दवाओं के कैप्सूल में जानवरों का फैट, अब और नहीं

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दवाएं भी अब 'वेजिटेरियन' हों - स्वास्थ मंत्रालय की इस कोशिश के तहत अब दवा उद्योग एक विस्तृत जवाब जांच समिति को सौंपने वाला है.

केंद्रीय स्वास्थ मंत्रालय ने पिछले माह 'जेलाटिन बेस्ड कैप्सुल्स' की जगह 'वनस्पति बेस्ड कैप्सुल्स' लाने की एक योजना तैयार की है.

दवाई निर्माताओं के समूह - इंडियन ड्रग मैनुफैक्चर्रस के आला अधिकारी गोपाल कृष्णन ने बताया कि जांच समिति, मंत्रालय के अधिकारियों, संघ और दूसरे पक्षों के बीच इस मामले पर एक बैठक मई की 25 तारीख़ को दिल्ली में हुई.

कितना व्यावहारिक?

जांच समिति को सौंपा जाने वाले विस्तृत जवाब में वनस्पति कैप्सुल्स बनाने, उसकी वैज्ञानिकता, क़ीमत वग़ैरह पर विस्तार से बात की गई है. ये जवाब आनेवाले चंद दिनों में ही सौंपा जानेवाला है.

केंद्रीय स्वास्थ मंत्रालय चाहता है कि कैप्सुल्स के खोल और उसे बांधने के लिए दवाएं बनाने में जिलेटिन की जगह सेल्यूलोज़ का इस्तेमाल किया जाए.

जिलेटिन जानवरों की हड्डियों और कुछ दूसरी चीज़ों को प्रॉसेस कर तैयार होती हैं. जबकि सेल्यूलोज़ पेड़ों की छालों से निकाले रस और दूसरे केमिकल्स को प्रॉसेस कर तैयार किया जाता है.

लेकिन उद्योग जगत का कहना है कि सेल्यूलोज़ का इस्तेमाल न सिर्फ़ अधिक खर्चीला होगा बल्कि इसे हर तरह के कैप्सुल्स में इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता है.

विटामिन कैप्सुल्स के लिए तो शायद ये संभव हो जाएं लेकिन जो कैप्सुल्स सप्लिमेंट्स के तौर पर दिए जाते हैं वहां ये मुमकिन नहीं.

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चिकित्सक पक्ष में

गोपाल कृषणन का ये भी कहना है इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण भी नहीं है कि सेल्यूलोज़ कितना कारगर होगा. साथ ही इसका भी कोई सबूत नहीं है कि ये पूरी तरह वनस्पति बेस्ड ही है क्योंकि इसे तैयार करने में दूसरी तरह की रसायन का इस्तेमाल भी होता है.

विश्व भर में दवाओं के लिए जो स्टैंडर्ड मोनोग्राफ़ - फार्मोकोपिया मौजूद है उसमें सेल्यूलोज़ का कहीं ज़िक्र नहीं है.

जिलेटिन बेस्ड कैप्सुल्स दुनिया भर में पिछले 185 सालों से इस्तेमाल हो रहा है और विश्व में जितनी कैप्सुल्स मुहैया हैं उनमें 95 फ़ीसद में जिलेटिन के ख़ोल का इस्तेमाल होता है

चिकित्सकों के समूह - इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डा. केके अग्रवाल वेज कैप्सुल्स की हिमायत करते हैं.

धार्मिक आस्था

लेकिन साथ ही वो कहते हैं कि मगर उनके पास इसकी क़ीमत और सुरक्षा को लेकर किसी तरह का कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है.

मगर डा. अग्रवाल का कहना है कि मरीज़ों के पास विकल्प मौजूद होना चाहिए.

खबरें हैं कि केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने स्वास्थ मंत्री जेपी नड्डा को एक बैठक में सुझाव दिया था कि देश में लाखों लोग वेजिटेरियन हैं जो इस तरह की दवाईयां नहीं लेते हैं और ये उनके आस्था पर हमले जैसा है.

हालांकि मेनका गांधी के कार्यालय ने बीबीसी के संपर्क करने पर कुछ कहने से मना कर दिया.

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