ग्राउंड रिपोर्ट: 'हाम्रौ मांग गोरखालैंड'

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यह साल 2017 का जून महीना है. कंचनजंघा की चोटियों पर सूरज रोज वैसे ही निकल रहा है लेकिन उसे कैमरे मे कैद करने वाले लोग नदारद हैं.

पूरा उत्तर भारत तपती गर्मी से परेशान है. इधर, दार्जिलिंग लोग स्वेटर-जैकेट पहन रहे हैं. इस मौसम में पूरे देश के सैलानी यहां सुकून तलाशने आते हैं. उत्तरबंगाल के इस पहाड़ी इलाके की अर्थव्यवस्था का यही मुख्य आधार है.

इसके बावजूद यहां के लोग अपनी-अपनी दुकानें बंद करके बैठे हैं.

वे सड़कों पर हैं. आंदोलन कर रहे हैं और 'वी वांट गोरखालैंड' के नारे लगा रहे हैं.

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इस दौरान हुई हिसा में कुछ लोगों की जानें गयी हैं. कई लोग घायल हुए हैं. पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है.

फिर भी लोग नहीं मान रहे. उऩका आंदोलन रोज तेज़ होता जा रहा है. उन्हें मजदूरी नहीं मिल पा रही. पैसे नहीं आ रहे. फिर भी उन्हें कोई चिंता नहीं. वे खुश हैं.

क्या इन्हें डर नहीं लगता

मशहूर स्तंभकार और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के सलाहकार स्वराज थापा कहते हैं कि यह अस्मिता की लड़ाई है. वजूद बचाने का संघर्ष है. लिहाजा, लोग पेट की चिंता किए बगैर आंदोलन को धार दे रहे हैं.

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स्वराज थापा ने बीबीसी से कहा, "यह किसी एक पार्टी या नेता की लड़ाई नहीं है. यह दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कर्सियांग इलाके में पहाड़ पर रहने वाले लाखों लोगों की लड़ाई है. हम अपने वजूद की रक्षा के लिए गोरखालैंड चाहते हैं."

वो कहते हैं, "हमारी यह मांग 100 साल से भी अधिक पुरानी है. लेकिन, इस बार पहाड़ के लोग अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं. यह लड़ाई बिना गोरखालैंड लिए खत्म नहीं होने वाली."

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चौक बाजार में नारे

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'वी वांट गोरखालैंड. गोरखालैंड-गोरखालैंड. गोरखालैंड चाहिन छ. चाहिन छ-चाहिन छ. हाम्रौ मांग गोरखालैंड.'

नेपाली और अंग्रेजी में लगाए जा रहे इन नारों का मतलब है कि हमें गोरखालैंड चाहिए. हम गोरखालैंड चाहते हैं. हमारी मांग गोरखालैंड है.

चौक बाजार में ये नारे लगा रहे लोगों में से एक एस के दरनाल बीबीसी से कहते हैं, "यह लड़ाई लेप्चा, भूटिया या गोरखा की नहीं है. लड़ाई पूरे पहाड़ की है. हमारे अधिकार की है. इस पर बंगाल की सरकार ने कब्ज़ा जमा लिया है."

वो कहते हैं, "हम सरहदों की रक्षा करते हैं. और सरकार यहां पुलिस भेजकर गुंडागर्दी करा रही है. इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते. आप हमें गोरखालैंड दिलाने मे मदद कीजिए."

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क्या है इस संकट की वजह

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दरअसल, मौजूदा संकट की मूल वजह पश्चिम बंगाल सरकार की वह घोषणा है, जिसके तहत नौवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए बांग्ला भाषा की पढ़ाई अनिवार्य की जा रही है.

इससे नाराज़ लोगों ने बीती 8 जून को यहां कैबिनेट की मीटिंग करने आईं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को काले झंडे दिखाए थे.

विरोध कर रहे लोगों ने राजभवन में घुसने की कोशिश की. इन्हें रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसूगैस के गोले छोड़े. इसमे कई लोगों को चोटें आयीं.

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बंद की अपील

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इसके बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने 12 जून से पहाड़ पर अनिश्चितकालीन बंद की घोषणा की.

लोगों से अपील की गई कि वे सरकारी दफ्तरों मे नहीं जाएं और इन्हें बंद कराकर सरकार का विरोध करें.

तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कर्यालयों से अनुपस्थित रहनेवालों का वेतन काटने का आदेश जारी कर दिया.

तब तक परिस्थितयां ज्यादा नहीं बिगड़ी थीं. लेकिन, 15 जून को जीजेएम प्रमुख विमल गुरुंग के दफ्तर पर पुलिस के छापे के बाद हालात बेकाबू हो गए.

जीजेएम ने 15 जून से संपूर्ण बंदी की घोषणा कर दी. इसका व्यापक असर पड़ा है.

आगे क्या होगा

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गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के महासचिव रोशन गिरी ने बीबीसी को बताया कि वो केंद्र सरकार से बातचीत करना चाहते हैं.

वो कहते हैं, "मैंने गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मुलाक़ात कर इसकी अपील भी की है. अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह कब बातचीत करती है."

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