गोरखालैंड पर तनाव क्यों, जानें 5 ज़रूरी बातें

  • 13 जून 2017
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पश्चिम बंगाल सरकार के बांग्ला भाषा को स्कूलों में अनिवार्य बनाये जाने से जुड़ी अधिसूचना आने के बाद से दार्जिलिंग में तनाव जारी है.

बीते हफ्ते दार्जिलिंग में स्थित राजभवन में एक कैबिनेट मीटिंग चल रही थी. इसके सामने स्थित गोरखा टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन का ऑफिस है जहां प्रदर्शन हो रहा था.

कैबिनेट मीटिंग के बाद पत्थरबाजी हुई, सरकारी बसें जलाई गईं.

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गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के सदस्यों पर आरोप है कि उन्होंने ही पुलिस पर हमला किया.

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पुलिस को स्थिति को काबू पर पाने के लिए आंसू गैस के प्रयोग से लेकर सेना को भी तैनात करना पड़ा.

अस्थिरता का इतिहास है गोरखालैंड का

इसके बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने बंद का आह्वान किया है. लेकिन इस संघर्ष के केंद्र में ममता बनर्जी और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरुंग के बीच जारी तनाव है.

जानिए, इस पूरे संघर्ष से जुड़े पांच सवालों के जवाब...

1 - गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का सरकार से तनाव क्यों?

पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में एक अधिसूचना जारी की है जिसमें सारे स्कूलों में बांग्ला भाषा पढ़ाना अनिवार्य किया गया है. इसके बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने दार्जिलिंग और कलिम्पोंग जिलों में विरोध प्रदर्शन किए हैं. इस मामले में ममता बनर्जी और विमल गुरुंग के बीच तनाव जारी है.

हालांकि, ममता बनर्जी ये स्पष्टीकरण दे चुकी हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों के लिए ये आदेश अनिवार्य नहीं है बल्कि चुनने की आजादी है. लेकिन गोरखा जनमुक्ति के नेता इसके लिए तैयार नहीं है.

2 - गोरखालैंड के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने काफी समर्थन किया था, अब क्या हुआ?

ये बड़ा पेचीदा मामला है. ममता बनर्जी जब सत्ता में आई थीं तो इसके बाद ही गोरखा लैंड एग्रीमेंट पास हुआ था. इसके बाद भी वह पहाड़ों में जाकर मीटिंग करती रहीं.

उन्होंने ऐसी योजना बनाई है जिसके तहत गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के तहत आनी वाली तमाम जनजातियां जैसे राई, तमाम लेपचा, शेरपा लिए के अलग-अलग विकास बोर्ड बना दिए. इसके बाद राज्य सरकार से आर्थिक मदद सीधे इन बोर्डों को जाने लगी जिससे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का महत्व कम हो गया. इससे विमल गुरुंग और जीटीए को लगा कि इससे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का नियंत्रण खत्म हो जाएगा.

गोरखा लीडरशिप को लग रहा था ममता बनर्जी उनके क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही हैं इससे ये संघर्ष पैदा हुआ.

विमल गुरुंग किस तरह के नेता हैं?

विमल गुरुंग सुभाष घीसिंग के जमाने में युवा नेता हुआ करते थे, उनके पास पहाड़ी क्षेत्र की ट्रांसपोर्ट यूनियन की देखभाल की जिम्मेदारी हुआ करती था.

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लेकिन साल 2005 में सुभाष घीसिंग को दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल के प्रमुख के रूप में 20 साल बिताने के बाद केयर टेकर बनाया गया. इसके बाद से सुभाष घीसिंग और विमल गुरुंग के गुटों के बीच दूरी बढ़ती गई. फिर, साल 2006-07 में विमल गुरुंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नाम से पार्टी लॉन्च कर दी.

पहाड़ी क्षेत्रों में जनप्रिय नेता कैसे बने विमल गुरुंग?

पहाड़ी क्षेत्र में जनप्रिय नेता बनने के पीछे कारण ये है कि उन्होंने अखिल भारतीय म्यूजिक कंपटीशन में कोलकाता पुलिस के एक कांस्टेबल को जिताने के लिए पहाड़ में काफी प्रचार किया. इससे उन्हें काफी फायदा हुआ.

इसके बाद 2007-08 में वह पहाड़ के प्रमुख नेता बनकर स्थापित हुए और सुभाष घीसिंग की जमीन उनके हाथ से निकालते रहे. फिर, उन्होंने गोरखालैंड राज्य की मांग की. और, साल 2011 के जुलाई महीने में जीटीए अग्रीमेंट पास हुआ.

इस विवाद का समाधान क्या है?

ये स्पष्ट है कि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के जनाधार को काफी नुकसान पहुंचा है. बीते महीने हुए नगर निगम चुनाव में टीएमसी के सभासद चुने गए. इससे साफ है विमल गुरुंग ने काफी जनसमर्थन खो दिया है. इसलिए वे काफी डरे हुए हैं. उनकी कोशिश है कि इस प्रदर्शन में वह बुहत आगे जा सकें.

इसीलिए सरकारी दफ्तरों के बंद का ऐलान किया गया है और निजी संस्थान खुले हुए हैं. वे जानना चाह रहे हैं कि उनको कितना समर्थन मिल सकता है. वहीं ममता बनर्जी सीधे टकराव के संकेत दे चुकी हैं.

क्या ये माना जाना चाहिए कि ये टकराव आमने सामने का होगा?

ये इस बात पर निर्भर करेगा कि एक दो दिन में विमल गुरुंग को कितना समर्थन मिलता है.

राज्य सरकार गोरखा टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन और गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के अधीन रहे नगर निगमों में आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों के बाद ऑडिट करा रही है. जीटीए के ऑफिस को भी अगले दो महीने के लिए सील कर दिया गया है. ऐसे में जीटीए का कोई सदस्य ऑडिट को देख भी नहीं सकता है.

ममता बनर्जी के दोस्त कौन हो सकते हैं जिन्होंने इस बार चुनाव भी लड़ा है

सुभाष घीसिंग के समर्थकों के साथ तृणमूल कांग्रेस का समझौता हुआ है. ये लोग विमल गुरुंग के विरोधी रहे है. इनकी मदद से ही ममता बनर्जी पहाड़ी क्षेत्र में पकड़ बनाने की कोशिश कर रही हैं.

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