राष्ट्रपति तो वही बनेगा जिसे मोदी सरकार चाहेगी: विनोद शर्मा

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देश में राष्ट्रपति चुनावों के मद्देनजर बुधवार को विपक्षी पार्टियों की एक अहम बैठक है.

आज के दिन साफ़ है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के पास ज़्यादा वोट हैं, लेकिन बहुमत उनसे दूर है. लगभग बीस हज़ार वोट उनके पास कम है जिस पर खेल का दारोमदार है.

विपक्ष एकजुटता का प्रदर्शन कर रहा है और उनकी कोशिश होगी शिवसेना का समर्थन लेने की. शिवसेना ने बीते तीन चुनाव में बीजेपी का साथ नहीं दिया.

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उन्होंने एपीजे अब्दुल कलाम के चुनाव में साथ नहीं दिया. प्रतिभा पाटिल के चुनाव में उन्होंवे बीजेपी के उम्मीदवार की बजाय प्रतिभा पाटिल को वोट डाला. प्रणव मुखर्जी के चुनाव के वक्त भी उन्होंने उनके पक्ष में वोट डाला.

लगभग 20-25 हज़ार वोट तो शिवसेना के पास ही हैं और अगर वो अपना पुराना रवैया अपनाए रखे तो विपक्ष को फ़ायदा हो सकता है.

मेरा आकलन है कि केंद्र में मौजूदा सरकार का पलड़ा भारी होता है.

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विपक्ष की कोशिश है कि तमिलनाडु में भी कुछ वोट उनके पक्ष में पड़ जाएं.

राष्ट्रपति चुनाव में मतदान सीक्रेट होता है और मतदाता अपनी समझ के अनुसार वोट कर सकता है. वोटिंग इस बात पर निर्भर कर सकती है कि जो व्यक्ति खड़ा है उसकी छवि कितनी साफ़ है और वो कितना मज़बूत है.

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कौन हैं प्रबल दावेदार?

भारतीय मीडिया में राष्ट्रपति पद के लिए कुछ नामों की अटकलें पहले ही लगाई जा रही हैं.

प्रबल दावेदार कौन हैं ये कहना अभी मुश्किल है, कुछ गोपाल गांधी का नाम लेते हैं. कुछ विद्यासागर (महाराष्ट्र के गवर्नर), सुमित्रा महाजन, आदिवासी और दलित नेता द्रोपदी मुर्मू का नाम भी है. मौजूदा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का नाम भी इसमें शामिल है.

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उचित यही होगा कि सरकार एक राय बनाने की चेष्टा करे. राष्ट्रपति किसी दल का नहीं होता वो देश के संविधान का रखवाला होता है, वो आर्मी का भी कमांडर इन चीफ़ होता है.

राष्ट्रपति के बिना संसद पूरी नहीं होती. आख़िर दो सदन और एक राष्ट्रपति मिल कर ही तो संसद पूरी होती है.

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लेकिन इतिहास गवाह है कि राष्ट्रपति पर एक राय कभी नहीं बनी और कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि हमारा कोई राष्ट्रपति बिना मुकाबले के चुना गया हो. राजेंद्र बाबू से ले कर आज तक कोई ना कोई इसमें मुकाबला देने के लिए सामने आया है.

हालांकि कभी-कभी सीधा मुकाबला दो उम्मीदवारों के बीच रहा है जैसे कि प्रणव मुखर्जी के समय में, प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, एपीजे अब्दुल कलाम, के आर नारायणन के टाइम में हुआ था.

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लेकिन ये शंकर दयाल शर्मा के चुनाव के बाद ही ये संभव हुआ था. उससे पहले हमेशा दो से अधिक उम्मीदवारों के बीच मुकाबला रहा है.

जब वीवी गिरि जीते थे उस वक्त 15 उम्मीदवार मैदान में थे. जब नीलम संजीवा रेड्डी जीत पाए तो 37 उम्मीदवार मैदान में थे.

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सहमति बने तो अद्भुत होगा

ये एक तरह से लोकतंत्र का जलवा भी है और इस बात का भी प्रतीक है कि राष्ट्रपति चुनने में भी एक राय बनाने में दिक्कत हो जाती है.

हाल में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संकेत दिया था कि इस चुनाव में आम सहमति बननी चाहिए और इसमें सत्तारूढ़ दल भी शामिल होने चाहिए.

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सर्वसम्मति हो जाए तो अद्भुत है क्योंकि ऐसे में उस ऑफिस में आस्था बनी रहती है. मगर कभी ऐसा राष्ट्रपति बन जाता है जो सबको पसंद नहीं होता.

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इमरजेंसी के दौरान फख़रुद्दीन अली अहमद के बारे में एक कार्टून जो अबू इब्राहिम ने बनाया वो मुझे याद है जिसमें वो बाथटब में बैठे ऑर्डिनेंस पर हस्ताक्षर कर रहे हैं.

ऐसी छवि राष्ट्रपति की नहीं होनी चाहिए. हमें देश में कॉन्स्टीट्यूशनल राष्ट्रपति चाहिए जो हमारे संविधान का नेतृत्व करे, उसकी रक्षा करे.

बीजेपी के लिए कितना बड़ा दांव?

अगर प्रतिस्पर्धा हुई तो बीजेपी के लिए जीत आसान है, उनके पास खुद में उतनी क्षमता है कि वो अपने उम्मीदवार को जितवा सकें. बीजेपी को अपने वोट जोड़ने नहीं हैं, वो तो जुड़े जुड़ाए हैं, वोट तो विपक्ष को जोड़ने हैं.

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कभी-कभी विपक्ष में जोड़ने की प्रक्रिया कठिन हो जाती है. हालांकि ऐसा लगता है कि विपक्ष ज़रूरी वोट जोड़ सकता है क्योंकि केंद्र सरकार की स्थिति राज्यों में ठीक नहीं है.

मुझे कहें कि किस घोड़े पर दांव लगाएंगे तो मेरा मानना है कि वो घोड़ा जीतेगा जिसके पीछे केंद्र सरकार होगी.

(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश के साथ बातचीत पर आधारित.)

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