'कहीं तुम एलजीबीटी तो नहीं हो गए...'

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Image caption मुकेश भारती ने बाबा भीम राव आंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी, लखनऊ से समलैंगिकों पर पीएचडी की है

समाज में आज भी कई मुद्दे हैं जिनको जानना तो सभी चाहते हैं, लेकिन उन पर बात दबी ज़ुबान में करते हैं.

समाज में कई लोग ऐसे होते हैं जिनकी पहचान लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर या समलैंगिक के तौर पर होती है. कई बार इनसे जुड़ी ख़बरें पढ़ने को मिल जाती हैं.

मैंने आगे की पढ़ाई के लिए समाज के इस तबके पर पीचएडी करने की सोची. हालांकि मुझे अंदाजा नहीं था कि मेरे इस ख़्याल की राह में कितनी दुश्वारियां हैं.

एलएलएम की पढ़ाई के बाद मैंने लैंगिक समानता पर अपने रिसर्च के लिए यूनिवर्सिटी से अनुमति मांगी.

एलजीबीटी कम्यूनिटी पर रिसर्च की शुरुआत से ही कुछ न कुछ ऐसा होता चला गया जिसकी कोई उम्मीद भी नहीं थी.

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'एलजीबीटी लोगों के साथ 'सेक्स' किया है?'

एलजीबीटी यानी लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर लोगों तक विभिन्न मुद्दों को पहुँचाना, उनसे बात करना तो दूर मेरे अपने आसपास के लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया कि 'भला ये भी कोई रिसर्च टॉपिक है. ये तो पागलपन है, दूसरी तरफ़ कॉलेज में दोस्त मिलते तो पूछते, ''और एलजीबीटी क्या हाल है?''

कहीं पर जाते हुए खाते-पीते हुए 'गे' अक्षर पर ज़्यादा ज़ोर देना, जैसे 'वहां चलोगे... गे-गे-गे... क्या खाओगे... गे-गे-गे... क्या पीओगे... गे-गे... अरे कुछ बोलोगे... गे-गे... कहीं तुम एलजीबीटी तो नहीं हो गए...'

इतना ही नहीं लोग यहाँ तक कहने लगे कि कभी तुमने सचमुच में एलजीबीटी लोगों के साथ 'सेक्स' किया है.

आम लोगों के विचार इस तरह से हो सकते हैं, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल रहा. यहां तक कि घर के लोगों का भी ये कहना था कि ये लोग समाज की गंदगी हैं.

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'किसी को बताना मत'

कोई कहता कि ये लोग सेक्स के लिए ही जीते हैं और इसके लिए लाइसेंस लेना चाहते हैं, ऐसे लोगों को कभी समान अधिकार नहीं मिलने चाहिए.

घर के लोगों की चिंता रही कि किसी को बताना मत नहीं तो नौकरी नहीं मिलेगी.

एलजीबीटी के साथ-साथ तुम भी गंदा काम कर रहे हो. हद तो तब हुई जब रिसर्च पेपर टाइप कराने की बात आई तो इसके लिए कोई तैयार ही नहीं हो रहा था.

इस दौरान एक महत्वपूर्ण घटना घटी जब मैंने कहा कि अपना पेपर महिलाओं के कपड़े पहन कर पेश करना चाहता हूँ.

इस बात पर सभी आश्चर्य चकित हो गए और मज़ाक बना सो अलग. दूसरी तरफ, पीएचडी के दौरान समलैगिंक लोगों से मिलना, उनको जानना चलता रहा.

समलैगिंक लोगों का पूरा सहयोग रहा. उन्होंने अपनी कई निजी बातें मुझसे शेयर कीं और मैंने अपने रिसर्च में उनकी प्राइवेसी का पूरा ख़्याल रखा.

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क़ानून

रिसर्च के दौरान मुझे लगा कि समलैंगिक लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस और क़ानून में इस तबके के लिए ज़रा भी संवेदनशीलता नहीं है.

पुलिस और कानून उनके हक़ की सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं कर पा रही है.

जब कोई समलैंगिक अपने हक़ की बात करता है और इस तरह का साहस दिखाता है तो उन्हीं को अपराधी मान कर प्रताड़ित किया जाता है.

जब समलैंगिक अपने अधिकारों की मांग रखते हैं तो कहा जाता है कि तुम सब लोग समाज की गंदगी हो और उन्हें सेक्स वर्कर का टैग दे दिया जाता है.

जबकि मेरा अनुभव कहता है कि एलजीबीटी कम्युनिटी के बहुत से लोग एक दूसरे के साथ दोस्ती वाला बर्ताव चाहते हैं.

(इंदु पांडेय से बातचीत पर आधारित)

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