इसलिए आसान नहीं है बीजेपी का राष्ट्रपति बनना...

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राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने रविवार को मुंबई में शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाक़ात की है.

राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर शिव सेना और बीजेपी में सहमति नहीं है. पिछले राष्ट्रपति चुनाव में भी ऐसा ही हुआ था. शिव सेना ने कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया था.

अगर इस चुनाव में भी शिव सेना ने यही रुख़ अपनाया तो बीजेपी के लिए अपना राष्ट्रपति बनाने का सपना साकार करना काफ़ी कठिन हो जाएगा.

अमित शाह ने फिलहाल उद्धव ठाकरे के सामने राष्ट्रपति के उम्मीदवार को लेकर अपना कोई प्रस्ताव नहीं रखा है क्योंकि अभी बीजेपी के भीतर ही इस पर आख़िरी फ़ैसला नहीं हुआ है.

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ये कहा जा रहा है कि उद्धव ठाकरे ने बीजेपी के सामने अपनी पसंद के दो नाम रखे हैं. पहला आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत और दूसरा एमएस स्वामीनाथन हैं.

हालांकि मोहन भागवत के नाम पर अमित शाह ने साफ़ कर दिया है कि वह सरसंघचालक हैं और सरसंघचालक कभी चुनाव नहीं लड़ते. ऐसे में मोहन भागवत के नाम पर कोई संभावना नहीं है.

स्वामीनाथन पर अमित शाह ने कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं चल रही है और वह इस चुनाव के लिए तैयार नहीं होंगे.

फडणवीस ने माहौल गर्म नहीं होने दिया

अमित शाह ने उद्धव ठाकरे से कहा है कि पीएम मोदी अमरीका यात्रा पर जाने से पहले या आने के बाद राष्ट्रपति उम्मीदवारी पर मुहर लगा सकते हैं.

दोनों के बीच बातचीत काफ़ी हंसी मज़ाक के माहौल में हुई. इस बैठक में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी थे. फडणवीस ने माहौल को गर्म नहीं होने दिया.

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हालांकि इसी हफ़्ते महाराष्ट्र के सीएम ने प्रदेश में मध्यावधि चुनाव को लेकर कहा था कि उनकी पार्टी इसके लिए तैयार है.

यह राजनीतिक दांव के सिवा कुछ भी नहीं है. ये दांव दोनों पार्टियां खेल रही हैं. बीजेपी ने पिछले तीन सालों से शिव सेना की नाक में दम कर रखा है.

शिव सेना मध्यावधि चुनाव नहीं चाहती

बीजेपी चाहती है कि यह समझ में न आए कि शिव सेना उसकी पार्टनर है या विरोधी है. ऐसे में दोनों के बीच ये दांव चलते रहते हैं.

शिव सेना हमेशा से यहां बीजेपी से आगे रही है लेकिन अब बीजेपी डबल हो गई है. ऐसे में इन दोनों के बीच जो खींचातान की स्थिति है वह स्वभाविक है.

अगर शिव सेना मध्यावधि चुनाव ही चाहती तो कब की बाहर महाराष्ट्र सरकार से बाहर निकल चुकी होती. शिव सेना को मध्यावधि चुनाव नहीं चाहिए इसलिए बाहर नहीं जाएगी.

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राष्ट्रपति चुनाव को लेकर शिव सेना मध्यावधि चुनाव में नहीं जाएगी और न ही बीजेपी ऐसा चाहेगी. इस राष्ट्रपति चुनाव में शिव सेना क्या करेगी इस पर अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है.

राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार कौन होगा इस पर कई चीज़ें निर्भर करती हैं. अगर बीजेपी महाराष्ट्र से ही किसी उम्मीदवार को आगे करती है तो शिव सेना को मराठी माणुष के नाम पर समर्थन करना पड़ सकता है.

बीजेपी यदि महाराष्ट्र से बाहर के किसी उम्मीदवार को उतारती है और विपक्ष में उनके सामने कौन प्रत्याशी है, इस पर भी शिव सेना का रुख निर्भर करेगा.

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शिव सेना की पसंद और नापसंद जैसी कोई बात नहीं है. शिव सेना के पास 25 हज़ार 893 वोट हैं. आज की तारीख़ में बीजेपी के लिए ये वोट काफ़ी अहम हैं क्योंकि बीजेपी के 45 हज़ार के करीब वोट कम पड़ रहे हैं. ऐसे में शिवसेना बाहर निकलती है तो ये आंकड़ा 70 हज़ार के पार जाएगा.

ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव जीतना बहुत ही कठिन हो सकता है. शिव सेना जो तीन साल की तकलीफ़ से पीड़ित है उसी के हिसाब से अपना दम दिखा रही है कि अब हमारे पैरों तले आओ.

जब ये सरकार बनी थी तब तो अमित शाह मातोश्री नहीं गए थे. अब अचानक उद्धव ठाकरे से मिलने पहुंच रहे हैं.

अमित शाह को पता है कि शिव सेना ने बाधा पैदा की तो उनका उम्मीदवार गिर सकता है. राजनीति में जब आपको ज़रूरत पड़ती है तो चौखट पर हाज़री लगाते हैं और जब ज़रूरत नहीं होती तो पीठ दिखा देते हैं.

बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार से बातचीत पर आधारित

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