पिता ने डाला तेज़ाब, फ़ाइलों में उलझा इलाज

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'मेरा नाम खुशबू है. मेरे पापा ने मेरे ऊपर तेज़ाब डाल दिया.'

'मुझे आंख से नहीं दिखता. मेरी आंख से रोशनी चली गई है. न मेरा हाथ सीधा होता.'

'हम मंत्री के पास गए. वहां भी हमें कुछ नहीं मिला. हम बहुत गरीब हैं. हमारा कोई नहीं है. मैं ये चाहती हूं कि मेरा चेहरा सही हो जाए. मेरा हाथ सही हो जाए.'

सुबकती और सिसकती ख़ुशबू जब आपबीती बयान करती हैं तो लगता है कि उनका दर्द आंखों से छलक रहा है.

वो कभी तेज़ाब से चेहरे पर बने घाव को छुपाने की कोशिश करती तो कभी अपनी किस्मत को कोसने लगती हैं.

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पिता ने दिए घाव

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उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले के आज़मपुर गांव में रहने वाली 27 बरस की खुशबू को ये घाव उनके पिता माणिकचंद से मिले हैं.

दलित समुदाय की खुशबू का आरोप है कि माणिकचंद ने अपनी दूसरी नाबालिग बेटी की शादी दूसरी जाति के एक युवक से करा दी.

खुशबू का दावा है कि उन्होंने इस मामले की पुलिस में शिकायत दी, तो नाराज़गी में पिता माणिकचंद ने उन पर तेज़ाब डाल दिया.

खुशबू के चेहरे का एक हिस्सा और एक हाथ बुरी तरह जल गया. उनके पति विनोद कुमार और तीन बरस की बेटी त्रिषा के जिस्म पर भी घाव बन गए हैं.

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अनुदान के लिए मंज़ूरी मिली लेकिन...

बीती 30 अप्रैल और एक मई की दरमियानी रात हुई इस घटना के बाद पुलिस ने माणिकचंद को तो गिरफ्तार कर लिया लेकिन देढ़ महीने से ज़्यादा वक्त बीतने के बाद भी खुशबू सही इलाज के लिए भटक रही हैं.

Image caption खुशबू के पति, विनोद कुमार

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से एसिड हमलों की पीड़ित महिलाओं को अनुदान दिया जाता है और उनके इलाज की भी व्यवस्था की जाती है लेकिन खुशबू के केस में मदद अभी फ़ाइलों के अंबार में ही उलझी हुई है.

न उन्हें इलाज का खर्च मिल रहा है और न ही अनुदान और मजदूरी करने वाले खुशबू के पति जैसे-तैसे इलाज की खानापूर्ति कर रहे हैं.

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योगी के 'दरबार' में भी लगाई गुहार

ऐसे मामलों को देखने वाले मथुरा के प्रोबेशन अधिकारी ओम प्रकाश यादव बताते हैं कि जिलाधिकारी की अगुवाई वाली कमेटी तीन लाख रुपये अनुदान को मंजूरी दे चुकी है.

वो कहते हैं, 'रिपोर्ट संभवत: लखनऊ भी भेजी जा चुकी है. अब आगे काम लखनऊ से होना है.'

अनुदान की स्वीकृति में देढ़ महीने का वक्त लगने के सवाल पर वो कहते हैं, "क़ायदे में तो इनको एक महीने के अंदर पैसा मिल जाना चाहिए. लेकिन ये फ़ाइलों के चक्कर में थोड़ी देर हो जाती है. सरकारी काम में विलंब तो होता है, लेकिन हम लोग जितना जल्दी हो सकता है तत्काल करते हैं."

बस मिला तो आश्वासन

खुशबू को अनुदान मिलने में देरी तब हो रही है जबकि वो और उनके पति विनोद कुमार बीती 16 मई को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के लखनऊ में लगने वाले 'जनता दर्शन' में गुहार लगा चुके हैं.

जनता दर्शन के दौरान उनके प्रार्थनापत्र पर स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री अनिल राजभर ने मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को कार्रवाई करने के लिए निर्देशित किया था.

इस पत्र के साथ खुशबू और विनोद कुमार ने 17 मई को मथुरा के दौरे पर आए प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा और डीजीपी सुलखान सिंह से मुलाक़ात की और उनसे भी इन्हें मदद का आश्वासन भर मिला.

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इस दौरान पीटीआई के स्थानीय संवाददाता विजय आर्य विद्यार्थी ने खुशबू की स्थिति देखते हुए अपने स्तर पर उनकी मदद की कोशिश शुरू की.

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विद्यार्थी बताते हैं, "जब मैंने इस महिला को देखा तो इसकी स्थिति बहुत खराब थी. इसकी आंख पूरी तरह बंद थी. चेहरा पूरी तरह जला हुआ था. एक चीज़ मेरे दिमाग में सीधे-सीधे कौंधी. ऐसे मामलों में उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष इस राज्य में स्थापित किया गया है. जिससे एसिड अटैक वाले जितने मामले होंगे उनको मदद मिलेगी. मैंने तुरंत जानने की कोशिश की कि इसे इस व्यवस्था के तहत कोई मदद मिल रही है या नहीं मिल रही है. "

फाइलों में उलझा इलाज

नियम के मुताबिक़ मदद के लिए प्राथमिकी की कॉपी पोर्टल पर अपलोड होना ज़रूरी है. विद्यार्थी के मुताबिक घटना के 17 दिन के बाद भी एफ़आईआर की कॉपी अपलोड नहीं हुई थी.

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अनुदान मिलने की प्रक्रिया के बारे में जिला प्रोबेशन अधिकारी यादव कहते हैं, "प्रक्रिया ये है कि एफआईआर के बाद एक मेडिको लीगल रिपोर्ट होती है. जब दोनों रिपोर्ट पोर्टल पर लोड हो जाती हैं उसके बाद ये हमारे यानी जिला प्रोबेशन अधिकारी पोर्टल पर आएगा इसके बाद रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष की जिला संचालन समिति के सामने महीने भर में इकट्ठे होने वाले सभी दावे रखे जाते हैं. जिन दावों पर स्वीकृति हो जाती है, उनका कंप्यूटर के जरिए आदेश तैयार होता है. उस आदेश पर जिला प्रोबेशन अधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी के दस्तख़्त होते हैं. इसके बाद उसे लखनऊ भेजा जाता है. "

वो कहते हैं कि प्रशासन की ओर से बीते 15 दिन से फ़ाइल लखनऊ भेजने का दावा किया जा रहा है.

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इस बीच खुशबू और उनके पति विनोद कुमार इलाज के लिए मथुरा के जिला अस्पताल और आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज के बीच चक्कर लगाते रहे हैं.

विनोद कुमार कहते हैं, "हम दो बार एसएन मेडिकल कॉलेज गए. हमारा कोई इलाज़ सही तरीक़े से नहीं हुआ. 45 दिन से हम मारे-मारे डोल (घूम) रहे हैं. न मैं कोई काम करा पा रहा हूं. न अपनी पत्नी का ढंग से इलाज करा पा रहा हूं."

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अब और किससे करें पैरवी?

इस पर जिला प्रोबेशन अधिकारी यादव का तर्क है कि जब तक अस्पताल से इलाज के अनुमानित खर्च के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी तब तक इलाज का ख़र्च नहीं मिल सकता है.

वो कहते हैं, "अगर प्लास्टिक सर्जरी होनी है या क्या इलाज़ होना है, उस आधार पर पैसा उस मेडिकल यूनिट को मिलेगा जहां ये इलाज कराएंगे. इनको एस्टीमेट लाना होगा. इन्हें थोड़ी पैरवी तो करनी ही होगी."

करीब डेढ महीने से दर ब दर भटक रहे खुशबू और विनोद कुमार का सवाल है कि वो समझ नहीं पा रहे हैं कि जब सब दरवाज़े खटखटा चुके हैं तो अब पैरवी कहां और किससे करें?

इस सवाल पर पत्रकार विद्यार्थी कहते हैं कि सरकार की योजनाओं में तो बड़ी बातें की गई हैं लेकिन जब काम करने का मौका आता है तब कोई ऐसी एजेंसी नहीं मिलती जो अपने आप पीड़ितों की देखभाल करे.

जब तक ऐसा नहीं होता, खुशबू को भटकना ही होगा.

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