माल्या-अडानी के लिए पैसा है, किसान के लिए नहीं- पी साईनाथ

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Image caption साईंनाथ का कहना है कि किसानों की आमदनी तेज़ी से कम हो रही है.

किसानों के मुद्दों पर लिखने वाले चर्चित पत्रकार पी साईनाथ ने गूगल हैंगआउट पर किसानों से जुड़ी कई समस्याओं पर रोशनी डाली है.

पी साईनाथ ने कहा कि किसान अपने ही खेतों में मज़दूर की तरह हो गए हैं जो कॉर्पोरेट के फ़ायदे के लिए काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि कृषि की लागत बढ़ रही है और सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से बच रही है.

साईनाथ ने कहा, "कृषि को किसानों के लिए घाटे का सौदा बनाया जा रहा है ताकि किसान खेतीबाड़ी छोड़ दें और फिर कृषि कॉर्पोरेट के लिए बेतहाशा फ़ायदे का सौदा हो जाए."

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साईनाथ ने कहा, "देश में बीज, उर्वरक, कीटनाशक और साथ ही कृषि यंत्रों की कीमत उदारीकरण के बाद तेजी से बढ़ी है. पिछले तीन सालों में कृषि से जुड़ी आय में भारी कमी आई है जबकि लागत तेजी से बढ़ी है."

पिछले दो दशकों से लागत लगातार बढ़ रही है. विदर्भ में 2003 में एक एकड़ असिंचित ज़मीन पर कपास उगाने की लागत लगभग चार हज़ार रुपए थी, जबकि सिंचित ज़मीन पर ये लागत 10-12 हज़ार रुपए थी.

अब अंसिंचित एकड़ में 12-15 हज़ार रुपए जबकि सिंचित एकड़ पर 40 हज़ार रुपए से अधिक लागत आती है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 4-5 लोगों वाले किसान परिवार की एक महीने की आय लगभग छह हज़ार रुपए है.

कृषि संकट सिर्फ़ ग्रामीण भारत का संकट नहीं है, इसका समूचे देश पर व्यापक असर होगा.

मौजूदा किसान आंदोलन

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Image caption महाराष्ट्र में सरकार के क़र्ज़ माफ़ी का ऐलान करने के बाद किसानों ने आंदोलन टाल दिया है.

किसान आंदोलन ऐसे स्थानों से शुरू हुए हैं जहां सामान्यतः पिछले एक-दो दशकों में इनकी शुरुआत नहीं हुई है. आमतौर पर महाराष्ट्र में ऐसे आंदोलन विदर्भ या मराठवाड़ा में होते हैं, लेकिन इस बार इनकी शुरुआत नासिक और पश्चिमी महाराष्ट्र के तुलनात्मक रूप से अमीर ज़िलों से हुई है.

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में, शुरुआती दिनों में मुख्यमंत्रियों ने कहा था कि वो आंदोलनकारियों से बात नहीं करेंगे. फड़वनवीस ने कहा था कि वो सिर्फ़ असली किसानों से बात करेंगे.

मध्य प्रदेश में पुलिस गोलीबारी में 8 किसानों की मौत और कई के घायल होने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने उपवास किया जबकि वो ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कर सकते थे.

मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर सभी अख़बार इस सरकार के कृषि क्षेत्र में किए गए विकास के विज्ञानों से भरे पड़े थे. जिन अख़बारों में ये विज्ञापन थे उन्हीं में पहले पन्ने पर पांच किसानों की गोलीबारी में मौत की ख़बर थी.

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Image caption मध्य प्रदेश में पुलिस गोलीबारी में किसानों की मौत हुई है.

आंदोलन के व्यापक होने पर फड़नवीस किसानों से बात करने के लिए तैयार हो गए और आज उन्होंने किसानों का कर्ज़ माफ़ी करने का फैसला लिया है.

वो स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करवाने के लिए किसानों के दल को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के पास भी जाएंगे.

लेकिन केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर कहा है कि इन सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया जा सकता है.

लेकिन किसान संकट को मंदसौर की गोलीबारी, जंतर-मंतर पर तमिल किसानों के प्रदर्शन या महाराष्ट्र के किसानों के आंदोलन से नहीं समझा जा सकता है.

बल्कि इसे सिर्फ़ किसानों के जीवन, कृषि पर निर्भर लोगों के जीवन और कृषि मज़दूरों के जीवन में झांककर ही समझा जा सकता है. आंकड़े झूठ बोलते हैं.

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कर्ज़ माफ़ी

कर्ज़ माफ़ी किसानों को राहत तो देती है, लेकिन ये उनकी समस्याओं का हल नहीं है.

आप दसियों लाख किसानों को दिए चालीस हज़ार करोड़ क़र्ज़ की चिंता करते हैं जबकि अकेले अडानी को अरबों डॉलर का क़र्ज़ दे देते हैं.

2008 में यूपीए सरकार ने कर्ज़ माफ़ी का ऐलान किया था लेकिन इसके फ़ायदे ज़्यादातर किसानों तक नहीं पहुंच पाए.

ज़्यादातर किसानों ने निजी कर्ज़ लिया है. ऐसे में कर्ज़ माफ़ी का फ़ायदा वो नहीं उठा पाते हैं.

देश में पहली कर्ज़माफ़ी चौधरी देवीलाल के समय 1980 के दशक में की गई थी. उसके बाद यूपीए ने 2008 में किसानों का क़र्ज़ माफ़ किया.

लेकिन यही सरकारें हर साल लाखों-करोड़ का कॉर्पोरेट क़र्ज़ माफ़ करती हैं. 2006-2007 के बजट के बाद से बजट में 'राजस्व माफ़' का भी ब्यौरा होता है. 2015 में सरकार ने 78 हज़ार करोड़ का कॉर्पोरेट टैक्स माफ़ किया.

सरकार के पास विजय माल्या को नौ हज़ार करोड़ देने का पैसा है. यानी सरकार के पास पैसा है, लेकिन सवाल ये है कि वो मिल किसे रहा है.

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पशु संकट

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Image caption पी साईनाथ का कहना है कि पशुओं पर लगे प्रतिबंधों के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है.

साईनाथ ने कहा कि न ही बीती सरकार पशु संकट को लेकर चिंतित थी और न ही मौजूदा सरकार.

उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार में ये संकट और गहरा रहा है. मवेशियों की बिक्री पर प्रतिबंधों के बाद ये संकट और गंभीर हो गया है.

महाराष्ट्र में बीफ़ के लिए पशु वध पर प्रतिबंध का ज़िक्र करते हुए साईंनाथ ने कहा, "इसका उद्देश्य सिर्फ़ मुसलमानों को मांस खाने से रोकना हैं. उन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था से कोई मतलब नहीं है."

उन्होंने कहा, "इससे न सिर्फ़ कसाइयों का व्यवसाय ख़त्म हुआ है, बल्कि ग़रीब लोगों की डाइट पर भी असर हुआ है."

उन्होंने कहा, "पशुओं की क़ीमत गिर गई है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है. यदि ग्रामीण क्षेत्र में पशुओं की क़ीमत गिर रही है या बिक्री कम हो रही है तो इसका सीधा मतलब ये है कि उस क्षेत्र में संकट गहरा रहा है."

"नरेंद्र मोदी और उनके मेक इन इंडिया के पहले से कोल्हापुर चमड़ा उद्योग एक वैश्विक ब्रांड था. अब ये ख़त्म होने के कगार पर है."

भारत में पशुओं की संख्या, ख़ासकर देसी पशुओं की संख्या लगातार गिर रही है. ज़्यादा असर बकरी और सूअर जैसे छोटे जानवरों पर हो रहा है. इनके पालन में भारी गिरावट आई है.

किसान आत्महत्या

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देश भर में किसानों की कुल आत्महत्याओं में से आधी से ज़्यादा छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में होती हैं.

एनसीआरबी के 2015 के डाटा के मुताबिक देश में हुए कुल किसान आत्महत्याओं में से 68 फ़ीसदी इन तीनों प्रदेशों में थी.

इससे ये पता चलता है कि यहां गहरा कृषि संकट है. आत्महत्याएं कृषि संकट की वजह नहीं है बल्कि इसका परीणाम हैं.

पिछले दो सालों में वास्तविकता में किसान आत्महत्याएं बढ़ी हैं लेकिन डाटा कलेक्शन में फ़र्ज़ीवाड़े के कारण ये संख्या कम दिखेगी.

साईनाथ ने ये भी कहा कि महिला किसानों की आत्महत्याओं को आंकड़ों में शामिल ही नहीं किया जा रहा है.

उदाहरण के तौर पर पंजाब में महिला किसानों की हत्या आंकड़ों में शून्य है जबकि तथ्य ये है कि महिला किसान और किसान परिवारों की बेटियां बड़ी तादाद में आत्महत्याएं कर रही हैं लेकिन ये आंकड़ों में शामिल नहीं हो रहा है.

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