों की भीड़. नईम भाग नहीं पाया, तो नजर बचाकर मेरे घर की तरफ लौटा.

वह कब घर के बाहर स्थित गुसलखाने में छिप गया, यह हमें भी पता नहीं चला.

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तब तक भीड़ चचा की घर से आगे बढ़कर मेरे घर की तरफ आ गई.

भीड़ बढ़ती जा रही थी और उसमें शामिल लोग बच्चों और औरतों की परवाह किए बगैर घर में तोड़फोड़ करने लगे.

हमारे घर में बेचने के लिए रखे प्लास्टिक के खिलौनों में आग लगा दी. तभी किसी ने नईम को देखा और उसे खींचकर बाहर निकाल लाए. उसे पीटने लगे.

जिसके हाथ में जो था, वही चलाने लगा. पिटाई से नईम लहू-लुहान हो गया. हमने उसे छोड़ने की मिन्नतें की. लेकिन, लोग उसे घसीटते हुए ले जाने लगे, मानो किसी बोरे को घसीट रहे हों.

कुछ दूर ले जाकर उसे फिर से पीटने लगे.

नईम उनके बीच में हाथ जोड़े बैठा था. वह बोल रहा था कि वो लोग बच्चा चोर नहीं हैं. कोई बच्चा नहीं है उनके पास. मुझे जाने दीजिए.

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उन्मादी भीड़ ने एक नहीं सुनी

लेकिन, भीड़ में शामिल लोग उसकी बात नहीं सुन रहे थे. लात-घूंसे, लाठी, रॉड सबसे पीटने लगे. जिसके हाथ में जो था, वह वही चला रहा था. नईम गिड़गिड़ा रहा था.

उसके सर से खून इस कदर बहने लगा, जैसे किसी का पसीना बहता है. वह अपनी जिंदगी की भीख मांग रहा था. उसे उम्मीद थी कि मारने वालों का कलेजा पिघलेगा.

'ऐसे लगा जैसे आतंकी हमला हो गया हो'

लेकिन, इन इंसानों का कलेजा नहीं पिघला. वे उसकी पिटाई का वीडियो बनाते रहे और दूसरे लोग मारते रहे.

ऐसा मंज़र गांव के लोगों ने पहले कभी नहीं देखा था. बच्चे रोने लगे थे और औरतें बदहवास होकर भागने लगीं. लगा जैसे आतंकी हमला हो गया हो.

नईम को छोड़ने की तमाम मिन्नतें बेकार साबित हो रही थीं. उसकी सांसे तब भी चल रही थीं. वह होश में था.

लेकिन, भीड़ का वहशीपन दिन चढ़ने के साथ-साथ बढ़ता ही जा रहा था. नईम की आंखें रहम की भीख मांग रही थीं.

भीड़ में शामिल कुछ लोग भी उसे छोड़ देने की बात कहने लगे थे. दूसरे लोग मोबाइल से वीडियो बनाते रहे.

जब तक उसकी सांसें चलीं, भीड़ में शामिल लोग नईम को पीटते रहे. कुछ घंटे बाद वह लाश बन चुका था.

हम सदमे में थे. जो आदमी कुछ देर पहले कार से आया था. वह अब कंधों के सहारे जाएगा, यह सोचकर रूह कांप गई

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Image caption भीड़ को नियंत्रित करने आयी पुलिस पार्टी पर भी हमला हुआ

हम लोग बाक़ी बचे लोगों की जिंदगी की दुआ कर रहे थे. लेकिन, दुआओं का असर नहीं हुआ.

बाकी के तीनों लोगों की लाशें भी पास के गांव और पहाड़ी से पुलिस ने बरामद की. हमें बताया गया कि भीड़ को नियंत्रित करने आई पुलिस पार्टी पर भी हमला हुआ था.

उनकी गाड़ी भी जला दी गई थी.

अब हम उजाले में ही घर लौट आते हैं. पहले डर नहीं था. हम लोग फेरी लगाकर देर शाम घर लौटते थे. कोई कुछ नहीं बोलता था.

अब शाम होने से पहले ही घर लौट जाते हैं. डर इसका लगता है कि अब इस एरिया में बाहर निकलने के लिए भरोसा किस पर किया जाए.

भय लगता है कि कहीं हम लोग भी अफ़वाह और भीड़ का शिकार न हो जाएं, मार न दिए जाएं.

(स्थानीय पत्रकार रवि प्रकाश से हुई बातचीत पर आधारित)

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