अब सोशल मीडिया के ज़रिए इफ़्तार पार्टियां

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इस्लामिक कैलेंडर के नवें महीने रमज़ान की आजकल धूम है. इधर सोशल मीडिया पर एक नई तरह की हवा भी बह रही है. ज़िक्र है एक 'इंटरफेथ' यानी सर्वधर्म इफ़्तार का.

हमने नेताओं, अभिनेताओं, अन्य जानी-मानी हस्तियों और कई जगह अपने दोस्तों-जानने वालों की पार्टियों के बारे में सुना है, लेकिन इस ख़ास इफ़्तार की कहानी कुछ अलग है.

कैसे हुई शुरुआत

ये कहानी शुरू होती है रमज़ान के तीसरे दिन लिखी गई एक फेसबुक पोस्ट से. नोएडा में रहने वाली नाज़िया इरम ने 28 मई को अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा, "ऐसे कितने लोग हैं जो कभी किसी इफ़्तार में नहीं गए?" इस सवाल के जवाब में तीस से ज़्यादा लोगों ने बताया कि वे कभी किसी इफ़्तार में शामिल नहीं हुए.

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नाज़िया, जो इसे बड़ी सामाजिक कमी की तरह देख रही थीं, उन्होंने तय किया कि इस कमी को दूर किया जाना चाहिए. लेकिन अकेले ये सब कर पाना मुश्किल था, और इतने लोगों को एक साथ बुलाने के लिए बड़ी जगह भी चाहिए थी.

ऐसे में नाज़िया की मदद की उनके व्हाट्सऐप ग्रुप ने. देशभर में रह रही करीब 500 हिंदू-मुसलमान महिलाओं का ये ग्रुप उन्होंने अपनी किताब 'मदरिंग अ मुस्लिम' के लिए देशाटन करते हुए बनाया था.

इस तरह दिल्ली-नोएडा की कुल 12 महिलाओं ने मिलकर इस इफ़्तार की शुरुआत की. और इसकी खासियत यही रही कि दोस्तों-रिश्तेदारों के अलावा बिलकुल अनजान लोगों ने भी इस इफ़्तार में हिस्सा लिया.

सिर्फ यही नहीं इसे आयोजित करने वाले 12 लोग भी एक दूसरे को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते थे.

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एक 5-6 साल की बेटी की मां और लेखिका नाज़िया इरम बताती हैं, "मुझे अंदाज़ा नहीं था कि इतने लोगों ने कभी इफ़्तार में हिस्सा नहीं लिया होगा. हालांकि किताब के लिए ट्रैवल करते वक्त मैं इतना तो समझ ही चुकी थी कि अब भी हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने एक मुसलमान का घर भीतर से नहीं देखा, उनके उत्सवों-त्योंहारों में भाग लेना अलग बात है. ऐसे में लगा कि इस मौके पर हम इस दूरी को पाटने के लिए एक कदम तो उठा ही सकते हैं."

वो कहती हैं, "लोगों में मुसलमानों को, उनकी तहज़ीब को, उनकी औरतों को लेकर तमाम भ्रांतियां हैं, यहां तक कि एक सीएसडीएस स्टडी ये साबित करती है कि देश के सिर्फ 30 फीसदी हिंदुओं के मुसलमान करीबी दोस्त हैं. दो लोगों में नफरत तभी पनपती है जब वे एक दूसरे को जानते नहीं हैं. तो जब हम मिले, हमने रोज़े और इफ़्तार के बारे में बातचीत की तो हमने देखा कि हमारे बारे में स्टीरियोटाइप्स टूट रहे थे."

नज़रिए को साबित करता अनुभव

नाज़िया की बात को बिलकुल सही साबित करता है दिल्ली के राहुल घोष का अनुभव.

राहुल कहते हैं, "इफ़्तार में जाने का ये पहला मौका था मेरे लिए. यहां मैं आत्मविश्वास से भरे, खूबसूरत दिखते इन युवा मुसलमान लड़के-लड़कियों से मिला, जो अपनी ज़िंदगी में काफ़ी अच्छा कर रहे थे. इन लड़कियों में कोई बाइकर थी तो कोई पायलट, कोई लेखिका तो कोई वकील या नेता. इनसे मिलकर समझ आया कि मीडिया ने हमारे मन में मुसलमानों के लिए स्टीरियोटाइप बना दिए थे, लगता था जैसे इस तरह के पढ़े लिखे मुसलमान देश में हैं ही नहीं. मुझे इनसे मिलकर गर्व का अनुभव हुआ," राहुल ने बताया.

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इसी तरह का अनुभव कुनाल छतवानी का भी था.

कुनाल ने बताया, "इससे पहले मुझे रमज़ान या इफ़्तार के बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं थी. मुझे कोई अंदाज़ा था कि यूं भी मुसलमान परिवार अपने गैर-मुसलमान दोस्तों के लिए इफ़्तार रखते हैं, और ये सामाजिक मेल-मिलाप बढ़ाने का एक तरीका है. मेरे लिए ये पहला इफ़्तार था. बहुत अच्छा लगा मुझे दूसरे मत के परिवार से मिलना, उनकी संस्कृति को क़रीब से देखना. हमारे समाज को ऐसे और अनुभवों की बेहद ज़रूरत है."

संस्कृति का असर

वहीं, कंचन बग्गा के लिए इफ़्तार में शामिल होने का यह पहला मौका था.

उन्होंने कहा, "मैं साझी संस्कृति के माहौल में पली बढ़ी हूं, एक क़रीबी मुस्लिम दोस्त भी है, लेकिन पिछले कुछ समय से बिगड़ती देश की सामाजिक स्थिति ने मुझे काफ़ी निराश किया है. मुझे खुशी है कि ऐसी पहल की गई और मैं चाहती हूं कि ऐसा हर साल किया जाए. मैं अगली बार फिर इसमें हिस्सा लेना चाहूंगी. एक थाली से खाते हुए आपस की भ्रांतियां दूर होते देखना वाकई सुखद है."

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पहला इफ्तार जहां नोएडा में हना ख़ान के घर पर आयोजित किया गया वहीं दूसरा इफ़्तार अली शेरवानी और निहारिका शेरवानी के घर अलकनंदा, दिल्ली में रखा गया.

दोनों ही जगह करीब 30 के आस-पास बिलकुल अनजान लोगों ने हिस्सा लिया. सबसे पहले राना सफवी ने रोज़े और फ़ाके के बारे में बताया, इफ़्तार और उसकी सामाजिक ज़रूरत पर बात हुई, फिर बाक़ायदा खज़ूर और पानी के साथ रोज़ेदारों ने रोज़ा खोला, नमाज़ हुई, और फिर खाने और बातों का दौर काफी लंबा चलता रहा.

जान-पहचान से लेकर, सियासत, हिंदुस्तान-पाकिस्तान, क्रिकेट और बच्चों की परवरिश तक हर तरह की बातें हुईं.

दूसरे इफ़्तार के मेज़बान अली शेरवानी और निहारिका मुसलमानों को स्टीरियोटाइप करने के मीडिया के नज़रिये से नाराज़ नज़र आए.

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एक-दूसरे को समझने की ज़रूरत

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Image caption अली और निहारिका

इस बारे में अली का कहना था कि मौजूदा वक्त में हमें एक-दूसरे से कटने की नहीं, एक दूसरे को समझने की ज़रूरत है.

अली ने बताया, "मीडिया में अक्सर मुसलमानों की एकतरफा तस्वीर दिखाई जाती है. अभी सिविल सर्विसेज़ में 50-55 मुसलमान बच्चों ने अपनी जगह बनाई, मीडिया ने इस पर बात नहीं की. ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि हम खुद अपने देश में अपने लोगों तक अपनी आवाज़ पहुंचाएं. धर्म एक निजी मसला है, जबकि मानवता समाज के लिए है. अगर हम सब दूसरे धर्मों के बारे में अपने पूर्वाग्रह तोड़कर आपस में मिल-जुल सकें, बात कर सकें, तभी कुछ बदल सकेगा."

उनकी पत्नी निहारिका, जोकि होम फर्निशिंग का व्यवसाय संभालती हैं, उन्होंने कहा कि खाने पर मिलना, एक-दूसरे के बारे में जानने-समझने का सबसे अच्छा मौका हो सकता है.

नाज़िया की शुरुआत के बाद इस तरह के इफ़्तार मुंबई, गुवाहाटी और हैदराबाद में भी आयोजित किए गए.

मुंबई की आभा के लिए ये अनुभव न सिर्फ लखनऊ में बीते उनके बचपन की यादों को ताज़ा कर देने वाला था, बल्कि अनजाने इस मौके पर वे अचानक अपने पुराने दोस्त से भी मिलीं.

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Image caption आभा सिंह

पेशे से वकील आभा सिंह ने बताया, "खुशी हुई कि ऐसा कुछ हमारे शहर में किया जा रहा था. ये बहुत ही अच्छी शुरुआत है हमारी मिली-जुली संस्कृति को बचाए रखने की."

इस नई शुरुआत को सोशल मीडिया पर जहां काफी तारीफ़ और सहयोग मिला वहीं कुछ लोगों ने यह कहकर आलोचना भी की कि अमीर हिंदुओं को इफ़्तार पर बुलाने से कुछ नहीं बदलेगा.

इस बारे में नाज़िया और उसके साथियों का कहना था कि ये पहल अमीर या ग़रीब के लिए नहीं, सिर्फ एक दूसरे को जानने का एक मौका जुटाने के लिए की गई जोकि एक छोटे स्तर पर ही सही क़ामयाब हो रही है.

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