'लेप्चा, भूटिया, बिहारी, मारवाड़ी सब गोरखा'

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साल 1986 के जुलाई महीने की 27 तारीख थी. दिन-रविवार. कलिम्पोंग के मेला ग्राउंड में हज़ारों लोगों की भीड़ जमा थी.

ये लोग गोरखालैंड राज्य के समर्थन और साल 1950 की भारत-नेपाल संधि के विरोध में वहां पहुंचे थे. तब इसमें शामिल होने आ रहे कुछ लोगों ने कलिम्पोंग थाने के पास डीआईजी स्तर के एक अधिकारी पर खुकरी से हमला कर दिया.

इससे आक्रोशित पुलिस ने अंधाधुंध फ़ायरिंग की. इसमें महिलाओं और बच्चों समेत 13 लोग मारे गए.

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तब गोरखालैंड आंदोलन का नेतृत्व सुभाष घिसिंग के हाथ में था. वे गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के नेता थे. घिसिंग ने अपने आंदोलनों के जरिए गोरखालैंड के लिए पृथक राज्य के दर्जे की मांग की और पहाड़ के लोग उनके पीछे दीवानों की तरह घूमते रहे.

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1500 लोग मारे गए थे

मशहूर स्तंभकार और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख सलाहकार स्वराज थापा बताते हैं कि साल 1986-88 के दौरान चले गोरखालैंड आंदोलन के दौरान करीब 1500 लोग मारे गए थे.

इसके बावजूद सरकार ने पश्चिम बंगाल का बंटवारा नहीं किया. नतीजतन गोरखालैंड की मांग जिंदा रही. तब दार्जिलिंग हिल्स में 40-40 दिन तक बंदी रही और यहां के निवासियों ने अपनी परवाह किए बगैर आंदोलन का समर्थन किया.

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अब साल 2017 का जून महीना है. गोरखालैंड की मांग फिर से जोरों पर है और पहाड़ के लोग इसे अंतिम लड़ाई करार दे रहे हैं.

इस बार नेतृत्व लेकिन बदल चुका है. आंदोलन का नेतृत्व अब विमल गुरुंग के हाथों में है. वे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के नेता हैं.

गोरखालैंड को लेकर सुभाष घिसिंग और अब विमल गुरुंग के आंदोलन मे क्या फ़र्क़ है.

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक उपेंद्र मणि प्रधान कहते हैं, "किसी दो आंदोलन और नेताओं में तुलना उचित नहीं. लेकिन मुझे लगता है कि सुभाष घिसिंग राजनीतिक रूप से ज्यादा परिपक्व थे. लेकिन उनका आंदोलन हिंसक था. जबकि विमल गुरुंग शांति से आंदोलन करना चाहते हैं."

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गोरखाओं का इतिहास

दार्जिलिंग हिल्स पर रहने वाले लोगों में सबसे बड़ी आबादी गोरखा समुदाय की है. 10 लाख से भी अधिक.

इतिहास की किताबें कहती हैं कि दार्जिलिंग की खोज कैप्टन लायड और जे डब्लू ग्रांट ने की थी. तब यहां लेप्चा समुदाय के कुछ लोग रहा करते थे. लेकिन उनकी संख्या 200 से भी कम थी.

साल 1866 के दौरान अंग्रेजों ने यहां चाय की खेती शुरू कराई और इसके बागानों में काम करने के लिए बड़ी संख्या में नेपाल से गोरखा मज़दूरों को यहां बुलवाया. बाद में वे यहीं बस गए और पहाड़ पर उनकी हिस्सेदारी सबसे ज्यादा हो गयी.

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ग़लत इतिहास

पत्रकार उपेंद्र मणि प्रधान इसे आधा सच बताते हैं. उन्होंने बताया, ''दार्जिलिंग का इतिहास किसने लिखा. वे कोई चटर्जी, बनर्जी, राय या घोष थे. लिहाजा, इतिहासकारों ने अपनी सुविधा और इच्छा के मुताबिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर रखा. दार्जिलिंग के गोरखा उतने ही पुराने हैं जितना पुराना यहां का वजूद है.''

रिंचु टुप्पा, भूटिया जाति की हैं. लेकिन वे खुद को गोरखा कहती हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि पहाड़ पर रहने वाले लेप्चा, भूटिया, गुरुंग, शेरपा या फिर बिहारी, झारखंडी, बंगाली, मारवाड़ी सब गोरखा हैं. गोरखा कोई जाति नहीं, हमारी राजनीतिक पहचान है.

स्वराज थापा कहते हैं कि गोरखालैंड की मांग तो 100 साल से भी अधिक पुरानी है. पहले सुभाष घिसिंग और साल 2007 के बाद विमल गुरुंग ने इसे जोरदार तरीके से उठाया. सरकार को चाहिए कि वे यहां के लोगों की अस्मिता की रक्षा के लिए हमें पश्चिम बंगाल से अलग करे. हमें गोरखालैंड दे.

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क्यों चाहिए गोरखालैंड

दार्जिलिंग के चौरस्ता निवासी रौशन सिंह बारहवीं पास हैं. बंगाल पुलिस के लिए उन्होंने दो बार कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सके. अब वे एक होटल मे वेटर का काम करते हैं.

उन्होंने बताया कि हमें हमारा हिस्सा नहीं मिलता. आज़ादी के इतने दिनों बाद भी हम चौकीदार और वेटर जैसी नौकरियां कर रहे हैं. गोरखालैंड मिल जाएगा तो हमारे बच्चों का भविष्य संवर सकता है.

उपेंद्र मणि प्रधान कहते हैं कि सवा अरब की जनसंख्या वाले देश में गोरखा लोगों की संख्या सिर्फ एक करोड़ है. ज़ाहिर है हमें न तो राजनीतिक हिस्सेदारी मिली और न ही प्रशासन में हम आ पाए. दार्जिलिंग के गोरखा दूसरे जगहों पर जाकर अफसर बन जाते हैं लेकिन यहां हमारा कोई वजूद नहीं.

वे कहते हैं, ''बंगाल के लोग हमे दूसरे दर्जे का नागरिक समझते हैं. गोरखा लोगों को ये मंज़ूर नहीं. लिहाजा, हमें अब बंगाल के साथ नहीं रहना. हमें हमारा गोरखालैंड चाहिए. किसी भी क़ीमत पर.''

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