नज़रिया: इमेज की लड़ाई में कांग्रेस क्या चूकती जा रही है?

संदीप दीक्षित

आर्मी चीफ़ को बिना सोचे समझे 'सड़क का गुंडा' कहने वाले पार्टी प्रवक्ता संदीप दीक्षित पर कांग्रेस ने कोई कार्रवाई नहीं की.

इसके साथ ही सोनिया और राहुल गांधी ने पार्टी में अनुशासन लाने का मौका गंवा दिया. मुमकिन है कि संदीप दीक्षित की माफ़ी के बाद कांग्रेस हाई कमान ने सोचा हो, मामला ख़त्म हो गया.

लेकिन पब्लिक पर्सेप्शन को लेकर चल रही लड़ाई में कांग्रेस ने एक अवसर खो दिया. भले ही ये उम्मीद की जा रही थी कि दीक्षित माफी मांग लेंगे, लेकिन उम्रदराज़ हो रही इस पार्टी को चुनाव तो लड़ना है.

और ऐसे वक्त में जब कांग्रेस लोगों का समर्थन पाने के लिए तरस रही है, इसकी अहमियत समझने से वो चूक गई.

सोनिया और राहुल पीछे मुड़कर जनवरी, 2015 की वो घटना याद कर सकते थे जब वे मोदी की तारीफ़ करने वाले पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी से निपटे थे.

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द्विवेदी प्रसंग

जनार्दन द्विवेदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत को 'भारतीयता' की जीत बताया था. द्विवेदी ने मोदी के सत्ता में आने को नए युग की शुरुआत भी कहा था.

जनार्दन द्विवेदी के शब्द थे, "मोदी और बीजेपी लोगों को समझाने में सफल हो गए कि सामाजिक रूप से वो देश के नागरिकों के ज़्यादा निकट हैं. कुल मिलाकर बिना कहे बोलें तो ये एक तरह से भारतीयता की जीत है."

कांग्रेस ने द्विवेदी को कारण बताओ नोटिस जारी करने में ज़रा भी देरी नहीं की. पार्टी ने जनार्दन द्विवेदी का मामला कांग्रेस की अनुशासन समिति के पास भेज दिया.

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के लिए भाषण लिखने वाले जनार्दन द्विवेदी को पार्टी की मीडिया यूनिट के प्रभारी अजय माकन से भी खरीखोटी सुननी पड़ी थी.

माकन ने कहा था, "जो कुछ भी जनार्दन द्विवेदी ने कहा है, वो भारतीयता को लेकर कांग्रेस के विचारों के पूरी तरह से उलट है. मोदी की जीत किसी तरह से भी भारतीयता की जीत नहीं हो सकती है."

जनार्दन द्विवेदी बैकफु़ट पर आ गए. उन्होंने कांग्रेस की अनुशासन समिति के चीफ़ एके एंटनी से मुलाकात की और अपना रुख़ साफ़ किया, "मैंने कभी नहीं कहा कि मोदी भारतीयता के प्रतीक हैं... किसी को मुझे ये समझाने की ज़रूरत नहीं कि भारतीयता क्या है..."

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कैप्टन के सुर

हालांकि माफ़ी के बाद द्विवेदी इस मामले से बरी हो गए. लेकिन इस प्रकरण ने कांग्रेस नेतृत्व की सर्वोच्चता ज़रूर साबित की और ये भी साफ़ हो गया कि पार्टी के अनुशासन की लक्ष्मणरेखा लांघने की किसी को इजाज़त नहीं दी जा सकती है.

भारतीयता को लेकर छिड़ी सार्वजनिक बहस में कांग्रेस को थोड़ा मीडिया स्पेस भी मिला. संदीप दीक्षित के मामले में इस तरह की बारीकी नहीं है. कांग्रेस एक अति-उदारवादी संगठन की तरह दिख रही है जिसके मन में सेना प्रमुख के लिए बहुत कम सम्मान है.

अगर ऐसा नहीं होता तो एक कश्मीरी नौजवान को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल करने वाले मेजर गोगोई के बचाव में आर्मी चीफ़ के बयान पर कांग्रेस का कुछ और नज़रिया होता.

मानवाधिकार, कश्मीर मुद्दे और सैन्य-नागरिक संबंधों जैसे जटिल और बहुआयामी मुद्दों पर कांग्रेस के रुख़ को लेकर लोगों की बहुत अच्छी राय नहीं है और कुछ टेलीविज़न चैनलों ने इस ओर ध्यान भी दिलाया है.

दूसरे स्तर पर देखें तो घर में बदज़ुबानी करने वालों को लेकर संदीप दीक्षित प्रकरण ने ख़तरे की घंटी बजा दी है. इस ओर ध्यान दिलाना मुनासिब होगा कि मेजर गोगोई के बचाव में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी बयान दिया था.

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गोगोई को सम्मान

कांग्रेस में इस बात लेकर सुगबुगाहट शुरू हुई कि मेजर गोगोई का बचाव करने में कैप्टन शायद थोड़ी दूर चले गए. लेकिन सोनिया गांधी ने पब्लिक मूड को भांप लिया.

इसलिए इसके फ़ौरन बाद जब मेजर गोगोई को सेना ने सम्मानित किया तो पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी मेजर गोगोई की सार्वजनिक तौर पर प्रशंसा की.

उन्होंने कहा, "आप सेना के हाथ बांधकर उन्हें पत्थरबाजों के बीच अकेला नहीं छोड़ सकते." मेजर गोगोई के लिए अवॉर्ड की मांग सबसे पहले करने वालों में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह थे. ये बात भी सुरजेवाला ने देश को याद दिलाई.

कांग्रेस को क़रीब से जानने वाले लोगों का कहना है कि 'राष्ट्रवादियों और राष्ट्रविरोधियों' के बीच सतही फ़र्क खड़ा करने की बीजेपी की कोशिशों को सोनिया समझ रही हैं.

कांग्रेस धारा के खिलाफ तैरने का जोखिम नहीं ले सकती.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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