रामनाथ कोविंद के दोस्त क्या कहते हैं?

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विजय पाल सिंह 71 साल के हैं और पेशे से किसान हैं. कानपुर देहात ज़िले के परौंख गाँव में रहते हैं. वे अपने ज़िले से बाहर कहीं ज़्यादा नहीं घूमे हैं.

पर अब वह दिल्ली जाने की सोच रहे हैं. और दिल्ली में भी कहाँ? सीधे राष्ट्रपति भवन?

असल में उनके बचपन के दोस्त रामनाथ कोविंद को सत्तारूढ़ एनडीए ने राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार चुना है.

बिहार के राज्यपाल रहे रामनाथ कोविंद को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार चुना है. कोविंद और पाल परौंख में अगल बगल ही रहते थे और पहली से पांचवीं कक्षा तक एक साथ पढ़े हैं.

रामनाथ कोविंद के बारे में क्या क्या जानते हैं?

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पाल बताते हैं, "हम दोनों गाँव की प्राथमिक पाठशाला में साथ पढ़े हैं और अच्छे दोस्त भी थे. पाठशाला जाते समय हम लोग ज़मीन पर गिरे आम चुन कर खाया करते थे."

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Image caption रामनाथ कोविंद के दोस्त विजय पाल सिंह

वे आगे कहते हैं, "कोविंद पढ़ाई में बहुत होशियार थे और मैं बहुत कमज़ोर. मैंने पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी."

उनके अनुसार, पांचवी के बाद कोविंद ने घर के करीब छह किलोमीटर दूर खानपुर-प्रयागपुर गाँव के एक स्कूल में दाख़िला ले लिया. वे कहते हैं, "उस ज़माने में साइकिल होना तो दूर की बात थी. तो वह पैदल ही स्कूल आया-जाया करते थे,"

कक्षा आठ के बाद आगे की पढ़ाई करने कोविंद कानपुर देहात से सटे कानपुर शहर आ गए.

भाजपा के 'कोविंद व्यूह' से कैसे निकलेगा विपक्ष?

भारत के हज़ारों अनजान गाँवो में से एक परौंख उस समय सुर्ख़ियों में आ गया, जब भाजपा ने रामनाथ कोविंद को अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित किया.

कानपुर देहात के डेरापुर तहसील का परौंख गाँव कानपुर -दिल्ली को जोड़ने वाले हाईवे से करीब 15 किलोमीटर दूर है.

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पांच साल की उम्र में ही मां चल बसी

कानपुर देहात कभी कानपुर का ही हिस्सा हुआ करता था. पर 1980 के दशक में कानपुर के ग्रामीण इलाकों को एक अलग ज़िला कानपुर देहात बनाया गया.

परौंख, कानपुर मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर है.

परौंख उत्तर भारत के किसी भी आम गाँव जैसा है. मुख्य मार्ग से गाँव तक पहुँचने के लिए एक एक संकरी, पर पक्की सड़क, कच्चे घरों के बीच कुछ पक्के मकान, जगह-जगह मवेशी, तरह- तरह के हरे, बड़े पेड़ और चारों तरफ खेत.

गाँव की आबादी करीब 8000 है और सभी जाति के लोग रहते हैं. पाल कहते हैं कि 'कोविंद के पिता घर में ही एक छोटी सी दुकान चलाते थे और दुकान ही उनकी आय का ज़रिया था. घर कच्चा हुआ करता था. जब कोविंद पांच साल के थे तब उनके घर में आग लग गयी और उसी हादसे में उनकी माँ का देहांत हो गया.'

जैसे जैसे साल बीतते गए कोविंद के भाई-बहन दूसरे शहरों में बसने लगे. सिर्फ़ उनके पिता ही गाँव में रह गए.

पाल बताते हैं, "मकान पूरा ज़मींदोज़ हो चुका था. मैंने कोविंद से कहा की इसका कुछ करो. तो उन्होंने वहां 2001 में एक सामूहिक केंद्र बना दिया."

विकास की उम्मीद बढ़ी

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हालांकि कोविंद ने 15 साल की उम्र में गाँव छोड़ दिया था पर वह गाँव आते रहे. वे आख़िरी बार गाँव दिसंबर 2016 में गए थे. उस समय तक वो बिहार के राज्यपाल बन चुके थे.

परौंख के ही एक अन्य किसान वीरेंद्र सिंह भदौरिया कहते हैं, "कोविंद ने गाँव में चार हैंडपंप लगवाए हैं, एक स्कूल और एक बैंक खुलवाया है, मुख्य मार्ग से गाँव तक पक्की सड़क बनवायी है."

गाँव के लोग कोविंद के काम से ख़ुश हैं. उनका मानना है कोविंद ही राष्ट्रपति बनेंगे और उम्मीद कर रहे हैं गाँव में और विकास होगा.

भदौरिया कहते हैं, "गाँव के ज़्यादातर लोग किसान हैं और पानी की दिक्कत है. दूसरी बड़ी समस्या है अस्पताल की कमी. हमें उम्मीद है कि वो इस बारे में कुछ करेंगे."

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