ग्राउंड रिपोर्ट: भारत की गाय, बांग्लादेश जाए?

  • 15 जून 2017
धुबरी बॉर्डर
Image caption भारत-बांग्लादेश बॉर्डर आउट-पोस्ट

सुबह के आठ बजे हैं और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) के एक दर्जन, थके से जवान, रात के 'शिकार' के बाद थोड़ी राहत में हैं.

पिछली रात बीएसएफ़ दस्ते ने दोनों देशों को बांटती विशालकाय ब्रह्मपुत्र नदी से तस्करी किए जा रहे 140 मवेशी पकड़े हैं.

असम राज्य के धुबरी ज़िले की ये आखिरी भारत-बांग्लादेश बॉर्डर आउट-पोस्ट है जो मीलों तक नदी से घिरी हुई है.

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ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे एक किसान की इस बात से गाय की तस्करी के स्तर का अंदाजा लगता है.

कुछ गांव वाले पकड़े गए मवेशियों को चारा देने के लिए बुलाए गए हैं और पहली नज़र में ही साफ़ हो जाता है कि इस कद-काठी वाले मवेशी असम में ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलते.

निगरानी करने वाले गार्ड बताते हैं कि इन दिनों तस्करों ने ज़मीन से कम और नदी में तैराकर तस्करी करने पर ज़्यादा ध्यान दिया हुआ है.

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Image caption भारत-बांग्लादेश बॉर्डर आउट-पोस्ट

कस्टम विभाग

इन 140 मवेशियों (जिनमें 80% बैल और 20% गाय हैं) को तभी छोड़ा जाएगा जब धुबरी में कस्टम विभाग इन्हें नीलाम कर इनकी ख़रीद की पर्ची बांटेगा.

बहरहाल, मवेशी ज़ब्त करने वाले जवानों को दिलासा इस बात का भी है कि इन्होंने 6 जून को इसी इलाक़े में हुई एक वारदात का 'बदला भी ले डाला है.'

दरअसल सीमा पर कुछ तस्करों ने रोके जाने पर एक बीएसएफ़ जवान, राजबली राम, पर ही धारदार हथियार से हमला कर दिया था और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था.

ख़बर को न तो स्थानीय मीडिया ने छापा, न ही किसी को राजबली राम की तस्वीर मिल सकी.

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Image caption राजबली राम, बीएसएफ़ जवान

ब्रह्मपुत्र नदी

अब घड़ी में साढ़े दस बज चुके हैं और एक बड़ी नाव में तीन व्यक्ति कस्टम विभाग से मवेशी की नीलामी वाली पर्ची लेकर इस बॉर्डर आउट-पोस्ट पर पहुंच चुके हैं.

पोस्ट के कमांडर ने इनके कागज़ कुछ डपटते हुए देखे, "ले के जाओ. लेकिन फिर ये मवेशी स्मगलिंग किए जाते हुए मिल गए तो ख़ैर नहीं तुम्हारी."

भारत और बांग्लादेश बॉर्डर 4,000 किलोमीटर से भी लंबा है जो दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी सीमा है.

अकेले असम में ये सीमा 250 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी है और जटिल भी क्योंकि अधिकांश ब्रह्मपुत्र नदी के पानी से बँटी हुई है.

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Image caption 15 किलोमीटर दूर ले जाने के लिए मज़दूर 50 रुपये प्रति गाय कमाते हैं

गाय की तस्करी

अनुमान है कि इस सीमा से हर साल क़रीब 10 लाख मवेशियों की तस्करी बांग्लादेश में होती रही है.

2014 में केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार सत्ता में आई थी और उसने गाय की तस्करी बंद करने का वादा किया था.

2015 में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बॉर्डर दौरे के क्रम में कहा था, "सभी राज्यों को तस्करी रोकने के लिए क़दम उठाने होंगे. हम इन मवेशियों को बांग्लादेश नहीं जाने देंगे."

इस बीच 2016 में असम में विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 15 साल से सत्ता में रही कांग्रेस को शिकस्त दी.

अब केंद्र में भी सरकार भाजपा की है और प्रदेश में भी. तो फिर मवेशियों की तस्करी पर लेटेस्ट क्या है?

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धुबरी बोर्डर

असम के बॉर्डर, धुबरी ज़िले, पहुँचने पर राज्य के वरिष्ठ भाजपा नेता और असम फाइनैंशियल कॉरपोरेशन के प्रमुख विजय कुमार गुप्ता का बयान खोखला लगने लगता है.

5 जून को विजय कुमार गुप्ता ने बताया था, "आप जाकर बीएसएफ़ से पूछें, धुबरी बॉर्डर पर रहने वालों से पूछें, सब बताएँगे कि मवेशियों की तस्करी बंद हो चुकी है. हमने इसको पूरी तरह बंद कर लिया है."

इसके अगले दिन बीएसएफ़ जवान पर मवेशियों के तस्कर हमला करते हैं और उसके अगले दिन बीबीसी टीम को बॉर्डर पर पकड़े गए मवेशी मिलते है.

असम के मुख्य शहर गुवाहाटी से धुबरी बॉर्डर पहुंचने में हमें क़रीब सात घंटे लगे.

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Image caption विजय कुमार गुप्ता, वरिष्ठ भाजपा नेता, असम

सीमावर्ती इलाके

जैसे-जैसे कस्बे पार होते गए खेत-खलिहानों में चरने वाले मवेशियों की तादाद भी बढ़ती चली गई.

सड़क किनारे अक्सर कई लोग गायों को सीमावर्ती इलाक़ों की तरफ़ ले जाते दिखे.

हम चापर शहर के बाहर गाय के चार बछड़ों को ले जाने वाले एक शख्स के साथ चले और पूछा गाय कितने में ख़रीदी.

जवाब मिला, "15,000 रुपये में."

मैंने पूछा तुम्हारी है तो उसके पास जवाब नहीं था देने को.

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Image caption मवेशी नाव से या तैराकर ब्रह्मपुत्र पार भेजे जाते हैं

तीन गुनी कीमत

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ असम के पशु-मेलों में बिकने वाली इस तरह की गाएं बांग्लादेश पहुँच कर तीन गुना यानी 45,000 रुपये तक में बिकती है.

चापर से क़रीब 40 किलोमीटर दक्षिण में एक पशु मेले से 16 गायों का झुंड लेकर चार व्यक्ति सड़क पार कर रहे थे.

पूछने पर पता चला कि गाय ख़रीदने वाला पैसे देकर निकल चुका है, इन्हें बस 50 रुपये प्रति गाय की कीमत से इन मवेशियों को 15 किलोमीटर दूर एक स्थान पर छोड़ कर आना है.

सीमा पर रहने वाले गांवों में एक दिन बिताने पर हमें दर्जनों ऐसे लोग मिले जिनका दावा है कि तस्करी जारी है.

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Image caption अयूब अली, मोतिरचर

तस्करी में कमी

मोतिरचर इलाक़े के बाद ही शुरू होती है बांग्लादेश की सीमा और यहाँ हमारी मुलाक़ात 32 वर्षीय अयूब अली से हुई जो पेशे से इलेक्ट्रिशियन हैं.

उन्होंने कहा, "गोरु ( गाय) की स्मगलिंग हो रही है यहाँ. मैंने खुद देखा हैं. पहले से तो थोड़ा फ़र्क पड़ा है लेकिन अब भी बिहार, यूपी, पंजाब, हरियाणा से गोरु यहाँ पहुँचता है और एक से दो दिन में बॉर्डर के पार पहुँच जाता है. हम लोग रोज़ ही देखते हैं लोग गोरु लेकर बॉर्डर की तरफ़ जा रहे हैं. लेकिन उनको रोकने की हिमाकत कौन करे. ख़तरा भी है. वो लोग किसी को भी गाड़ सकते है."

नाम न लिए जाने की शर्त पर बॉर्डर पर निगरानी करने वाले बीएसएफ़ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि, "तस्करी में कमी निश्चित आई है लेकिन हम भी ये नहीं कह सकते कि पूरी तरह बंद हो गई है."

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Image caption पूरे इलाके में बीएसएफ की 14 कंपनियां तैनात हैं.

बुलेटप्रूफ जॉकेट

एक वरिष्ठ अफसर ने बताया, "50% बॉर्डर नदी में पड़ता है. पूरे इलाके में बीएसएफ की 14 कंपनियां तैनात हैं. हर कंपनी के 75 जवान चौबीसों घंटे निगरानी करते हैं. लेकिन ये काफी नहीं है. रात को पेट्रोलिंग बहुत कठिन होती है, नदी में कुछ दिखाई नहीं पड़ता. तस्कर हमला भी कर देते है और मेरी पूरी कंपनी में एक भी बुलेटप्रूफ़ जैकेट तक नहीं है. कहाँ से रुकेगी तस्करी."

लेकिन बीएसएफ पर भी तो आरोप लगते रहे हैं तस्करी को अनदेखा करने के, मैंने पूछा.

जवाब मिलता है, "एक-आधा मामले हो जाते हैं. लेकिन हक़ीक़त यही है कि हमारे जवान बेचारे विपरीत परिस्थितियों में काम करते हैं, घर-परिवार से दूर और जान देने को तैयार भी रहते हैं. लेकिन हमें स्थानीय प्रशासन से सहयोग कम मिलता है."

दरअसल सीमा सुरक्षा बलों का दावा रहा है कि बॉर्डर पर तस्करी करते हुए पकडे गए मवेशी दोबारा तस्करी का सामान बन जाते हैं.

इनका सवाल ये भी रहा है कि आख़िर स्थानीय प्रशासन असम में दूसरे राज्यों से आने वाले मवेशियों की रोकथाम क्यों नहीं करता.

Image caption मुकेश सहाय, डीजीपी, असम पुलिस

'सेकंड लाइन ऑफ़ डिफ़ेंस'

हालांकि असम राज्य पुलिस के डीजीपी मुकेश सहाय कहते हैं कि चीज़ें पहले से बेहतर हुई है और पुलिस 'सेकंड लाइन ऑफ़ डिफ़ेंस' का अपना काम मुस्तैदी से कर रही है."

उन्होंने बताया, "राज्य की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर मवेशियों की तस्करी रोकने के लिए हमने टास्क-फ़ोर्स बनाई है, काफ़ी तस्कर पकड़े गए हैं. ये समस्या ख़त्म तो नहीं हुई है लेकिन इसमें कमी आई है. क्योंकि बॉर्डर का इलाक़ा नदी वाला है और विशालकाय है इसलिए ये पूरी तरह ख़त्म तो नहीं हुई है."

धुबरी बॉर्डर जाकर पड़ताल करने पर असम के वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी की बात ज़्यादा समझ में आती है.

Image caption मोहम्मद अशरफ़ुल हक़, धुबरी बॉर्डर

मोहम्मद अशरफ़ुल हक़ पेशे से किसान हैं और ब्रह्मपुत्र किनारे खेती कर के परिवार का गुज़ारा करते हैं.

उन्होंने बताया, "पानी से और ज़मीन से, हर तरफ़ से गाय बांग्लादेश जा रही है. सुबह मैंने आठ गाय सीमा की तरफ ले जाए जाती देखी थी. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इतने बड़े प्रदेश से होकर ये मवेशी धुबरी पहुँचते कैसे हैं? सरकार क्यों नहीं रोक रही इन्हें? आप खुद ही फ़र्क देख लीजिए असम की गायों में और तस्करी करते पकड़ी जाने वाली किसी भी गाय में. ज़्यादातर दूसरे राज्यों की ही हैं."

हाल ही में संसद में उठे सवालों पर और खुद बॉर्डर जाकर पड़ताल करने पर ये कहने में कोई हिचक नहीं कि तस्करी धड़ल्ले से जारी है.

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